हिन्दू ग्रथों का सच क्या है !
परिचय = यह बड़े ही खेद का विषय है की प्राचीन भारत से समंधित जितना भी इतिहास उपलब्ध है ,उसका मुख्य स्त्रोत अशोक और अन्य सम्राटों के शिला-लेख ,शिला-स्तंभों पर उत्कीर्ण साम्रग्री,स्तूप,भवनों के खंडहर ,गुहाएं ,तोरण,मूर्तियां ,सिक्के,चीनी तथा अन्य यात्रियों के यात्रा-विवरण हैं ,जिनकी लुप्त कड़ियों को जोड़कर प्राचीन
इतिहास की आकृति दी गयी है .यद्यपि इतिहास की छोटी-बड़ी घटनाओं को तर्कशास्त्र की अन्वय-व्यक्तिरेक
विधि के आधार पर मूल्यांकन करके सत्य के अधिक समीप पहुंचा जा सकता है ,लेकीन अक्सर इतिहास की छोटी-छोटी घटनाएं
इतिहासकारों के लिए किन्तु और परंतु की स्थिति बनकर विवाद एवं उहापोह का विषय बन
जाती है .
इस विवाद का मुख्य कारण भारतीय इतिहासकारों का विभिन्न धार्मिक गुटों में
बटें रहना है.इतिहास के वस्तुगत ,स्पष्ट तथ्यों एवं प्रमाणों के अभाव और शोधकर्ताओं में वैदड्न्यानिक शोध
पद्धति ,प्रेरकों के प्रति उत्साह के निम्न स्तर के
कारण विशुद्ध निष्कर्षों की प्राप्ति में कठिनाई उत्पन्न होती है .यह बात शतप्रतिशत अयोध्या के खंडहर पर लागु होती है .
इस विषय पर भारत के इतिहासकार मोटे तौर पर दो भागों में विभाजित हैं .प्रथम श्रेणी में हिंदू धर्म और उससे सहानुभूति रखने वाले इतिहासकार आतें
हैं ,जिनका कथन है की अयोध्या में बाबरी मस्जिद
नहीं ,बल्कि राम मंदिर था और जिसके प्रचार-प्रसार में वे जोर-शोर से लगे हुये हैं. दूसरी श्रेणी में मुसलमान इतिहासकार और उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले
लोग आतें हैं ,जिनका कथन है की यहाँ राम मंदिर नहीं बल्कि
बाबरी मस्जिद थी ,जिसे बाबर इथवा उसके सूबेदार ने बनवाया था .यथार्थ में दोनों गुटों के इतिहासकारों की आंखो पर धार्मिक भावनाओं,अंधविश्वासों और अंधआस्थाओं के चश्में चढ़े हुयें हैं ,जिसके परिणामस्वरूप दोनों ही लोग इतिहास की सत्यता से कोसों दूर हैं .हिंदू और मुसलमान दोनों ही इस विषय में कट्टरतापूर्ण विरोधी विचारधारा
रखतें हैं .इस कारण वस्तुगत निष्कर्षों के स्थान पर
पक्षपात पूर्ण निष्कर्ष प्राप्त हो जातें हैं .इस प्रकार
के ऐतिहासिक निष्कर्षों में इतिहास की वैद्न्यानिक शोध पद्धति का नितांत अभाव होता
है और शोधकर्ताओं में उत्साह का अभाव भी पाया जाता हैं .इस प्रकार के इतिहासकारों में पेहले भावनाओं और संवेगों का जन्म होता हैं.इसके उपरांत उनके द्वारा भावनाओं और संवेगों से युक्त पुर्वकल्पना बनायीं
जाती है .अंत में पूर्वकल्पना को सिद्ध करने के लिए इस
प्रकार के तथ्य जुटाएं जाते है ,जो अर्थहीन,आधारहीन,अवैद्न्यानिक ,विरोधों
और विरोधाभासों से युक्त उट-पटांग होते हैं.जब की वैद्न्यानिक अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं को अपने व्यक्तिगत संवेगों,भावनाओं और विचारो से परे होकर निष्पक्ष कार्य करना पड़ता है .
यह पेहले बताया जा चूका है की भारतवर्ष में हिंदू(ब्राम्हण) यह दावा
करते हैं की अयोध्या में मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर था .हिंदुओं के इस कथन पर परिक्षण और जांच पड़ताल करने के पूर्व पेहले यह देख
लिया जाये के भारत के इतिहास में राम का क्या अस्तित्व है ?? राम ऐतिहासिक व्यक्ति है अथवा पौराणिक ?? अगर यह पौराणिक व्यक्ति है ,तो पुराणों का
प्रादुर्भाव किस काल में हुआ ?? और फिर राम को
कहाँ से पकड़ कर पुराणों में ठुसां गया ?? इन प्रश्नों के
उत्तर मिलने पर यह स्वतः ही स्पष्ट हो जायेगा की राम का जन्म कहाँ से हुआ ??? और क्यों हुआ ??
राम के बारे में जानने के लिए उपयुक्त प्रश्नों के उत्तर देखने पड़ेंगे.भारत के
इतिहास में राम नाम के व्यक्ति का कोई स्थान नहीं है .वास्तव में राम ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं,बल्कि
पौराणिक व्यक्ति है .इसे अन्य शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया
जा सकता है की आज राम के बारे में जो कुछ भी जानकारी प्राप्त है ,उसका मूलाधार रामायण एवं दसरथ जातक राम का इतिहास के आख्यान है .वेदों में राम का जिक्र तक नहीं आता .हिंदू-वांडमय के अनुसार राम का कल त्रेतायुग में माना जाता है. त्रेतायुग में वेदों का प्रचलन अवश्य था ,तो फिर
वेदों में राम का जिक्र अवश्य आना चाहिए.लेकिन आश्चर्य की
बात यह है किसी भी वेद में राम का तनिक भी जिक्र नहीं आया .
राम का इतिहास ************
वेदों के उपरांत सबसे प्राचीन साहित्य बौद्ध धर्म के त्रिपिटक ग्रंथो को मन
जाता है.त्रिपिटक के अंतर्गत विनय पिटक ,सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक आते है .विनय पिटक के १) पराजिक,२) पाचित्तिय,३)महावग्ग ४) चुल्ल्वग्ग, ५) परिवार ग्रंथ है .सुत्त पिटक के अंतर्गत १} दिघ निकाय,२} मज्झिम निकाय,३}संयुक्त निकाय, ४}अंगुत्तर निकाय और ५} खुद्दक निकाय ग्रंथ आतें है .खुद्दक
निकाय में १५ ग्रंथहै १]खुद्दकपाठ, २]धम्मपद, ३]उदान, ४]इतिवुत्तक, ५]सुत्तनिपात, ६]विमानवत्थु, ७]पेतवत्थु, ८]थेरगाथा,१०]जातक,११]निद्देश,१२] पटीसम्भीदामग्गउ,१३]अपदान,१४]बुद्धवंस और १५]चरियापिटक. अभिधम्म पिटक में सात ग्रंथ आतें है ,जो इस प्रकार है -१.धम्मसंगणी, २.विभंग, ३.धातु कथा, ४.पुग्गलपंति, ५.कथावस्तु, ६.यमक और ७.पठठान.
जातक कथाएं बौद्ध धर्म में अपना बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखती है .इनकी कुल संख्या ५४७
है .ये कथाएं बुद्ध के समय की लोक कथाएं है,जो लगभग सभी बुद्ध के द्वारा कही गईं है अथवा कहलाई गयी हैं .कुछ जातक कथाएं भगवान बुद्ध के बाद की भी बताई जाती है .जिस प्रकार से पौराणिक कथा ऐतिहासिकता से दूर होती है ,उसी प्रकार आधुनिक इतिहास के सिद्धान्तों पर जातक कथाएं खरी नहीं उतरती .लेकिन जातक कथाएं प्राचीनता की दृष्टी से पुराणों से अधिक पेहले प्रचलन
में आ चुकी थी.जातक कथाओं के माध्यम से बौद्ध धर्म के नैतिक
एवं मानवीय मूल्यों को किस प्रकार से मानव-जीवन में समाविष्ट
किया जा सकता है ,यह बताया गया है,जिससे की साधारण व्यक्ति के लिए वे ग्राह्य हो सकें.प्रत्येक जातक कथा का एक नायक होता है और वह बोधिसत्व कहलाता है .प्रत्येक बोधिसत्व दस परिमिताओं में से किसी एक का अनुशीलन और अभ्यास करता
हुआ,समाज में आदर्श स्थापित करता है ,जिससे बहुजन हिताय बहुजन सुखाय लोकानुकम्पाय ,की पावन भावन संभव हो सके.
मनुस्मृति ,गीता ,शंकर वेदांत,महाभारत ,रामायण और पुराणों की रचना समय ईसा पूर्व १८५
अर्थात पुष्यमित्र शुंग की क्रांति के बाद माना जाता है . जबकि इसके विपरीत जातक कथाएं बुद्ध के युग में प्रचलित थीं. स्वयं बुद्ध के द्वारा ही
पूर्वजन्मों में हुये बोधिसत्वों के शुभ कार्यों का वर्णन किया गया है. पुष्यमित्र शुंग (जो वास्तविकता में राम है और जिसे बाद में इस
नाम की इतिहास में घुसबैठ करके राम नाम की पहचान दी गयी.) के द्वारा की गयी प्रति-क्रांति के बाद
ब्राम्हणों ने बौद्ध धर्म का विनाश प्रारंभ कर दिया था. बौद्ध महाविहार,स्तूप आदि को तोड़कर जमीन में मिला दिया गया
था .एक बौद्ध भिक्खु का सिर काटने पर पुष्यमित्र
शुंग ने एक सौ स्वर्ण मुद्राएं पुरस्कार में देना आरंभ कर दिया.पुष्यमित्र शुंग और उसके बाद जितना बौद्ध धर्म का नाश करना था, वह ब्राम्हणों ने किया.
गिद्ध की सी कुदृष्टि रखने वालें ब्राम्हणों ने एक कार्य अत्यंत भयानक किया ,जिसे लोग अब तक
समझने में असमर्थ हैं ,यह विद्यान का नियम है की कुछ में से कुछ का
निकालना अथवा उत्पन्न करना आसान होता हैं .पुष्यमित्र शुंग और
उसके बाद के समय तक लोगों के दिलों और दिमाग से बौद्ध धर्मं और उसके प्रति आस्थाओं
और मान्यताओं को नहीं निकाला जा सका था .ऐसी स्थिति में
शातिर और कुटिल बुद्धि रखने वाले ब्राम्हणों ने एक बड़ा भयंकर जाल बिछाना प्रारंभ
कर दिया .यह काम था की जातक कथाओं के नें बोधिसत्वों
और उनकी विषयवस्तु को लेकर हिंदू धर्म(ब्राम्हणी धर्म.हिंदू नाम बाद में दिया गया ) के साहित्य की रचना प्रारंभ कर दी ,जिससे बौद्धों में बौद्ध साहित्य के प्रति रूचि को धीरे-धीरे समाप्त किया जा सके .बाद में यह हुआ की बौद्ध धर्म की जातक कथाएं धीरे-धीरे लुप्त होती चली गई और वे कथाएं हिंदू धर्म की लोक कथाओं के रूप में
सामने आने लगी .उदहारण के लिए एक बार एक जातक कथा लेखक ने
प्रोफ़ेसर महोपासक बुद्धप्रिय मौर्य जी को सुनाई .उन्होंने
बताया की यह लोककथा वह अपने दादा जी से बचपन में सुन चुकें हैं .इससे यह सिद्ध होता है की बौद्ध जातक कथाएं आज भी हिंदू समाज में क्यों की
त्यों प्रचलित हैं .हिंदू धर्म में संस्कृत की पंचतंत्र की
लोककथाएं जातक कथाओं का एक प्रकार से रूपांतरण ही है .
इस बात को प्रमाणित करने के लिए हिंदू-वांडमय ,विशेषकर दानवीर राजा हरिश्चंद्र, शकुंतला,दुष्यंत,दशरथ-राम,राजा जनक, श्रीकृष्ण,कौरव-पांडव,विदुर आदि की आधारशिला बौद्ध धर्मं की जातक कथाएं हैं .हिंदू पुराणों में सतयुग में उत्पन्न हुए राजा हरिश्चंद्र की दानवीरता का
अक्सर जिक्र आता हैं .राजा हरिश्चंद्र की कथा का आधार महावेस्सन्तर
जातक(547) है ,जिसके अंतर्गत दान
परिमिता का महत्त्व बताया गया है .कट्ठहारी जातक (7) में शकुंतला का प्रकरण ज्यों का त्यों दिया गया. सुत्तभस्त जातक (402)
और महाजनक जातक में (359) में मिथिला के राजा जनक का विस्तृत वर्णन किया गया है.दसरथ जातक (461) में राजा दसरथ,बोधिसत्व राम पडित ,लक्खन कुमार और बहन सीता का वर्णन मिलता है.अंतर केवल इतना है की हिंदू वांडमय में सीता राम की पत्नी बताई गयी है .
महाजनक जातक,दसरथ जातक,सामजातक और चुल्लहंस जातक,जिसमें चित्रकूट पर्वत का वर्णन है,इन सब जातकों को
मिलाकर रामायण की रचना की गयी थी.रामायण कथा में राम
को ईश्वर का अवतार बताया गया है .साम जातक (540) पर श्रमण कुमार की कहानी निर्भर करती है .श्रीकृष्ण बौद्धों के बोधिसत्व थे .इसीलिए ब्राम्हणों(हिंदुओं) ने इनके नाम को ज्यों का त्यों ग्रहण कर
ईश्वर का अवतार मन लिया गया है .श्रीकृष्ण की
संपूर्ण कथा कन्ह जातक (440)
में घत जातक (454) और श्रीकृष्ण के द्वारा दिया गया द्यान महानारद कश्यप जातक (544) में प्राप्त होता हैं .रामायण ,महाभारत ,और यक्ष संवाद का आधार देव धम्म जातक (6) और सुत्त निपात के उरग-वग्ग के आलवक सुत्त
(बुद्ध और आलवक यक्ष संवाद ) से लिया गया सिद्ध होता है. रजा ध्रुतराष्ट्र
की जानकारी सिरकालकन्नी जातक (382),चुल्लहंस जातक
(533) और महासंस जातक (534) से प्राप्त होता है .महाभारत के मुख्य
पात्र युधिष्ठिर और विदुर तथा उनकी राजधानी इंद्रप्रस्थ की जानकारी दस जातक (502) सम्भव जातक (515) और जुए का
संपूर्ण विवरण और विदुर का संपूर्ण चरित्र-चित्रण विधुर नामक
जातक (545) से प्राप्त होता है .इसके अतिरिक्त धनंजय ,विदुर,संजय के बारे में जानकारी सम्भव जातक (515)से
प्राप्त होती है.अर्जुन के बारे में भुरिदत्त जातक (543) और कुणाल जातक (536) एवं भीम के
बारे में कुणाल जातक (536) पूरी कहानी दी गई है.हिंदू धर्म(ब्राम्हणी) के
विश्वकर्मा का वर्णन ययोधर जातक (510) और ह्रुषी
ह्रंग की पूरी जानकारी अलम्बुस जातक (523) और नलिनिका
जातक (526) से प्राप्त होती है .
आज कल राम की संपूर्ण कथा का मूल
स्तोत्र रामायण माना जाता है.
जैसा समझा जाता है की रामायण का
एक ही संस्करण तैयार हुआ था .वास्तव में ऐसी बात नहीं है .रामायण के भी महाभारत की तरह तिन संस्करण तैयार हुये थे .महाभारत में रामायण के बारे में दो प्रकार के संदर्भ थे. महाभारत में रामायण के संदर्भ मिलते हैं .डॉ .बाबासाहेब आंबेडकर के अनुसार ,”एक प्रसंग में
रामायण का प्रसंग आया है ,किन्तु उसके लेखक का उल्लेख नहीं मिलता.दुसरे प्रसंग में वाल्मीकि रामायण का उल्लेख हुआ है ,किन्तु इन दिनों जो रामायण उपलब्ध है,वह
वाल्मीकि द्वारा रचित नहीं है .”
इस संदर्भ में मान्य सी.वी.वैद्य का कथन है ,वर्तमान रामायण वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण नहीं है ,चाहे इसे इसी रूप में महँ चिंतक और भाष्यकार कटक ने ही क्यों न स्वीकार
दिया हो. कट्टर से कट्टर विचारक भी इस तथ्य को स्वीकार
करने में नहीं हिचकिचाएगा ,चाहे कोई वर्तमान रामायण को सरसरी तौर पर ही
क्यों न पढ़ें ,वह उसमें आई असंगतियो को देखकर पूर्व
प्रसंगों में परस्पर समंध हीनता देखकर या काफी मात्रा में उपलब्ध नूतन और पुरातन,दोनों प्रकार के विचारों के गठबंधन को देखकर आश्चर्यचकित रह जायेगा.यह बात रामायण के बंगाल या बम्बई वाले किसी भी पाठ में देखि जा सकती है.इन सब बातों को देखकर कोई भी इस नतीजे पर अवश्य पहुंचेगा की वाल्मीकि
रामायण में आगे चलकर बहुत फेर बदल हुआ .”
होपकिन्स के अनुसार ,”रामायण की रचना कब हुई,इसके बारे में
निश्चित रूप से कहना काठी कार्य है.लेकिन सुस्थापित
कथन यह है की राम वाली घटना पांडवो वाली घटना से अधिक पुराणी है .किन्तु ऐसा प्रतीत होता है की रामायण और महाभारत का लेखन कार्य साथ-साथ चला होगा .हो सकता है की रामायण के कुछ अंश महाभारत से
पेहले लिखे गए हों ,किन्तु इस बात में किसी तरह का संदेह नहीं हो
सकता की रामायण का अधिकांश भाग महाभारत के अधिकांश भाग के लिखे जाने के बाद लिखा
गया होगा.”
रामायण के मुख्य नायक श्रीराम और नायिका सीता है .यथार्थ में रामायण का मूल स्तोत्र दसरथ जातक है.मिथिला के राजा जनक (महाजनक जातक) और
चित्रकूट पर्वत (चुल्लहंस जातक)के घटनाओं
में कल्पनाओं का पुट देकर पूरी कहानी बना दी गई है. दसरथ
जातक में बताया गया है की राजा दसरथ वाराणसी के राजा थे और उनकी सोलह हजार रानियाँ
थी.उनकी पटरानी से राम पडित और लक्खन कुमार दो
पुत्र और सीता देवी एक पुत्री उत्पन्न हुई थी.पहली
पटरानी के मरने के बाद सोलह हजार रानियों में से एक नयी पटरानी नियुक्त की गई. उससे भरत नाम का एक और पुत्र उत्पन्न हुआ .बाकि
संपूर्ण कथा रामायण की कहानी की तरह चलती है .लेकिन
इसमें रावण का कोई प्रसंग नहीं है .राम पण्डित
बोधिसत्व थे और अपने पिता की आद्न्या मानकर वनदास चले गए थे .उनके साथ उनके छोटे भाई लक्खन कुमार और सीता देवी भी गई थी .वनवास से लौटने के बाद राम के राजा बनने पर सीता की शादी राम से कर दी गई.
ब्राम्हणों के द्वारा इस कहानी को रामायण में लिखतें समय थोडा परिवर्तन अवश्य कर दिया
गया है. दसरथ को वाराणसी के स्थान पर अयोध्या का राजा
और सीता को बहन के स्थान पर पत्नी दिखाया गया है .रावण की
कहानी काल्पनिक है .राम पण्डित के द्वारा लंका के राजा को मारना
बौद्ध धर्म के प्रति सुनियोजित षड्यंत्र प्रतीत होता है. हनुमान,सुग्रीव,जामवन्त
और लंका-दहन आदि सभी काल्पनिक प्रसंग जोड़ दिए गये है
.इन काल्पनिक प्रसंगों के जोड़ने का अभिप्राय
यह रहा होगा,जिससे इस बौद्ध कहानी का हिंदूकरण करके रोचक
और पौराणिक बनाया जा सके ,वैसे चूंकि श्रीलंका का राजधर्म बौद्धधर्म है, इसीलिए एक बौद्ध राष्ट्र और उसके बौद्ध राजा की छवि भूमिल करने के लिए
ब्राम्हणों ने यह काल्पनिक कहानी गढ़ी थीं .इस कहानी का मूल
दसरथ जातक पर निर्भर करता है.इस जातक में राम पण्डित बोधिसत्व (नायक)हैं और रामायण में भी राम को नायक ही बनाया
गया है .
(*************ब्राम्हणों ने राम के इसी अमानवीय एवं अनैतिक स्वरुप को आदर्श
एवं पुरुषोत्तम कह कर संबोधित किया था ,क्योंकि वैदिक-वांडमय (ब्राम्हणी) की
मान्यताओं और मापदंड के अनुसार इस प्रकार के दुर्गुण रखने वाला व्यक्ति ही आदर्श
पुरुष मन जाता है .उदहारण के लिए अपनी और चारों भाइयों की पत्नी
द्रौपदी को जुए में हारने वाला व्यक्ति युधिष्ठिर धर्मराज,अपनी पत्नी को व्यभिचार के लिए बेचने वाले हरिश्चंद्र को महादानी या
दानवीर,श्रीकृष्ण चरित्रहीन एवं १६,००० पत्नियां रखने वाला सोलह कलाओं से परिपूर्ण विष्णु का अवतार भगवान
आदर्श पुरुष कहा जाता है .इसी प्रकार व्यभिचारिणी अहिल्या,द्रौपदी,तारा,कुंती और मंदोदरी,इन पांच कन्याओं को महापातकों का नाश करने वाली प्रात: स्मरणीय कहा गया है .इसका तात्पर्य यह है की ब्राम्हणों ने तथागत
बुद्ध द्वारा प्रतिपादित समस्त नैतिक मान्यताओं को उलट कर रख दिया था.बुद्ध की दृष्टी में जो महापापी,अधम,अन्यायी और अत्याचारी था,ब्राम्हण उसे
सर्वश्रेष्ठ ,महाधार्मिक एवं पुण्यवान और सर्वश्रेष्ठ
आदर्श पुरुष थे,ब्राम्हण उसे अधार्मिक,पापी,निकृष्ट निम्न कोटि का व्यक्ति कहने लगे.इसका सबसे बड़ा कारण यह था की बौद्ध धर्म स्वतंत्रता,समानता,बंधुत्व और न्याय पर आश्रित है ,जबकि हिंदू धर्म परतंत्रता,असमानता,शत्रुता और अन्याय पर निर्भर करता है .यह इन
दोनों धर्मो में मुख्य भेद था .धीरे-धीरे ब्राम्हणों की चाल कपटपूर्ण अभिप्रायों,शातिर दिमागों,इतिहास की विडम्बना और अरबों के आक्रमणों से
बौद्ध धर्म भारत से लुप्त होता चला गया और ब्राम्हणों का पाखंडो ,अत्याचारों और अंधविश्वासों से परिपूर्ण हिंदू धर्म भारतीय समाज के रंग
मंच पर छा गया.इसी तरह भारत के मूलनिवासी बहुजन(नागवंशी=गणव्यवस्था=राक्षसगण=सावला रंग) के खिलाफ ब्राम्हणों ने अपना ब्राम्हणी(आर्यवंशी=चातुवर्ण व्यवस्था=देवगण=गोरा रंग ) धर्म हिंदू धर्म के नाम पर चलाया और चला रहे हैं .***************)
PART 1 FROM BAHUJAN
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