यह कोई कहानी नहीं है यह एक ऐसा सच है जिस से सारा भारत अनजान है लोगों को एक साजिश के जरिए हमारे विरोध भड़काया गया
भूमिका
यूं तो नवंबर१९८४ के सिख कत्लेआम पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है परन्तु मेरा इस विषय
पर लिखने का उद्देश्य तत्कालीन सरकार द्वारा अपने ही देश के नागरिकों पर
धोखे से कत्ल करने और जो कुत्सित तथा वीभत्स चालें चलीं और इन्हें कैसे
अंजाम दिया गया, उन सब का खुलासा करना है जिस से
देशवासी यह जान सकें कि उनकी अपनी ही सरकारें अपनी स्वार्थ पूर्ति और
सत्ता पर काबिज़ होने के लिए किस तरह प्रजा के खून की प्यासी हो जाती हैं,
इसका घृणित उदाहरण शायद ही कांग्रेस के अतिरिक्त दूसरा मिलेगा !
हालांकि भारतीय जनता पार्टी (एक हिंदूवादी पार्टी) ने भी भारत के
गुजरात प्रान्त में कांग्रेस के पद चिन्हों पर चलते
हुए मुसलमानों को क़त्ल करवाया था ! कडवा सत्य तो यह है कि भारत में
चाहे कांग्रेस हो या अन्य हिन्दू कट्टरवादी संगठन—- जब बात हिन्दू धर्म के
अतिरिक्त किसी भी अल्प संख्यक समुदाय के विरुद्ध हो तो यह सभी हिन्दू संगठन
एक ही साबित होते हैं—-एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं ये सब पार्टियाँ,
चेहरे जरूर अलग हैं जिस से इनकी असली पहचान छुप जाती है !
यह कोई इतिहास का
पहला उदाहरण नहीं है जहाँ कि किसी देश की सरकार ने अपने ही देशवासियों के
कत्ल करवाए हों? अनेकों उदाहरण मौजूद हैं जैसे यूगोस्लाविया के
राष्ट्रपति द्वारा मुस्लिमों का क़त्ल, हिटलर द्वारा यहूदियों का क़त्ल,
मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक द्वारा अपने ही देश
के ९०० आंदोलनकारियों की तहरीर चौक पर नृशंस हत्या, चीन द्वारा
तिनानमिन चौक पर ३००० युवाओं की गोलीबारी में हत्या आदि उदाहरण हैं परन्तु
भारतवर्ष को आजाद हुए अभी कुल ३७ वर्ष ही बीते थे और जिस की आज़ादी की
प्राप्ति के लिए स्वतन्त्रता आन्दोलन में इसी सिख कौम ने
सर्वाधिक बलिदान दिए थे फिर भी तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा
यह कत्लेआम इस स्वाभिमानी कौम को कुचल नहीं सका और न ही इस कौम के युवाओं
का मनोबल तोड़ सका?
तो क्या मिला भारत की इस कांग्रेस
सरकार को इस कत्लेआम द्वारा? क्या इस से देश में शांति स्थापित हो सकी?
नहीं! वास्तव में देखा जाये तो अगले दस वर्षों तक आतंकवाद अपनी चरम सीमा पर
रहा और पंजाब की कांग्रेस सरकार ने लाखों बेगुनाह सिख युवकों का
बड़ी बेरहमी से झूठे मुकाबलों में कत्ल कर डाला !
आज सिख कौम दुविधा में है कि इस देश को
अपना कहा जाए या नहीं ? सिर्फ सिख कौम के पास कमी है तो एक निर्भीक और
साहसी सिख नेता की ! जिस दिन कोई सिख नेता, सिख कौम को मिला तो उसी दिन इस
का फैसला हो जाएगा कि सिखों का भविष्य क्या भारत से जुड़ा है या नहीं?
परन्तु क्या आप बिना पंजाब और बिना सिखों के इस देश की कल्पना कर सकते हैं?
इस के अगले विभाजन के लिए कौन जिम्मेदार होगा—-क्या स्वयं कांग्रेस ही
नहीं?
वैसे तो इसी
कांग्रेस पर १९४७ के देश विभाजन का आरोप भी है ! यदि इस के लीडर चाहते तो
इस देश का विभाजन न होता और विभाजन का दंश इस महाद्वीप को न झेलना पड़ता !
३५ करोड़ की कुल जनसंख्या वाले इस भारतीय उप-महाद्वीप
में १० लाख लोग मारे गए और लगभग एक करोड़ अपनी भूमि से विस्थापित हुए !
तो क्या कांग्रेस ने कोई सबक सीखा—-नहीं ? यदि सीखा होता तो १९८४ का
सिखों का कत्लेआम न करती !
१९८४
में इंदिरा गाँधी जो कि भारत की प्रधान मंत्री थीं और जवाहरलाल नेहरु की
बेटी थीं, ने सिखों के पवित्रतम स्थान श्री दरबार साहिब या
जिसे स्वर्ण मन्दिर या (गोल्डेन टेम्पल ) भी कहते हैं, पर भारतीय
फौज द्वारा हमला करवाया गया ! इस हमले पर पूरी खोजपूर्ण रिपोर्ट तो आगे
लिखूंगा परन्तु अभी तो उन कारणों को
लिखना आवश्यक है जिस ने सरकार को इस स्थिति में पहुँचाया कि जिस से इस
पवित्रतम स्थल को टैंकों के गोलों का शिकार बनना पड़ा और जिसे सिख कभी भी
अपने दिल से नहीं निकाल सकते —-कभी नहीं भूल सकते!
जनरल एस के
सिन्हा जो वैस्टर्न कमांड के जी-ओ-सी इन सी थे, उन्हों ने अपनी पुस्तक में
खुलासा किया है कि स्वर्ण मंदिर पर हमले की तैयारी पिछले १८ महीनों से
देहरा दून (उत्तराखंड) के समीप स्थित ‘चकराता’ नामक स्थान पर की जा रही थी,
जहाँ इस आक्रमण के लिए स्वर्ण मंदिर के कुछ हिस्सों का कच्चा निर्माण भी
किया गया था जिस से सैनिकों को उचित ट्रेनिंग दी जा सके और आक्रमण की
सफलता के लिए इस स्थान की भौगोलिक स्थिति से सैनिकों को परिचित करवाया जा
सके! इस का अर्थ है कि संत भिंडरांवाले के श्री अकाल तख़्त में शरण लेने से
पहले से ही भारत सरकार ऐसी परिस्थितियों का निर्माण कर रही थी जिस से इस
पवित्रतम स्थान पर हमला किया जा सके और सिखों को सबक सिखाया जा सके?
वह सबक क्या था—-असल में तो सिखों को कोई सबक सिखाने की
आवश्यकता नहीं थी—-आवश्यकता थी तो स्वयं इंदिरा और भारत सरकार को सीखने की !
अपनी पुस्तक में जनरल सिन्हा दूसरा
बड़ा खुलासा करते हैं कि उन्हें इंदिरा गाँधी द्वारा चौक मेहता,
जिला बटाला स्थित संत जरनैल सिंह जी के दमदमी टकसाल के मुख्यालय को टैंकों
से उड़ाने का हुकम दिया था जो कि पंजाब का एक प्राचीनतम गुरुद्वारा और
धार्मिक पाठशाला भी है ! जनरल सिन्हा ने इस हुक्म को यह कह कर मानने से
इंकार कर दिया था कि इससे भारतीय सेना के सिख सैनिकों और अफसरों की धार्मिक भावनाएं आहत होंगी और उनमें निराशा उत्पन्न होगी जो कि देश और भारतीय सेना के लिए उचित नहीं होगा? उन्हें इसके लिए दंडित भी किया गया! वे भारत की सेना
के अगले मुख्य सेनापति का प्रभार संभालने वाले थे और उन्हें दिल्ली में
इसकी ट्रेनिंग भी दी जा रही थी परन्तु अचानक ही इंदिरा गाँधी द्वारा जनरल
ए के वैद्य को भारत की सेना का मुख्य सेनापति घोषित कर दिया ! जिस से
क्षुब्ध हो कर इस स्वाभिमानी जनरल सिन्हा ने अपने सम्मान की खातिर अपने
पद से इस्तीफा दे दिया था !
भारतीय हाकी संघ के भूतपूर्व प्रमुख अश्विनी कुमार जो बी एस एफ में डी आई जी के पद पर १९७४ में श्रीनगर—कश्मीर में तैनात थे—-ने
अप्रैल २००६ में दिल्ली में एक सम्मान समारोह जो कि १० महान भारतीय सिख
ओलम्पिक खिलाडियों के सम्मानार्थ रखा गया था, में अपने दिए गए भाषण में
यह रहस्योदघाटन किया था ……...
कि एक दिन उन्हें इंदिरा गाँधी का अति आवश्यक संदेश प्राप्त हुआ जिस में
उन्हें फौरन ही दिल्ली पहुंच कर इंदिरा गाँधी से मुलाकात करने के लिए
कहा गया था ! उन्होंने तुरंत श्रीनगर से दिल्ली की फ्लाइट पकड़ी और इंदिरा
गाँधी को अपने आगमन की सूचना दी! इंदिरा ने उनसे एक ही प्रश्न किया कि
शिक्षा मंत्री ने उनके ध्यानार्थ एक संदेश भेजा है कि आप बहुत अधिक संख्या में हाकी के खेल में
सिख युवकों को क्यों ले रहे हो? उन्होंने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी,
चुप बैठे रहे, जबकि भीतर से वे काफी उद्वेलित थे ! उन्होंने इंदिरा जी से
क्षमा मांगी और अश्विनी कुमार बिना कोई जवाब
दिए वापिस अपने गेस्ट हॉउस आ गये और आते ही सबसे पहला काम उन्होंने यह किया
कि इंदिरा को अपना इस्तीफ़ा भेज दिया क्योंकि वे भारत की टीम की
अंतराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित प्रतिष्ठा को खोते हुए नहीं देखना चाहते थे
! और अब आप सब ही भारत की हाकी टीम और इस खेल को ख़त्म होते हुए स्वयं देख
चुके हैं !
१९७५ में
इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा इंदिरा गाँधी को भ्रष्ट-पूर्ण तरीकों से
सत्ता हथियाने और चुनाव जीतने के दोष में जस्टिस सिन्हा द्वारा
६ वर्षों के लिए चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था परन्तु
बेशर्मी तो देखिये कि इस स्त्री ने प्रधान मंत्री पद का अपने निजी
स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करते हुए देश में इमरजेंसी लगा दी ! विपक्ष के
सभी प्रमुख नेताओं को जेल में डाल दिया गया था! कोई इंदिरा के
खिलाफ बोलने वाला न बचा था! नारा भी दिया गया था कि “भारत इंदिरा है और
इंदिरा ही भारत है!” खैर भारत तो आज भी है लेकिन क्रूर इंदिरा का
कहीं पता नहीं है ! अब विपक्ष तो था नहीं, इंदिरा एक
निरंकुश शासक बन गयी थी ! स्वाभिमानी सिखों को यह गवारा न हुआ और उन्होंने
ने इसके और इमरजेंसी के खिलाफ अपना मोर्चा (आन्दोलन) खोल दिया !
रोजाना १०० - १०० बंदे जत्थे बना
कर जेल जाने लगे ! अंत में बौखला कर इंदिरा ने जेल से विपक्ष के सभी नेताओ
को रिहा करना शुरू कर दिया ! परन्तु इससे इंदिरा सिखों की अत्यंत विरोधी
हो उठी क्योंकि सिखों द्वारा और पंजाब से ही इमरजेंसी के खिलाफ
यह पहली आवाज़ उठी थी ! तब से इंदिरा ने ठान लिया पंजाब और सिखों को सबक
सिखाने का और उसने अपनी नफरत में वह भयंकर ऐतिहासिक भूल कर डाली जिस की
कीमत उसे अपनी जान गवां कर
चुकानी पड़ी! इतना ही बस नहीं, अमृतसर के दरबार साहिब पर किये गये हमले के
उपरांत उसे यह एहसास हो गया था कि अब सिख उसे जिन्दा नहीं छोड़ेंगे, इसलिए
उसने अपने जीवन के अंतिम समय में सिखों के विरुद्ध कुत्सित चालें चलनी शुरू कर दीं !
वीर सांघवी– जो कि भारत के प्रमुख समाचार पत्र हिंदुस्तान टाइम्स के चीफ एडिटर हैं, ने सोनिया गाँधी का एक इंटरव्यू लिया था जो कि यू-ट्यूब पर
भी देखी जा सकती है, इस इंटरव्यू में सोनिया स्वयं कहती हैं कि इंदिरा
गाँधी अमृतसर के हमले के बाद से ही अपने बेटे राजीव गाँधी से अपनी
आकस्मिक मृत्यु के उपरांत क्या-क्या और कैसे करना है, इस पर दिशा-निर्देश
देती रहती थीं ! जिस का सीधा अर्थ है अपनी हत्या के प्रयत्न अथवा हत्या होने के उपरांत की
दशा में सिखों से कैसे बदला लिया जाये —वे राजीव को यह बताती थीं !
भारतीय प्रशासन और पुलिस तथा सेना के प्रमुख उच्च पदों पर उसके विश्वसनीय
तथा हितैषी अधिकारी तैनात थे अत : उन की सहायता से सिख कौम का दमन कैसे करना है—-इस का पाठ पढाती थी!
अकाली दल
सिखों का एक राजनीतिक दल है परन्तु इस पर सिख धर्म की रक्षा का भार भी है!
पंजाब के राजनीतिक पटल पर सिखों के साथ होते राजनीतिक भेदभाव और
केंद्रीय सरकार के द्वारा राज्यों को कमजोर करने के खिलाफ अकाली दल द्वारा
१९७३ में ‘आनंदपुर साहिब प्रस्ताव’ पेश किया गया था जिस में भारतवर्ष के
संपूर्ण राज्यों को और
अधिक अधिकार देने तथा स्वावलम्बी बनाने हेतु कुछ उपाय पास किये गये थे!
यह केंद्र की राज्यों पर पकड़ कमजोर करता था परन्तु इससे देश को फायदे अधिक
होने थे! इंदिरा और कांग्रेस सरकार इसकी विरोधी थी! इसके पास हो जाने से
राज्यों में केंद्र की दखलंदाज़ी बंद हो जाती इस से केंद्र, राज्यों में
हस्तक्षेप नहीं कर पाता! यही कारण था कि इस प्रस्ताव से इंदिरा की राजनीतिक
महत्वाकांक्षा को विराम लगता और यह उसे मंजूर न था !
इस कारण अकालियों और इंदिरा के
बीच समझौते की प्रक्रियाएं प्रारंभ हुईं परन्तु जब भी
इन विवादित मुद्दों पर कोई बैठक होती तो अकाली दल इंदिरा द्वारा
प्रस्तावित समझौतों पर हामी भर देता था परन्तु हठी इंदिरा अपने राजनीतिक
स्वार्थ में अंधी होकर अपने ही किये गये वादों से पीछे हट जाती थी!
परन्तु आकाशवाणी और दूरदर्शन पर सरकारी प्रभाव और नियंत्रण होने के कारण
इनके द्वारा झूठा प्रोपेगेंडा किया जाता था और अकाली दल तथा सिखों के
विरोध में माहौल तैयार किया जाता था! देश भर में सिखों को ही
बदनाम करते हुए अपने को पाक साफ़ घोषित करवाती थी इंदिरा! अत: उसकी इन
हरकतों से यह संकेत तो सिखों को प्राप्त हो गया था कि इंदिरा
किसी शांतिपूर्ण समझौते के पक्ष में नहीं है, वह केवल सिखों के खून की
प्यासी है !
इसी दुर्भावना के चलते ही उसके द्वारा
श्री दरबार साहिब पर किये गये फौजी हमले को यह कह कर उचित ठहराने की
कोशिश की गई कि इंदिरा जी सदा के लिए इस पवित्र स्थान से आतंकवादियों को
समाप्त करना चाहती थीं और इसकी पवित्रता और मर्यादा बहाल रखने के लिए ही यह
फौजी कार्रवाई अत्यंत आवश्यक थी तो क्या भारतीय सरकार यह बताने का
कष्ट करेगी कि यदि सिर्फ श्री दरबार साहिब जी पर हमला उसकी पवित्रता
बनाये रखने के लिए और आतंकवादियों को वहां से निकाल बाहर करने के लिए था तो
पंजाब के अन्य ४० से अधिक गुरुद्वारों को क्यों निशाना बनाया गया ? इन सभी गुरुद्वारों पर हमला करके युवा अमृतधारी सिखों का कत्ल क्यों किया गया?
पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने इंदिरा गांधी के मुगलों के लिए संबंध के बारे में एक दिलचस्प रहस्योद्घाटन किया अपनी पुस्तक "profiles and letters " (ISBN: 8129102358) में किया! यह कहा गया है कि 1968 में इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री के रूप में अफगानिस्तान की सरकारी यात्रा पर गयी थी! नटवर सिंह एक आई एफ एस अधिकारी के रूप में इस दौरे पर गए थे! दिन भर के कार्यक्रमों के होने के बाद इंदिरा गांधी को शाम में सैर के लिए बाहर जाना था! कार में एक लंबी दूरी जाने के बाद, इंदिरा गांधी बाबर की कब्रगाह के दर्शन करना चाहती थी, हालांकि यह इस यात्रा कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया! अफगान सुरक्षा अधिकारियों ने उनकी इस इच्छा पर आपत्ति जताई पर इंदिरा अपनी जिद पर अड़ी रही! अंत में वह उस कब्रगाह पर गयी! यह एक सुनसान जगह थी! वह बाबर की कब्र पर सर झुका कर आँखें बंद करके खड़ी रही और नटवर सिंह उसके पीछे खड़े थे! जब इंदिरा ने उसकी प्रार्थना समाप्त कर ली तब वह मुड़कर नटवर से बोली "आज मैंने अपने इतिहास को ताज़ा कर लिया (Today we have had our brush with history ". यहाँ आपको यह बता दे कि बाबर मुग़ल साम्राज्य का संस्थापक था!
नोट: यद्यपि इस प्रसंग का इस पुस्तक से कोई संबंध नहीं लेकिन पाठकों की जानकारी के लिए इसे उधृत करना आवश्यक समझा गया!
अंग्रेजों ने तो अपने साथियों की
स्मृति चिर-स्थाई बनाने के लिए कलकत्ता में होल्वेल स्मारक का
निर्माण कराया था जो सदा ही भारतियों की हृदयहीनता की याद दिलाता
रहेगा परन्तु हमारी विडंबना तो देखिये कि हम आज २८ साल बाद भी कोई
यादगार अपने विछुड़े साथियों और निर्दोष शहीदों की याद में नहीं बना सकते !
इस पर भी भारत सरकार को इतराज़ है ! आखिर क्यों? सरकार के पाबंदी लगा देने
से क्या सिख लोग फौज की ज्यादतियों और सरकार के दमन को भूल जायेंगे —-
कदापि नहीं!
तो
इस पुस्तक में हम पंजाब में कांग्रेस के कुत्सित राजनितिक खेल, इंदिरा की
सत्ता लोलुपता और सिखों से भारतीय सरकार तथा हिंदूवादी अफसर शाही द्वारा
किये गए छल-कपट का विस्तार पूर्वक खुलासा करेंगे और पाठकों को
वास्तविक परिस्थतियों से अवगत करवाएंगे कि क्या दरबार साहिब पर हमला उचित
था और क्या सिखों पर किये गए दमन चक्र से आज २८ साल भी भारत की स्थिति
बेहतर हुई है — इस पर विस्तारपूर्वक चर्चा करेंगे !
इंदिरा गाधी की हत्या :
३१ अक्टूबर १९८४,
दिन बुधवार को सुबह ०९.३० पर रेडियो बी बी सी द्वारा समाचार प्रसारित किया
गया कि, इंदिरा गाँधी अब नहीं रहीं, उन्हें, उनके दो सिख बड़ी गार्डों तथा
एक मोने व्यक्ति द्वारा उनके निवास स्थान पर ही गोली मार दी गयी !
यह तो आसानी से पता चल गया कि वे दोनों सिख बाड़ी गार्ड कौन थे परन्तु तीसरे मोने व्यक्ति की पहचान आज तक गुप्त बनी हुई है !
विदेश स्थित भारत के सभी दूतावासों और
भारतीय उच्चायोगों को एक सरकारी टेलेक्स संदेश ३१ अक्टूबर की सुबह के
लगभग ११.०० बजे भेजा गया था जिसमें यह स्पष्ट लिखा गया था कि इंदिरा को
गोली मारने वालों में २ सिख तथा एक मोना व्यक्ति था ! तो वो तीसरा मोना
व्यक्ति कौन था —-इसकी जानकारी क्यों नहीं दी जाती? इस प्रश्न को पंजाब
एवं हरियाणा हाई कोर्ट के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री आर एस नरुला ने
नानावटी कमीशन जो कि ०८-०५-२००० को सिख दंगों की जांच के लिए एक अध्यादेश
द्वारा नियुक्त किया गया था ! अपनी ३० प्रश्नों की प्रश्नावली में सब से
प्रथम प्रश्न भी यही पूछा गया है !
वे दोनों सिख बाड़ी गार्ड थे बेअंत
सिंह और सतवंत सिंह ! ये दोनों दिल्ली पुलिस की सेवा में थे और बेअंत सिंह
इंस्पेक्टर के पद पर १९८० से इंदिरा की सुरक्षा में तैनात था, सतवंत सिंह
नया रिक्रूट था और अभी हाल ही में उसकी नियुक्ति भी इंदिरा की सुरक्षा में
हुई थी ! बेअंत सिंह ने अपनी पिस्तौल से गोली चलाई थीं और सतवंत सिंह ने
अपनी कार्बाइन खाली की थी! परन्तु तीसरे व्यक्ति ने कौन सा हथियार
इस्तेमाल किया, इसकी कोई प्रमाणिक जानकारी आज तक उपलब्ध नहीं हुई है!
बेअंत सिंह और सतवंत सिंह को पहरे पर
तैनात आई टी बी पी के जवानों द्वारा हिरासत में ले लिया गया था! इन्होने
बिना किसी प्रतिरोध के आत्म-समर्पण किया था! शेरों की तरह निर्भीक होकर
बोले थे कि, “हमने जो करना था कर दिया अब तुम्हें जो करना है कर लो! “इतना सुनते ही
और इंदिरा को ज़मीन पर लहू-लुहान पड़े देख कर आई टी बी पी के जवानों ने इन
दोनों निहथों पर (जो अपने को इनके हवाले कर चुके थे) (जो कि
आत्म-समर्पण कर चुके थे और हिरासत में थे) को गोली मार दी! यह गोली हत्या
के सूत्र मिटने के उद्देश्य और हत्या के पीछे बड़ी हस्तियों की पहचान गुप्त बनाये रखने के लिए की गयी थी न कि आवेश में की गयी कार्रवाई थी! तीसरे मोने व्यक्ति को भागने का अवसर दे दिया गया और आज तक उसकी पहचान गुप्त बनी हुई है!
भूतपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति राबर्ट कैनेडी के हत्यारे ली ओसवाल्ड को भी किसी ने गोली मार दी थी और फिर उस हत्यारे को भी मार डाला गया था जिस से हत्या के सूत्र मिट गये थे !
स्वयं इंदिरा गाँधी भी
अपने जीवन काल में यह हत्या के सूत्र मिटने का खेल बहुत खूबी से खेल
चुकी हैं! उन्होंने एक बार भारतीय स्टेट बैंक के कनाट प्लेस स्थित मुख्य
शाखा के प्रमुख कैशियर श्री मल्होत्रा को फोन करके ६० लाख
रुपये अचानक देने के लिए कहा और
अपने आदमी को भेजने की बात कही! यह आदमी था मेजर नागरवाला. वह आया और बड़े
आराम से बिना किसी लिखा पड़ी के मल्होत्रा जी से ६० लाख रुपये (आज उस
रकम की कीमत शायद ६० करोड़ से भी ज्यादा हो). अब मेजर नागरवाला गायब हो
चुका था! बाद में इसकी पुलिस रिपोर्ट लिखवाई गयी जब इंदिरा जी को यह रकम
नहीं मिली परन्तु अपने स्वभाव के अनुसार वे मुकर गयीं कि उन्होंने कोई फोन
नहीं किया था! अब पुलिस तलाश में जुट गयी !
परन्तु इस घटना से
एक जानकारी तो मिलती है कि इंदिरा द्वारा अपने पद के प्रभाव से पहले भी
ऐसे ही पैसों का लेन-देन अवश्य किया जाता होगा जिस कारण से इस बार भी
मल्होत्रा जी ने पैसे सिर्फ एक फोन के सुनते ही फौरन दे दिए थे!
खैर कुछ दिनों में मेजर नागरवाला पकड़ा गया,
कुछ पैसे उस ने स्कूटर की स्टरप्नी में छुपा रखे थे जबकि उस के पास स्कूटर
था ही नहीं! अब पुलिस के लाक अप में परेशान होकर मेजर नागरवाला ने
अगले दिन अदालत में बयान देने की बात कही लेकिन उसी रात पुलिस हवालात में
ही दिल का दौरा पड़ने से उसकी मृत्यु हो गयी! बयान क्या देना था !
उसकी हत्या ही कर दी गयी थी!
एक पुलिस
अधिकारी एस आई डी डी कश्यप को इस केस की जांच पर लगाया गया ! कुछ दिनों
बाद यह पुलिस अधिकारी अपने ही विभाग की गाडी से दुर्घटना का
शिकार हुआ और उसकी भी मृत्यु हो गयी !
पुलिस के
जिस ड्राइवर द्वारा यह दुर्घटना हुई थी, कुछ दिनों में उसकी भी मृत्यु हो
गयी! फिर सब कड़ियाँ विलुप्त हो चुकी थीं और इस तरह इंदिरा जी पर
कोई आंच नहीं आई थी ! तो भारतीय कांग्रेस भी इस खेल से अच्छी तरह वाकिफ थी!
इस तरह
इंदिरा के दोनों सिख हत्यारों को आई टी बी पी के जवानों द्वारा
कत्ल करने की कोशिश की गयी! बेअंत सिंह जी की तो मौके पर ही मृत्यु हो गयी
थी परन्तु सतवंत सिंह बच गया था! इस ने भी पुलिस को कोई विशेष जानकारी नहीं
दी थी!
इन दोनों सिख बाड़ी
गार्डों को किसने उकसाया और क्या किसी और भी महत्वशाली व्यक्ति का हाथ इस
हत्या के पीछे था, उसकी पहचान सदा के लिए मिटाने का यह एक कुत्सित
षड्यंत्र था ! और देखिये कि इस तीसरे मोने व्यक्ति की पहचान आज तक नहीं हो पाई है!
इंदिरा
को उसकी मृत्यु के अहसास ने उसके आखिरी ४ दिनों में बहुत ही उद्वेलित कर
दिया था! यह मूर्त रूप से दिखाई दिया था जब उन्होंने भुवनेश्वर की एक जन
सभा में २९ अक्टूबर की देर शाम को प्रकट किए थे! इसके बाद उड़ीसा के गवर्नर
बी एन पांडे से रात्रि भोज की अपनी मुलाकात में इस विषय को छेड़ भी दिया
था! विचार उसके दिमाग में मंथन करते रहे जब कि वह ३० अक्टूबर को दिल्ली भी आ
पहुची थी! वह धार्मिक प्रवृति की न थी इस लिए पश्चाताप भी नहीं कर सकती
थी!
इंदिरा
अपनी हत्या किए जाने के अहसास से भी काफी विचलित थीं! इसलिए उन्होंने अपने
विश्वसनीय सहयोगियों, उच्च पदों पर अपने भरोसे के प्रशासनिक अधिकारीयों से
मिलकर सिखों के विनाश करने और उन्हें सबक सिखाने की एक भयंकर योजना तैयार
की! उन्हें यह तो पता चल ही गया था कि सिख काफी धार्मिक प्रव्रत्ति के लोग
है और धर्म को अपने जीवन से अधिक महत्व देते हैं! इंदिरा ने पहले भी उसी
वर्ष अमृतसर में जून के महीने में ही सिखों के पवित्रतम स्थल दरबार साहिब
पर सिखों के पांचवें गुरु अर्जन देव जी के शहीदी दिवस पर आपरेशन ब्लू स्टार
करके यह जान लिया था कि सिख बेख़ौफ़ होकर गुरु पूरब वाले दिन अपने
परिवारों सहित गुरूद्वारे अवश्य जाते हैं, इस कारण वे अधिकतर अपने परंपरागत
हथियार किरपान (तलवार) से जुदा होते हैं और उन्हें घरों से बाहर मारना भी
आसन होगा, वे प्रतिरोध करने अथवा स्वयं अपने को या अपने परिवारों को बचाने
में सक्षम नहीं होंगे! उनकी इस धार्मिक कमजोरी का फायदा उठाने के लिए उसी
वर्ष नवंबर १९८४ के गुरु नानक जयंती को सिखों के विनाश के लिए एक भयंकर
योजना तैयार कर ली गई!
इस
योजना के तहत पंजाब के सीमावर्ती जिलों जैसे, गुरदासपुर, अमृतसर, आदि में
सिखों की घनी आबादी वाली क्षेत्रों पर भारतीय वायु सेना के बम वर्षक जहाजों
से बम वर्षा की जानी थी और फिर एक तीर से दो निशाने लगाने थे! भारत सरकार
के झूठ प्रसारण केन्द्रों आकाशवाणी (रेडियो) तथा टी वी दूर दर्शन द्वारा यह
घोषणा की जानी थी कि सिख पाकिस्तान से मिल गए हैं, इस से देश भर में
जनता को सिखों के विरुद्ध उकसाया जाता और उनकी हत्याओं के लिए माहौल तैयार
किया जाता! इसके पश्चात हवाई हमलों की सारी जिम्मेदारी पाकिस्तान पर डाल दी
जाती और उस पर आक्रमण किया जाता! (इस योजना का पूरा ब्यौरा आगे दिया गया है )
बेअंत
सिंह जो दिल्ली पुलिस में सब इंस्पेक्टर रैंक पर था और इंदिरा गाँधी के
सुरक्षा दस्ते में तैनात था, को इस विनाशकारी योजना की भनक लग गई और उसने
इसका विरोध करने का दृढ निश्चय कर लिया! इसके लिए उसने सतवंत सिंह को अपने
साथ इंदिरा को रोकने की अपनी योजना में शामिल कर लिया!
३१
अक्टूबर १९८४ को सुबह लगभग ९.०० बजे बेअंत सिंह ने अपनी सर्विस रिवाल्वर
से एक मिनट से भी कम समय में इंदिरा के पेट में ५ गोलियां दाग दीं! तब
सतवंत सिंह ने भी अपनी स्व-चालित कार्बाइन की सभी गोलियां इंदिरा के शारीर
के सामने वाले हिस्से (उदर) में डाल दीं! वैसे तो केवल सिर में मारी गई एक
गोली ही हत्या के लिए काफी होती लेकिन सिर में बिना निशाना लिए मारी गई
गोली चूक कर किसी और के भी लग सकती थी और वे किसी अन्य की जान लेना नहीं
चाहते थे! इसलिए उन्होंने सभी गोलियां पेट और छाती पर ही मारीं! उन्हें यह
भरोसा था कि इंदिरा ने उस दिन बुलेट प्रूफ जाकेट नहीं पहनी होगी! बेअंत
सिंह ने सतवंत सिंह को यह निर्देश दे रखा था कि उसके परम दोस्त आर के धवन
को कोई गोली न लगने पाए! धवन भी उस दिन इंदिरा के साथ ही चल रहे थे! यही
कारण था कि इंदिरा को जब गोलियां मारी गईं तो कोई और जख्मी नहीं हुआ था, एक
पुलिस अधिकारी को गोली लगी थी जो कि इंदिरा को बचाने उस की ओर झुका था
अन्यथा साथ चलने वाले ५-६ बन्दों में से किसी को कोई गोली न लगी थी! ऐसी
सावधानी उन दोनों ने रखी थी!
इंदिरा
को गोली मार देने के बाद दोनों ने अपने हथियार डाल दिए और वीरता पूर्वक
दृढ विश्वास के साथ बोले कि, 'हमने जो करना था कर दिया अब तुमने जो करना है
तुम कर लो!'
बी बी सी के
संवाददाता सतीश जैकब भाग्यवश ही उस दिन इंदिरा गाँधी की कोठी के आगे से
गुजर रहे थे कि अचानक उन्हें कुछ अजीब सी हलचल महसूस हुई, उन्होंने देखा कि
एक सफ़ेद अम्बैसेडर कार में सोनिया गाँधी बदहवास स्थिति में किसी को लेकर
पिछली सीट पर बैठी थीं और वह कार तीव्रता से उनके सामने से गुजर गयी, वे
केवल एक झलक ही देख सके थे ! उन्हें इंदिरा का चेहरा दिखाई दे गया था !
फौरन ही उन्होंने अपना स्कूटर उस कार के पीछे लगा दिया ! तेजी से चलती वह
अम्बैसेडर कार आल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्युट के भीतर दाखिल हुई ! जब तक
सतीश जैकब वहां पहुँच पाते, उस से पहले ही इंदिरा गाँधी को
आपरेशन थियेटर में ले जाया जा चुका था ! सतीश जैकब को यह नहीं पता था कि
क्या हुआ है ? उन्होंने अपनी रिपोर्टर की
खोजी बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए वहां पहुँच कर पूछा कि, “क्या हालत है,
क्या वे ठीक हैं?” यह कहते हुए उन्होंने अँधेरे में तीर चलाया जो ठीक
निशाने पर लगा और उन्हें उचित जवाब मिला कि इंदिरा जी की हालत ठीक नहीं है, उन्हें गोलियां लगी हैं !
यह जानकर उन्होंने तुरंत लन्दन आफिस के
लिए ट्रंक काल बुक की और आपरेटर से अत्यंत आवश्यक सूचना और अपने प्रेस से
संबंधित होने का हवाला दिया ! यह काल तुरंत लगा दी गयी और उन्होंने यह अति
महत्वपूर्ण सूचना बी बी सी को दी जिसे तुरंत प्रसारित किया गया !
उस दिन सुबह ०८.३० बजे पीटर उस्तीनोव,
बी बी सी के लिए एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने के लिए इंदिरा गाँधी पर
शूटिंग करने के लिए वहां आये हुए थे ! उन्हें सुबह ०८.३० बजे का समय दिया
गया था ! इंदिरा गाँधी ने इससे पहले अपने को शूटिंग के लिए तैयार करना
शुरू किया ! उनके प्रसाधन कक्ष में उनके हेयर डिजाईनर प्रकाश
किशन निगम उपस्थित थे! परन्तु थोड़ी देर बाद ही पीटर उस्तीनोव का सन्देश
आया कि वे शूटिंग का समय बढाना चाहते थे क्योंकि उनका स्टाफ वहां नहीं
पहुँच पाया था ! समय बदल कर ०९.२० का कर दिया गया था!
अत: सुबह ०९.२० पर इंदिरा गाँधी तैयार
होकर अपने निवास १ सफदरजंग रोड से साथ लगती दूसरी ओर की बिल्डिंग १
अकबर रोड —जहाँ उनका सरकारी दफ्तर था, की ओर चल दीं ! इन दोनों कोठियों को
एक खुले द्वार से पार करना होता था! इस द्वार पर उस दिन ड्यूटी
पर सतवंत सिंह उपस्थित था और बेअंत सिंह ने भी अपनी ड्यूटी
वहीँ लगवा ली थी! जैसे ही इंदिरा गाँधी इस द्वार की ओर आईं तो ….बेअंत सिंह
ने अपना रिवाल्वर इंदिरा गाँधी की ओर तान दिया! यह देखकर इंदिरा गाँधी
भौंचक्की रह गयीं और उन्होंने बेअंत सिंह से पूछा कि, “यह क्या कर रहे हो?”
जवाब देने की बजाय बेअंत सिंह ने अपने सर्विस रिवाल्वर से इंदिरा गाँधी पर
गोलियां दाग दीं ! फिर उन्होंने सतवंत सिंह को भी तुरंत कार्रवाई करने
के लिए कहा जिससे इंदिरा के बचने का कोई अवसर शेष न हो! और तब सतवंत सिंह
ने भी अपनी कार्बाइन की सारी मैगज़ीन इंदिरा पर खाली कर दी !
यहाँ एक सवाल तो जरूर उठता है कि क्या
पीटर उस्तीनोव द्वारा फिल्म की शूटिंग का समय बदलना मात्र एक संयोग था
या यह भी षड्यन्त्र की एक कड़ी का हिस्सा था? इस बारे कोई तथ्य सामने नहीं
आया है !
दोनों सिख बाड़ी
गार्डों द्वारा आत्म समर्पण के बावजूद उनकी हत्या करने की असफल कोशिश की
गयी परन्तु इस प्रयास में बेअंत सिंह जी की घटना स्थल पर ही मृत्यु हो गयी
थी और सतवंत सिंह गम्भीर रूप से जख्मी हुआ था ! उसकी रीढ़ की हड्डी में
गोली धंस गयी थी जिसे जान बूझ कर डाक्टरों द्वारा नहीं निकला गया था! इस का
दूसरा मुख्य कारण था उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करना! इलाज न
करने से वह आखरी दम तक पीड़ा से तडपता रहा था परन्तु सतवंत सिंह ने
भारत की किसी भी अदालत से या भारत के राष्ट्रपति से रहम की अपील नहीं की
थी! उसने बहादुरी की मिसाल कायम रखते हुए फांसफंदा गले में डाल लिया था !
उसकी मंगेतर सुरिन्दर कौर ने भी सारी ज़िन्दगी फिर शादी नहीं की थी और उसकी
तस्वीर से ही अपनी शादी सिख रीति के
अनुसार (आनंद कारज द्वारा) विधि पूर्वक शादी की और जीवन भर सतवंत की ही
याद में व्यतीत की ! अंत में जवान उम्र में ही कैंसर से उसकी मृत्यु हुई और
वह अपने पति से ईश्वर लोक में—-स्वर्ग में जा मिली !
परन्तु तीसरे
व्यक्ति के बारे में भारत की ख़ुफ़िया एजेंसियां खामोश हैं और भविष्य में
शायद ही कभी इसकी कोई प्रमाणिक जानकारी मिल सके !
इससे एक दिन पूर्व इंदिरा गाँधी
उड़ीसा के दौरे पर थीं! भुवनेश्वर की एक सभा में उन्होंने दावा किया था कि
उनकी मृत्यु के उपरांत उनके खून का एक-एक कतरा देश को और
मजबूती प्रदान करेगा परन्तु क्या सिख कांग्रेस द्वारा किये गए इस
नरसंहार को भूल पाएंगे और इस देश को अपना देश समझेंगे —-आज २८ साल बाद
मुझे तो ऐसा कहीं प्रतीत नहीं होता ! हाँ कुछ स्वार्थी तत्व सिखों में भी
हैं जो यह झूठा दावा कर सकते हैं पर यदि इस पर निष्पक्ष वोटिंग करवा ली
जाए तो भारत सरकार को पता चल जायेगा कि सत्य क्या है! अब सिख अपना
स्वतंत्र देश चाहते हैं! क्योंकि वे नहीं चाहते कि उनकी भावी पीढ़ियों के
साथ भी कभी भारत सरकार या इस देश के बहु संख्यक हिन्दू उनके साथ फिर से कभी
भविष्य में इसे दोहराएँ! अत: सिख अब भारत सरकार पर विश्वास नहीं करते !
भुवनेश्वर
में इंदिरा ने यह भाषण शाम ०६.३० पर दिया था! भुवनेश्वर इंदिरा परिवार के
प्रति कभी भी भाग्यशाली साबित नहीं हुआ, इंदिरा के पिता — भारत के
प्रथम प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरु को भी मई १९६४ में यहीं दिल का
दौरा पड़ा था जिससे उनका स्वर्गवास हो गया था, इससे पूर्व इंदिरा को भी
यहाँ की जनता का पथराव झेलना पड़ा था जिससे उनकी नाक की हड्डी टूट गयी थी,
और अब यह उन के जीवन का अंतिम भाषण सिद्ध हुआ था !
भुवनेश्वर में ही इंदिरा को यह सन्देश
प्राप्त हुआ कि उनके पोते राहुल और पोती प्रियंका की कार दुर्घटनाग्रस्त हो
गयी! इसे सुनकर उनहोंने अपना उड़ीसा का दौरा रद्द किया और उसी रात वे
दिल्ली लौट आईं थीं! काल चक्र तेजी से घूम रहा था !
इंदिरा को आल इंडिया इंस्टीट्युट
आफ मेडिकल साइंस में ले जाया गया, उनके वहां पहुँचने से पूर्व ही उनके
घायल होने की सूचना वरिष्ठ डाक्टरों को दी जा चुकी थी और आपरेशन की तैयारी
भी कर ली गयी थी, फौरन ही इंदिरा को आपरेशन थियेटर में ले जाया गया !
डाक्टरों के अनथक प्रयासों से भी
उनको बचाया न जा सका! उनके शरीर के अंदरूनी हिस्से गोलियों से
बेतहाशा छलनी हो चुके थे, उनके शरीर से सभी गोलियां भी न निकाली जा
सकी थीं! आकाशवाणी ने उनकी हत्या के प्रयास और घायल होने की सूचना तो
अवश्य दी थी लेकिन मृत्यु की खबर को प्रसारित नहीं किया गया था!
दोपहर ढाई बजे जब इंदिरा के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया तो उनकी
असामयिक मृत्यु की सूचना आकाशवाणी तथा दूरदर्शन द्वारा आधिकारिक रूप से
प्रसारित कर दी गयी !
राजीव गाँधी उन दिनों एक हफ्ते के लिए
बंगाल के दौरे पर थे! वे अपनी सभी कार्यक्रम रद्द करके फौरन ही दिल्ली
रवाना हो गए थे! हवाई अड्डे से उन्हें सीधे AIIMS ले जाया गया था !
राजीव के बेटे राहुल और
बेटी प्रियंका को इंदिरा की अभिन्न सहेली और हिंदी सिनेमा जगत के
मशहूर अभिनेता अमिताभ बच्चन की माता तेजी बच्चन की सुरक्षा में दे दिया गया
था!
कांग्रेस द्वारा इंदिरा की हत्या का बदला लेने का कुत्सित प्रयास,
पहली नवंबर १९८४
के प्रमुख समाचार पत्रों में इंदिरा की हत्या और उनके आल इंडिया
मेडिकल इंस्टीटयूट में इलाज और मृत्यु की खबर के साथ ही राजीव गाँधी के
प्रधान मंत्री बनाये जाने के समाचार प्रमुखता से छपे थे परन्तु किसी सिख की
हत्या की कोई खबर न थी! मुझे अच्छी तरह से याद है कि हिंदी समाचार पत्र
‘हिंदुस्तान’ के प्रमुख पृष्ठ पर बाईं ओर के प्रथम कालम में छोटी सी खबर
छपी थी कि गाज़ियाबाद और दिल्ली के कुछ बाहरी इलाकों में सिखों से कुछ
छुट- पुट मार पीट की घटनाएँ हुईं थीं परन्तु किसी की मृत्यु का कोई समाचार
नहीं था !
फिर क्या कारण था कि उस दिन दिल्ली में मृत्यु का वीभत्स तांडव हुआ और जिसे अंजाम दिया भारत की सत्तासीन पार्टी कांग्रेस द्वारा?
३१
अक्टूबर को ही दूर-दर्शन द्वारा देश के सभी भागों से कांग्रेसी
कार्यकर्ताओं तथा नेताओं के दिल्ली आने की खबर बड़ी प्रमुखता से दी जा
रही थी! शाम के समय एक अपील सुनाई दी कि कांगेस हाई
कमान ने सभी कांग्रेसी नेताओं से आग्रह किया है कि वे सभी अपने-अपने
क्षेत्रों में लौट जाएँ और शांति बनाये रखने में अपना सहयोग प्रदान करें!
मैं अत्यंत आश्चर्यचकित था क्योंकि
मुझे कहीं से भी किसी भी अप्रिय घटना की कोई सूचना प्राप्त न हुई थी!
हिन्दू, सिख या मुसलमान कोई भी इंदिरा की हत्या से क्षुब्ध या विचलित न था !
मुझे तो कोई भी ऐसा व्यथित व्यक्ति न मिला था जबकि मैं अपने
शहर देहरादून में बाज़ार में भी घूम रहा था! हाँ शाम के समय बाज़ार
जरूर बंद हो गए थे और लोग सड़कों पर और समाचार जानने के लिए उत्सुक थे! देर
शाम लगभग ७ बजे कृष्णा
पैलेस सिनेमा के पास २००-२५० लोगों की भीड़ इकठा थी, हम दो भाई सडक से जा
रहे थे ! किसी ने पत्थर फेंका, हम रुक गए और भीड़ की तरफ देखते रहे परन्तु
और कोई घटना न हुई अत: हम वापस घर लौट गए थे!
राजीव गाँधी भी दिल्ली पहुँच चुके थे,
राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह अभी यमन से लौटे न थे! भारत की शीर्ष राजनीती
में एक शून्य दृष्टि गोचर हो रहा था क्योंकि न तो इस देश में प्रधान मंत्री
था और न उस समय इस देश का राष्ट्रपति ही मौजूद था! इस लिए लोगों में
उत्सुकता बनी हुई थी!
यह तो अगले दिन पता
चला कि क्यों कांग्रेस हाई कमान ने देश के सभी भागों से दिल्ली आये
कार्यकर्ताओं तथा नेताओं को वापिस अपने-अपने क्षेत्रों में लौट कर शांति
बनाये रखने में सहयोग देने की अपील की थी! वास्तव में तो इन नेताओं तथा अन्य कांग्रेस जनों को कांग्रेस हाई कमान द्वारा यह निर्देश दिए गए थे कि वे अपने क्षेत्रों में जा कर सिखों की सम्पत्ति लूटें, उन पर जान लेवा हमले करें, उनकी निर्मम हत्याएं करें, उनके वाहनों को आग लगा दें, खोज-खोज कर सिखों की हत्याएं की जाएँ, उनकी औरतों के साथ जो भी बुरा सलूक किया जा सकता था, किया जाये !
इस उद्देश्य के साथ ये कांगेस जन —इस देश की
सरकार से निर्देश लेकर अपने-अपने क्षेत्रों में लौट गए! प्रदेशों के
पुलिस प्रमुखों को आदेश थे और जिला प्रशासन उनकी पीठ पर था, फायर
ब्रिगेड को भी आदेश थे कि यदि किसी सिख के घर आग लगी हो तो न बुझाई जाये !
यदि जाना भी पड़े तो ध्यान रखें कि आग आस पड़ोस के अन्य घरों को लपेटे में
न ले इसलिए पड़ोस के घरों पर पानी डाला जाये ! इन दंगाइयों को
सुरक्षित ७२ घंटे दिए गये थे क्योंकि फिर इंदिरा गाँधी का अंतिम संस्कार भी
तो करना था इसलिए जितना तांडव इंदिरा के शरीर के रहते किया जा सकता था —
किया गया! इंदिरा की मृत देह को इस नर संहार का गवाह बनाया गया! इंदिरा गाँधी की आँखें तो नही पर शरीर को इस कत्लेआम का गवाह बनाया गया जैसे उसका पुत्र राजीव उसे कह रहा हो — ”देखो माँ ! मैंने एक आज्ञाकारी पुत्र की भांति तुम्हारे निर्देशों के तहत सिखों का नर संहार करवाया है — देख लो!” फिर ३ नवंबर को इंदिरा का अंतिम संस्कार, गाँधी परिवार के अंतिम संस्कार हेतु आरक्षित भूमि यमुना किनारे कर दिया गया !
शाम को राष्ट्रपति ज्ञानी जैल
सिंह यमन से वापस लौट आये थे और देर शाम को ही इंदिरा के सुपुत्र और
कांग्रेस के मुख्य सचिव राजीव गाँधी को विधिवत इस देश की कमान सौंपने की
औपचारिक घोषणा कर दी गयी थी! अब राजीव गाँधी इस देश के नये प्रधान मंत्री
घोषित कर दिए गये थे!
ज्ञानी जैल सिंह इंदिरा के वफादार नौकर
परन्तु इस देश के महामहिम राष्ट्रपति थे! उन्होंने अपनी निष्ठां गाँधी
परिवार के प्रति बरकरार रखते हुए इंदिरा गाँधी के पुत्र राजीव को इस देश के
प्रधान मंत्री बनाये जाने की शपथ दिलाई परन्तु राजीव गाँधी ने प्रधान
मंत्री बनते ही सबसे पहला आदेश जारी किया — सिखों की संपूर्ण भारतवर्ष में निर्मम हत्याएं की जाएँ!
राजीव के लिए सिखों की हत्या करने का
प्रमुख कारण उनकी माता की सिख बाड़ीगार्डों द्वारा हत्या और स्वयं इंदिरा
द्वारा राजीव को दिए गये दिशा निर्देशों के अनुसार ही था ! यह सर्वत्र
विदित है की इंदिरा सिखों से नफरत करती थी और इसीलिए उसने अमृतसर
स्थित सिखों के प्रमुख धार्मिक आस्था के केंद्र स्वर्ण मन्दिर या जिसे दरबार साहिब भी कहा जाता
है, इसे अंग्रेजी में गोल्डेन टेम्पल कहते हैं — पर सिखों के पांचवें गुरु
अर्जन देव जी के शहीदी पर्व पर फौजी आक्रमण करवा कर प्रमाणित भी कर दिया
था! फौज की इस कार्रवाई में दोनों तरफ का बहुत ही भारी नुकसान हुआ था!
इसे आपरेशन ब्लू-स्टार का नाम दिया गया था! इसके एक प्रमुख जनरल (जो स्वयं
सिख परिवार से थे परन्तु पतित थे और सिख धर्म के अनुगामी न थे) कुलदीप सिंह
बरार ने अपनी पुस्तक 'नीला तारा' में भारतीय सेना के शहीद सैनिकों की
संख्या १५307, अफसर 43 और ज़ख्मियों की संख्या १7,897 लिखी है जबकि दूसरी और संत जरनैलसिंह भिंडरांवाला के नेतृत्व और भारतीय सेना के एक रिटायर्ड
जनरल शुबेग सिंह की कमान के तहत लगभग २००-२५० सिख युवक ही थे! भारतीय फौज
के कुल शहीद हुए सैनिकों की गिनती तो भारत की चीन और पाकिस्तान से हुए
समस्त युद्धों में शहीद हुए सैनिकों की कुल गिनती से भी बहुत ज्यादा थी !
जनरल शुबेग सिंह
बंगला देश के वार हीरो रहे हैं, उन्होंने मुक्तिवाहिनी और भारतीय सेना को
गुरिल्ला लड़ाई की ट्रेनिंग दी थी! परन्तु उनके रिटायर होने से एक दिन
पूर्व ही उन पर कुछ आरोप लगा कर उन्हें सेना से बर्खास्त कर दिया गया था,
इस अपमान के कारण ही उन्होंने भारत सरकार से बदला लेने की सोच ली थी!
इन्हीं सिख जनरल ने सिख युवकों को गुरिल्ला ट्रेनिंग दी जिस से २००-२५० सिख
युवकों ने भारतीय सेना का विध्वंस कर डाला!
इस से बौखला कर भारतीय सेना पागल हो उठी और उसने पंजाब में अमृतधारी सिखों की बेपनाह नृशंस हत्याएं शुरू कर दीं (खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे),
जेनेवा संधि के तहत दुश्मन के गिरफ्तार सैनिकों के साथ भी मानवीय सलूक
किया जाता है परन्तु भारतीय सेना ने अपने ही देशवासियों पर जो जुल्म किये,
उसे सुन कर और पढ़ कर अपने आप पर घृणा उत्पन्न होती है कि क्या हम ऐसे देश
के वासी हैं? विश्वास नहीं होगा कि क्या भारतीय सेना ने वास्तव में ऐसे
जुल्म भारत के ही नागरिकों पर किये थे ?आँखों देखी घटना की एक रिपोर्ट प्रसिद्ध पत्रकार हरबीर सिंह भंवर ने अपनी पुस्तक ‘डायरी के पन्ने जो इतिहास बन गये' के
पृष्ठ 69...पर लिखते हैं कि श्री अकाल तख्त साहिब जी के पीछे की ओर
सैंकड़ो साल पुराना एक डेरा है (आटा मंडी स्थित बाबा शाम सिंह जी का डेरा)
जहाँ से रोजाना सवेरे-सवेरे दरबार साहिब जी में अरदास करने से पहले ही
कढाह प्रसाद पहुंचाया जाता है और फिर दिन में
लंगर तैयार किया जाता था ! उस समय भी स्वयंसेवक लंगर तैयार कर रहे थे,
पहले तो बी एस ऍफ़ के जवानों ने डेरे को लूटा, एक सिख भाई दौलत सिंह ने
अपनी ज़मीन चंडीगढ़ के नजदीक बेचीं थी और जिसके ६०,००० रुपये डेरे की एक
अलमारी में रखे थे, उन्हें लूट लिया और फिर राइफलों के बट से डेरे के सिखों
को मारते रहे! इसके बाद इन सभी सिखों को जिनकी कुल संख्या १९ थी, इन्हें
भारतीय सैनिकों ने पकड़ा, उनकी पगड़ियाँ खोल कर उनके हाथ पीठ के पीछे करके
बाँध दिए और गली में ले आये, गोली मारने ही लगे थे कि एक बुजुर्ग सिख
जथेदार किरपाल सिंह जी ने कहा कि,
“आप हमें गोली तो मार ही दोगे परन्तु इस से पहले हमें हमारी आखिरी अरदास
(प्रार्थना) कर लेने दीजिये, “सेना के अफसरों ने इसकी इजाजत दे दी और जैसे
ही इन सिखों ने अपनी अरदास पूरी की और जैकारा लगाया— ”नानक नाम चढ़दी
कला — तेरे भाणे सरबत का भला “— इस के उपरांत तुरंत ही गोलियों की बौछार ने
उनका अंत कर दिया !
तीन दिनों के बाद डी एस पी सिटी सरदार अपार सिंह बाजवा ने इन लाशों को उठवा कर इनका अंतिम संस्कार करवाया था!
सिख युवकों का अनुपम शौर्य और परास्त भारतीय सेना
सिख युवकों के शौर्य के आगे भारतीय
सेना की इन्फैंट्री डिविजन (पैदल सेना) ने हथियार डाल दिए थे! ७२ घंटे
तक चली इस कार्रवाई में संसार की श्रेष्ठतम सेनाओं में से एक जिसने
पाकिस्तान को इस से पहले तीन बार धूल चटाई थी — आज मुट्ठी भर सिख युवकों के शौर्य के आगे विवश थी!
दरबार साहिब स्थित घंटा घर से श्री अकाल तखत तक का फासला लगभग २०० मीटर है! भारतीय जनरलों को विश्वास था कि वे आधे घंटे में इस कार्रवाई को अंजाम दे देंगे परन्तु ७२ घंटे तक भी यह विशाल सेना २०० मीटर का फासला तय नही कर पाई थी! ऐसे प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था भारतीय सेना को! सपने में भी उसे यह उम्मीद न थी कि मुट्ठी भर सिख युवक, भारतीय सेना की बढत रोक देंगे परन्तु सिखों में शहीदी का चाव जन्म से ही होता है—-वे अपने गुरु के वचन का पालन करते हुए मैदाने जंग में शहीद होना और गुरु को अपना सिर भेंट करने में गौरव महसूस करते हैं! सिख लड़ रहे थे तो आततायियों की सेना से जिसने उनके पवित्रतम धार्मिक स्थान को नेस्तनाबूद करने की ठानी थी !अत: आतताइयों की इस फौज से लड़ कर शहीद होना, अपने धार्मिक स्थान की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देना, अपने गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रति अपनी वचन-बद्धता निभानी और अपने गुरु के महावाक्य — 'सवा लाख से एक लड़ाऊँ !! तभै गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ !!' को चरितार्थ करते हुए शहीदी का जाम पीना गौरव समझते थे जबकि भारतीय सेना तो अपनी आका इंदिरा माता को खुश करने के लिए लड़ रहे थे !
दोनों की लड़ाई का उद्देश्य भी अलग था !
भारतीय सेना के जनरलों द्वारा
आपरेशन ब्लू स्टार की रण - नीति बनाते हुए सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन
देव जी के शहीदी पर्व को जान-बूझ कर चुना गया था क्योंकि उस दिन
श्रद्धालु बहुत अधिक संख्या में गुरूद्वारे में एकत्रित होते हैंऔर इस दिन
भारतीय सेना द्वारा गुरूद्वारे पर आक्रमण करने के उनको दो फायदे होने थे;
पहला - अधिक श्रद्धालु एकत्रित होने से
फौज को उनकी आड़ में दरबार साहिब की परिक्रमा से होते हुए श्री अकाल
तखत साहिब जी तक पहुंचना आसान हो जाता, फौज गोली चलाती तो मरना तो सिखों ने
ही था, चाहे वे संत जरनैल सिंह जी के साथी धार्मिक प्रवर्ति वाले सिख
हों या श्रद्धालु सिख ! इंदिरा का भी तो यही आदेश था कि सिखों को चाहे
जितनी संख्या में मारना पड़े परन्तु वे अकाल तखत पर आक्रमण कर के संत जरनैल
सिंह जी को मारना चाहती थी ! तो इस तरह फौज इन श्रद्धालु सिखों की आड़
में अपने को बचाती हुई श्री अकाल तखत साहिब जी पर आक्रमण करना चाहती थी!
फौज जंग के मैदान में भी भेड़-बकरी या अन्य पशुओं की आड़ में
धावा बोलती है, जिससे इन्हें जानी नुकसान होने का अंदेशा कम होता है !
यहाँ भी भारतीय फौज के जनरलों ने
यही सोचा था कि वे भी अपने सैनिकों को सिख संगतों (श्रद्धालुओं) की आड़ में
से होते हुए आधे घंटे में ही श्री अकाल तखत साहिब जी को घेर लेंगे और
सफलता हासिल कर लेंगे क्योंकि सिख योद्धे अपने ही भाइयों, बहनों या
बच्चों की हत्याएं नहीं करेंगे! परन्तु भीतर भी सिख योद्धे
गुरिल्ला लड़ाई में निपुण तथा हर कौशल में कुशल थे, उन्होंने भारतीय फौज के
धावे को एक दम खत्म कर दिया, करीबन सारे ही फौजी जो भीतर घुसे थे,
पार बुला दिए गये थे!
अकाल तखत साहिब जी पर कब्ज़ा करने की लड़ाई ७२ घंटे चली परन्तु भारतीय सेना की
पैदल सेना जब फेल हो गई और एक कदम भी आगे नहीं बढ
पाई तो उन्हें ले जाने के लिए APC व्हीकल (बख्तरबंद गाड़ी) मंगाई गई परन्तु सिख लड़ाकू योद्धाओं ने इस बख्तर बंद गाड़ी को भी उड़ा दिया !
अब भारतीय फौज के जनरलों के
पसीने छूट गये! जिस लड़ाई को अपने अहं में उन्होंने मात्र आधे घंटे की
सोची थी, उस लड़ाई में उन्हें जो जानी नुकसान उठाना पड़ा और फजीहत अलग से,
इंदिरा को विश्वास अलग से दिलाया था कि आधे घंटे में फौजी कार्रवाई पूरी हो
जाएगी, उसका तो कहीं अंत ही नजर नहीं आ रहा था! अब पैदल सेना के बस की
बात नहीं रह गई थी, अत: अब जनरलों ने इंदिरा से टैंक इस्तेमाल करने की
इजाजत मांगी जबकि मार्क तुली (बी बी सी संवाददाता) के अनुसार श्री अकाल तखत
में केवल आखिरी १४ सिख ही शेष बचे थे परन्तु भारतीय पैदल सेना (इन्फंट्री)
इतनी हतोत्साहित थी कि उसमें अब इतना दम नहीं था कि इन सिख योद्धाओं से
मुकाबला कर पाती अत: भारी तोपखाने के इस्तेमाल से श्री अकाल तख्ता साहिब की पवित्र और एतिहासिक इमारत को ही टैंकों के गोलों का निशाना बना दिया गया, इस इमारत को नेस्तनाबूद कर दिया गया!
सारा संसार स्तब्ध था परन्तु सिख
जगत मजबूर था! उनकी ऑंखें तो रोती थीं परन्तु आंसू सूख गये थे! उन्हें काटो
तो खून नहीं था! उनका बस चलता तो अलग सिख देश उसी दिन बन जता! नफरत की
आंधी भी चली थी! आक्रोश था सिख जगत में इंदिरा और भारतीय सेना के खिलाफ, अत; सिख जगत ने कटु फैसला लिया!
दो सिख योद्धाओं
(भाई हरजिंदर सिंह जिन्दा और भाई सुखदेव सिंह सुक्खा ने) ने भारतीय फौज के
प्रधान सेनापति और इंदिरा के चाटुकार जनरल अरुण कुमार वैद्य को पूना में
गोलियों से उड़ा दिया!
अब बारी थी इंदिरा की जिसका अंत भी सिख योद्धाओं के हाथों निश्चित था!
इस से पूर्व सिख भारतीय सेना का एक
अभिन्न अंग रहे हैं! पिछले दोनों विश्व युद्धों में उन्होंने फ़्रांस,
इटली, मलयेशिया, अफ्रीका,बर्मा आदि (सभी यूरोपीय, देशों, मध्य पूर्व तथा
दक्षिण पूर्व) देशों में अपनी शूरवीरता के परचम लहराए थे! आज भी
उनकी बेमिसाल बहादुरी को चिरंजीवी बनाने के लिए लगभग सभी देशों में उनकी
याद में स्मारक बनाये गये हैं! इन युद्धों में भी एक लाख से उपर सिख
सैनिकों ने अपनी आहुतियाँ दी थीं!
आज़ाद हिंद फौज में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है! इस की कुल संख्या के लगभग ६०% सिख सैनिक ही थे!
भारत के
स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता!
हिन्दू भले ही संख्या में अधिक हों परन्तु स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर उनका
स्वयं का योगदान नगण्य ही है! यह एक कटु सत्य है परन्तु स्वयं
कांग्रेस सरकार ने इस सत्य को प्रकाशित किया था और मौलाना अबुल कलम आजाद ने
इसे कांग्रेस की मासिक पत्रिका में छपवाया था! कृपया उनके द्वारा
प्रस्तुत यह तालिका देखें :
दंड जिन्होंने सहे
सिख....गैर सिख....कुल योग
जिन्हें फांसी दी गई
९३............२८...........१२१
जिन्हें काला पानी की सज़ा दी
२१४७ .........४९९ ........२६४६
जलियांवाला बाग में कत्ल किए गए
७९९..........५०१..........१३००
बज बज घाट पर कत्ल किए गए
६७...........४६...........११३
कूका आन्दोलन में शहीद
९१.........कोई नहीं.......९१
अकाली आन्दोलन में शहीद
५००.......कोई नहीं.......५००
कुल योग
३६९७........१०७४........४७७१
Book source: History of Indian National Congress.
By:- Ajmer Singh Randhawa
भारतीय सेना का एक अभिन्न अंग होते हुए भी भारतीय सेना सिखों के शौर्य से अंजान ही रही क्योंकि…..’घर की मुर्गी दाल बराबर !’ भारतीय सेना
को सिखों की वीरता से कभी सीधा वास्ता नही पड़ा था! दुश्मनों को पड़ा था
और उन्होंने इनकी शौर्य गाथाएं भी लिखी! स्वयं पाकिस्तानी सेना के रिटायर्ड
मेजर जनरल मुकीश खान ने अपनी पुस्तक‘ Crisis of Leadership’ के प्रष्ट २५० पर वे सिखों के साथ हुई अपनी १९७१ की मुठभेड़ पर लिखते हैं कि, “हमारी हार का मुख्य कारण था
हमारा सिखों से आमने सामने युद्ध करना! हम उनके आगे कुछ भी करने में
असमर्थ थे! सिख बहुत बहादुर हैं और उनमें शहीद होने का एक विशेष जज्बा—एक
महत्वाकांक्षा है! वे अत्यंत बहादुरी से लड़ते हैं और उनमें सामर्थ्य है कि
अपने से कई गुना संख्या में अधिक सेना को भी वे परास्त कर सकते हैं!”
वे आगे लिखते हैं कि……..
‘३ दिसंबर १९७१ को हमने अपनी पूर्ण क्षमता
और दिलेरी के साथ अपने इन्फैंट्री ब्रिगेड के साथ
भारतीय सेना पर हुसैनीवाला के समीप आक्रमण किया! हमारी इस ब्रिगेड
में पाकिस्तान की लड़ाकू बलूच रेजिमेंट और पंजाब रेजिमेंट भी थीं ! और कुछ
ही क्षणों में हमने भारतीय सेना के पाँव उखाड़ दिए और
उन्हें काफी पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया!
उनकी महत्वपूर्ण सुरक्षा चौकियां अब हमारे कब्ज़े में थीं! भारतीय सेना
बड़ी तेजी से पीछे हट रही थीं और पाकिस्तानी सेना अत्यंत उत्साह के साथ
बड़ी तेजी से आगे बढ रही थी! हमारी सेना अब कौसरे - हिंद पोस्ट के समीप
पहुँच चुकी थी! भारतीय सेना की एक छोटी टुकड़ी वहां उस पोस्ट की सुरक्षा के
लिए तैनात थी और इस टुकड़ी के सैनिक सिख रेजिमेंट से संबंधित थे! एक छोटी
सी गिनती वाली सिख रेजिमेंट ने लोहे की दीवार बन कर
हमारा रास्ता अवरुद्ध कर दिया ! वे पूरी शक्ति से सिख जयकारा ——
'बोले सो निहाल सत श्री अकाल' —के नारों से आकाश गुंजा रहे थे!
उनहोंने हम पर भूखे शेरों की तरह और बाज़ की तेजी से आक्रमण किया!
ये सभी सैनिक सिख थे! यहाँ एक आमने सामने की, आर पार की, सैनिक से सैनिक की
लड़ाई हुई! आकाश ‘या अली’ और 'बोले सो निहाल’ के गगनभेदी नारों से
गुंजायमान हो उठा! इस आर पार की लड़ाई में भी सिख सैनिक
इतनी बेमिसाल बहादुरी से लड़े कि हमारी सारी महत्वाकांक्षाएं, हमारी सभी
आशाएं धूमिल हो उठीं, हमारी उम्मीदों पर पानी फिर गया ! हमारे सभी सपने चकना चूर हो गये!’
इस जंग में बलूच रेजिमेंट के
लेफ्टिनेंट कर्नल गुलाब हुसैन शहादत को प्राप्त हुए थे! उनके साथ ही
मेजर मोहम्मद जईफ और कप्तान आरिफ अलीम भी अल्लाह को प्यारे हुए थे!
उन अन्य पाकिस्तानी सैनिकों की गिनती कर पाना मुश्किल था जो इस जंग में
शहीद हुए ! हम आश्चर्यचकित थे मुट्ठीभर सिखों के साहस और उनकी इस बेमिसाल
बहादुरी पर! जब हमने इस तीन मंजिला कंक्रीट की बनी पोस्ट पर कब्जा किया
तो सिख इस की छत पर चले गये, जम कर हमारा विरोध करते रहे — हम से
लोहा लेते रहे! सारी रात वे हम पर फायरिंग करते रहे और सारी रात वे अपने
उदघोष, अपने जयकारे ….'बोले सो निहाल सत श्री अकाल' से आकाश गुंजायमान करते
रहे! इन सिख सैनिकों ने अपना प्रतिरोध अगले दिन तक जारी रखा जब
तक कि पाकिस्तानी सेना के टैंकों ने इसे चारों और से नहीं घेर लिया और इस
सुरक्षा पोस्ट को गोलों से न उड़ा डाला! वे सभी मुट्ठी भर सिख सैनिक इस जंग
में हमारा मुकाबला करते हुए शहीद हो गये परन्तु तभी अन्य सिख सैनिकों ने
तोपखाने की मदद से हमारे टैंकों को नष्ट कर दिया! बड़ी बहादुरी से
लड़ते हुए इन सिख सैनिकों ने मोर्चे में अपनी बढ़त कायम रखी और इस तरह हमारी सेना को हार का मुंह देखना पड़ा!
‘…..अफ़सोस !
इन मुट्ठी भर सिख सैनिकों ने हमारे
इस महान विजय अभियान को हार में बदल डाला, हमारे विश्वास और हौंसले को
चकनाचूर करके रख डाला! ऐसा ही हमारे साथ ढाका (बंगला-देश) में भी हुआ था!
जस्सूर की लड़ाई में सिखों ने पाकिस्तानी सेना से इतनी बहादुरी से
प्रतिरोध किया कि हमारी रीढ़ तोड़ कर रख दी, हमारे पैर उखाड़ दिए !
यह हमारी हार का सबसे मुख्य और महत्वपूर्ण कारण था ! सिखों का
शहीदी के प्रति प्यार, और सुरक्षा के लिए मौत का उपहास तथा देश के लिए
सम्मान, उनकी विजय का एकमात्र कारण बने !
सिखों की वीरता का एक बेमिसाल उदाहरण और पेश है :
१२ सितंबर १८९७ को ब्रिटिश सेना की ३६वीं सिख रेजिमेंट को लगभग १०,००० अफरीदी पठानों ने सारागढ़ी, किला लोखार्ट, जिला कोहाट — NWFP प्रान्त (अब पाकिस्तान)
में घेर लिया (ये अपने आप को पर्शिया - ईरान के भूतपूर्व
बादशाह फरीउद्दीन के वंशज बताते हैं), इस भयंकर युद्ध को जिसे वहां के
मूल निवासी तीरा-युद्ध या सारागढ़ी युद्ध के नाम से याद करते हैं,
हवलदार ईशर सिंह के नेतृत्व में १२ सितंबर १८९७ को लड़ी गयी थी!
अफरीदी पठानों द्वारा उपलब्ध कराए गये आंकड़ों के
मुताबिक २०० पठान मारे गये थे और लगभग १००० पठन गंभीर रूप से जख्मी हुए थे !
इस युद्ध की परिणति पर अकेले हवालदार ईशर सिंह बचे थे और उनके साथ
थीं २० अमृतधारी सिख सैनिकों की चारों ओर छितरी लाशें ! बिना किसी भय या
बौखलाहट के इस अकेले सिख हवलदार ने सिखी शान कायम रखते हुए चड़दी कला (High spirit) के
साथ अंतिम सांस तक अफरीदी पठानों से कई घंटों तक मोर्चा लिया! इस
तरह उन्होंने सभी २१ सिख सैनिकों ने गुरु गोबिंद सिंह जी के पवित्र वचन….”सवा लाख से एक लड़ाऊँ !! तभै गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ!!” को चरित्रार्थ किया! इन सभी २१ सिख सैनिकों को मरणोंप्रान्त सेना के सर्वोच्च शौर्य पुरस्कार…. INDIAN ORDER OF MERITT (IOM) से
सम्मानित किया गया! यह पुरस्कार आज परमवीर चक्र कहलाता है ! इतनी बड़ी
संख्या में इससे पूर्व कभी भी बहादुरी के लिए एक दिन में इतने पुरस्कार कभी
नहीं दिए गये थे! इन सिखों की बहादुरी की शौर्य गाथा — सेना के इतिहास में
अतुलनीय है!
जब इन सिख सैनिकों की बेमिसाल शहादत की
खबर इंग्लैंड पहुंची तो ब्रिटिश पार्लियामेंट ने एक विशेष सत्र में सभी
सदस्यों द्वारा इन सभी सिख सैनिकों को उनके अतुलनीय साहस तथा उनकी
वीरगति पर दो मिनट का मौन रखकर अपनी श्रद्धांजलि भेंट की! उनकी स्मृति में
लिखा गया कि….”इस हाउस के सभी सदस्य सारागढ़ी के सिखों की इस बहादुरी की
प्रशंसा करते हुए गौरवान्तित महसूस करते हैं ! ब्रिटिश तथा भारतीय ३६ वीं
सिख रेजिमेंट की बहादुरी पर गर्व करते हुए कोई झिझक महसूस नहीं
करेंगे यदि उनकी शान में यह शब्द लिखे जाएँ कि..... 'जिस सेना में
ऐसे शूरवीर सिख हों वो सेना कभी भी, किसी भी युद्ध में कभी भी परास्त नहीं
हो सकती!' इन सभी २१ सिख सैनिकों को मरणोंप्रान्त शूरवीरता के लिए वीरता
पुरस्कारों से सम्मानित किया गया और इतनी बड़ी संख्या में किसी एक दिन में
इतने सर्वोच्च पुरस्कार इससे पूर्व कभी नही दिए गये!....”
तो भारतीय सेना का कभी सिखों से
आमना-सामना नहीं हुआ था और आपरेशन ब्लू स्टार ही पहला मौका था
जब विशाल एवं आधुनिक हथियारों से सुसज्जित भारतीय सेना का मुकाबला मुट्ठी
भर गैर प्रशिक्षित सिख युवकों से हुआ! अमृतसर में उस समय लगभग एक लाख
सैनिक थे और मुकाबले पर थे केवल २००-२५० सिख युवक! वे भी अपने
परम्परागत शस्त्रों और द्वितीय विश्व-युद्ध के पुराने कुछ हथियारों ——
मशीनगनों के साथ! परन्तु अपने पवित्र धर्म स्थल की रक्षा और स्वाभिमान पर
मर मिटने की तमन्ना लिए ये सिख युवक भारतीय सेना के सामने लोहे की
दीवार साबित हुए! इस विशाल सेना का घमंड चूर-चूर कर दिया उन वीर
रण बांकुरों ने !
भारतीय सेना के जनरलों ने
इंदिरा गाँधी को आशवस्त किया था कि वे आधे घंटे में ही दरबार
साहिब क्षेत्र पर कब्जा कर लेंगे और अकाल तखत से संत जरनैल सिंह को
जिन्दा या मुर्दा गिरफ्तार कर लेंगे ! इंदिरा गाँधी ने भारतीय सेना के
प्रमुख जनरल ए के वैद्य को यह आदेश दिया था…..
"I don't give a damn if the Golden Temple and whole of Amritsar are destroyed, I want Bhindranwale dead." (Indira Gandhi, Indian Prime Minister, communicating with Gen. Vaidya during "Operation Blue Star")
मुझे
कोई परवाह नहीं कि यदि स्वर्ण मन्दिर और संपूर्ण अमृतसर भी तबाह हो जाये,
मुझे भिंडरांवाला मुर्दा चाहिए '(भारतीय प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी ने
जनरल वैद्य के साथ अपनी बातचीत में आपरेशन ब्लू स्टार के दौरान यह शब्द कहे
थे)'
भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री
(प्रथम) जवाहरलाल नेहरु, गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल और संयुक्त
भारतीय पंजाब के प्रथम मुख्य मंत्री गोपी चंद भार्गव , इन तीनों की सलाह पर
पंजाब सरकार द्वारा एक (सर्कुलर) सरकारी आदेश भारत के स्वतन्त्रता
प्राप्ति के फौरन बाद ही अक्टूबर १९४८ में जारी किया गया जिसमें सिखों को
जरायम पेशा करार देते हुए तमाम जिलाधिकारियों से इनके खिलाफ कड़े कदम उठाने
का आदेश दिया गया था! यह याद रखने की बात है कि लगभग एक करोड़ सिख व
हिन्दू पाकिस्तानी पंजाब क्षेत्र से विस्थापित होकर भी आए थे और लगभग दस
लाख काल-कवलित हुए थे! अधिकांश परिवार अपने घर-बार, खेत खलिहान तथा अपनी
जायदाद छोडकर, अपने प्रिय बन्धु-बांधवों को खो कर, फलता-फूलते
व्यवसाय से वंचित होकर कौड़ी कौड़ी को मोहताज़ हो कर अपने ही देश में
रिफ्यूजी (विस्थापित) कहलाए थे फिर भी इन कांग्रेसी नेताओं ने उस सिख
समुदाय को जरायमपेशा कहा, जिनकी क़ुरबानी से यह देश आजाद हुआ था!
स्वतन्त्रता संग्राम में फाँसी चढने वाले तथा अन्य सजाएं पाने वालों का यदि
अनुपात देखें तो सिख जो कि पराधीन भारत की जनसंख्या का केवल एक प्रतिशत
थे, का योगदान ९३% है, इस की पूर्ण व्याख्या आगे पुस्तक में विस्तार से दी
गई है!
अब
इसी भारतीय प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु की बेटी इंदिरा गाँधी (जो स्वयं
भी इस देश की प्रधान मंत्री बनी) ने इस तरह अपने शब्दों में सिखों के
प्रति अपनी नफरत को प्रदर्शित किया है! इन शब्दों के मुताबिक ...चाहे
संपूर्ण अमृतसर शहर तबाह हो जाए....' अर्थात बिना किसी ठोस सबूत के एक सिख
संत को मारने के लिए यह पूरे उस अमृतसर शहर को समाप्त करना चाहती थी जो सिख
धर्म की धुरी है, आधार
है, जहाँ सिख गुरुओं ने धर्म का उपदेश दिया जो कि सिख गुरुओं की कर्मस्थली
रही है, उस पवित्र शहर अमृतसर पर हमला करने और तबाह करने का संकल्प रखने
वाली यह स्त्री या तो पागल थी या सिखों के प्रति अपनी घृणा को छुपा न सकी
थी! अमृतसर को तबाह करने का अर्थ था कि सिख धर्म का समूल नाश कर देना तो
फिर सिख इस पागल स्त्री को ही क्यों न देश और अपने धर्म की रक्षा के हित
में कत्ल कर देने का निर्णय लेते---कोई शक नहीं कि उन्होंने सही निर्णय ही
लिया था!
कांगेस के दूसरे महान नेता, जिन्हें
ससम्मान इस देश का राष्ट्रपिता भी कहा गया, ने भी इस देश के हिन्दुओं के
रक्त की कीमत पर भी कलकत्ता के मुस्लिमों को प्रश्रय देने और उनकी रक्षा
करने की बात की थी, यह ऐतिहासिक प्रमाण देखें;
इस से पूर्व स्वयं महात्मा गाँधी ने भी कलकत्ता में १९४७ में मुस्लिमों के पक्ष में यही लफ्ज़ कहे थे….. रिचर्ड ग्रेनियर द्वारा लिखित “The Gandhi Nobody knows se sabhar, march 1983 Commentarymagazine.com------- “कि मुझे
कोई आश्चर्य नहीं होगा भले ही सारा कलकत्ता शहर खून में डूब जाये.
मेरे लिए तो यह निर्दोषों का खून स्वयं भेंट चढाने के तुल्य होगा”.
आश्चर्य है ... फिर भी देखिये....'इसे लोग महात्मा कहते हैं!'
इस से इंदिरा गाँधी
के जिद्दी स्वाभाव का पता चलता है परन्तु वे कानों की कच्ची भी थीं —
इसका खुलासा स्वयं श्री लाल कृष्ण अडवाणी,
अध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पुस्तक, ‘My country my life’ में किया है कि, 'उन्होंने इंदिरा जी पर स्वर्ण मंदिर पर हमले के लिए दबाव डाला था!’
भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख ने
यह दबाव क्यों बनाया? इस के कई कारण हैं, परन्तु उनहोंने इंदिरा की
सिख विरोधी भावनाओं को भड़काया, इसमें कोई शक नहीं! संत जरनैल सिंह जी का
प्रभाव सिख युवकों पर बेतहाशा बढ़ रहा था और सिख युवक नशे छोड़ कर —
अमृत पान कर सिख धर्म की दीक्षा ले रहे थे ! रोजाना हजारों युवक सिख धर्म
के अनुगामी बन रहे थे, इससे कट्टर हिंदूवादी संगठन राष्ट्रीय
स्वयं सेवक संघ चिंतित हो उठा था क्योंकि सिख धर्म और हिन्दू धर्म का
ब्राह्मणवाद — दोनों एक दूसरे के विपरीत हैं ! सिख धर्म ब्राह्मणवाद को
नकारता है और मूर्ति-पूजा का विरोधी है अत: इस संगठन को पंजाब में अपनी
पकड़ ढीली होती दिखाई दी ! अत: लाल कृष्ण अडवाणी को
सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ और उन्होंने इंदिरा गाँधी को भडकाने में कोई कसर न
छोड़ी!
उधर पंजाब
में अकाली दल भी संत जरनैल सिंह से टकराव पर था! भले ही
इसके नेता प्रकाश सिंह बादल का संत जी के समक्ष कोई जोर न था परन्तु बादल
एक शातिर राजनीतिज्ञ है! उसने धार्मिक नेता लोंगोवाल को आगे किया और एस जी
पी सी प्रधान गुरचरन सिंह तोहरा को पंजाब का मुख्य मंत्री बनाने का
प्रलोभन दिया ! संत लोंगोवाल और तोहरा दोनों ही बादल के हाथ के खिलौने बन
गये ! बादल ने संत जी को अलग-थलग करने की चालें चलीं!
संत जरनैल सिंह एक सीधे-सादे धार्मिक
प्रवृति वाले सज्जन पुरुष थे, वे शातिर बादल की चालें न समझ सके!
वे तो धर्म प्रचार को ही मुख्य मुद्दा बना रहे थे! उन्होंने लोंगोवाल के
नेतृत्व में शुरू किये गये धर्म-युद्ध मोर्चे को अपनी सहमति प्रदान की, वे
आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के पक्ष में थे जिससे राज्यों को केंद्र के
आर्टिकल ३५६ के भय से मुक्त कर और अधिकार प्राप्त होते! उन्हें राजनीति से
कुछ लेना-देना न था ! परन्तु उन्होंने केंद्र की सिख विरोधी नीतियों का डट
कर विरोध किया जिस से वे इंदिरा गाँधी की आँख की किरकिरी बन गये!
१९७८ में वैसाखी के पवित्र दिवस पर
निरंकारी प्रमुख बाबा गुरबचन सिंह ने अमृतसर शहर में अपने एक समागम में
गुरु ग्रन्थ साहिब जी का अनादर किया, जिसकी सूचना प्राप्त होने पर संत जी
ने १३ सदस्यों के एक प्रतिनिधि मंडल को निरंकारी प्रमुख को समझाने के लिए
भेजा जिससे तनाव दूर हो! यह सभी १३ सिख निहत्थे थे! जब वे समागम स्थल पर
पहुंचे और उन्होंने अपनी बात रखनी चाही तो केंद्रीय सरकार के
दलाल गुरबचन सिंह ने अपने स्वयं सेवकों से उन पर आक्रमण करवा दिया! इस
आक्रमण में सभी के सभी १३ निहत्थे सिख शहीद कर दिए गये!
इस की तुरंत प्रतिक्रिया हुई, सिख संगठनों और समुदाय में रोष फैल गया परन्तु फिर भी सहन शीलता बनाये रखते हुए
इस की प्रथम सूचना पुलिस को दी गयी! परन्तु पुलिस गुरबचन सिंह पर कोई
कार्रवाई करने में अक्षम थी! पंजाब सरकार के मुख्य सचिव पन्नू और
हिंद समाचार ग्रुप के अध्यक्ष लाला जगत नारायण ने अपने प्रभाव का
इस्तेमाल करते हुए निरंकारी प्रमुख के पंजाब से बाहर सुरक्षित
दिल्ली निकल भागने में मदद की!
संपूर्ण संसार के सिखों में केंद्रीय
सरकार और निरंकारियों के विरुद्ध रोष जाग उठा! फौरन ही श्री अकाल तखत पर एक
मंत्रणा हुई और सिखों को आदेश दिया गया कि वे निरंकारियों से अपने सभी
संबंध ख़त्म करें और उनका सामाजिक बहिष्कार करें!
देखिये पक्षपात किस तरह किया गया---१३
कत्ल पंजाब में किये जाते हैं परन्तु केंद्रीय सरकार के आदेश पर सुनवाई
पंजाब से बाहर...? क्या कहीँ और ऐसा जुल्म देखा है? इसका मुकद्दमा भी पंजाब
में चलाने की इजाजत नही दी गयी और इस की सुनवाई पंजाब से बाहर
करनाल (हरियाणा) में हुई जिस में गुरबचन सिंह तथा अन्य आरोपियों को
निर्दोष करार दे कर छोड़ दिया गया ! १३ निर्दोष सिखों के कत्ले-आम करने
वालों को बा -इज्जत बरी कर दिया गया!
यह था भारत सरकार (इंदिरा सरकार) का सिखों से भेदभाव पूर्ण न्याय !
अब संत जरनैल
सिंह जी तथा अन्य सिख नेता समझ गये थे कि भारत सरकार सिख विरोधी है और
उन्होंने ने न्याय स्वयं करने का फैसला लिया और कुछ स्वाभिमानी सिख युवकों
ने लाला जगत नारायण की ०९ सितंबर १९८१ को लुधियाना के समीप हत्या कर दी,
आखिर १३ निर्दोष सिखों के कातिलों से हमदर्दी रखने वाले और उनसे सहानुभूति
रखने वालों को भी तो दंड मिलना ही था ! वे भी तो अपरोक्ष रूप से इन
निर्दोषों के कत्लों में सहभागी होने की भूमिका निभा रहे थे ! लाला जगत
नारायण हिन्दू प्रेस से थे, उनकी हत्या से केंद्रीय सरकार और हिंदूवादी
संगठन बौखला उठे !
इसके कुछ समय बाद ही एक सिख
युवक रंजीत सिंह ने गुरबचन सिंह की उस के घर में ही हत्या कर दी! परन्तु
सिख समाज ने उसे अत्यंत सम्माननीय एवं प्रतिष्ठित पद— सिख धर्म के
सर्वोच्च पद श्री अकाल तख्त के जत्थेदार (प्रमुख) पर आसीन करके उनके प्रति
अपना आभार प्रदर्शित किया ! १३ निर्दोष सिखों को जान से मारने वालों को भी
आखिर अपना घृणित अंजाम भुगतना ही पड़ा!
लाला जगत नारायण, उसके पुत्र
रमेश चोपड़ा की हत्या का आरोप संत जरनैल सिंह जी पर लगा परन्तु सिद्ध नहीं
हो सका! उन्हें चौक मेहता स्थित उनके संस्थागत गुरूद्वारे दमदमी टकसाल से
गिरफ्तार कर लिया गया था परन्तु उन्हें बाद में रिहा करना पड़ा था! पंजाब
में उनकी गिरफ्तारी के विरुद्ध आक्रोश उत्पन्न हो गया था ! सिखों के विरुद्ध केंद्रीय सरकार का दमन चक्र प्रारंभ हो गया था !
अब इंदिरा गाँधी और केन्द्रीय
सरकार संत जरनैल सिंह जी को अपना प्रमुख शत्रु मानने लगी थी, उधर संत
लोंगोवाल द्वारा जारी किया धर्म युद्ध आन्दोलन अपने चरम पर था!
लगभग एक लाख से अधिक गिरफ्तारियां हो चुकीं थीं और
लाठी-चार्ज आदि में बहुतों को चोटें भी लगी थीं परन्तु मनोबल नहीं टूटा था!
सिखों को आनंदपुर साहिब प्रस्ताव में ही पंजाब का और उनका अपना
भविष्य सुरक्षित नजर आता था! इसलिए यह आन्दोलन
दिन-प्रतिदिन मजबूती पकड़ता जा रहा था! इस से बौखला कर सरकार ने एक नया
पैंतरा खेला! उसने अपने कुछ विश्वस्त पंजाबी हिन्दू कर्मचारियों और
पुलिस तथा अन्य सुरक्षा दलों से पंजाबी जानने वाले हिन्दू युवकों को सिख
वेश धारण करवाया (धर्म परिवर्तन नहीं) और उन्हें पंजाब में इस आन्दोलन को
फेल करवाने के लिए निर्दोषों की हत्याएं करने का गोपनीय आदेश दिया जिस से
सिख बदनाम हों और यह आन्दोलन ठप्प हो जाये !
ऐसा ही हुआ, पंजाब में बसों से उतार कर
कई निर्दोष हिन्दू युवकों की हत्याएं करवा दी गयीं, सिख-वेश में
ये भाड़े के हत्यारे, हत्या स्थल पर अपने सिख होने का सबूत छोड़ कर
भाग जाते थे, भारत का मीडिया भी केन्द्रीय सरकार की बोली बोलने लगा था!
सिखों को हिन्दुओं का अघोषित दुश्मन करार दे दिया गया!
यह कोई सुनी-सुनाई बात नही है — बल्कि प्रत्यक्ष अपने ही घर में इस का
प्रमाण देखा था जब एक सिख युवक को रात में कुछ आतंकवादियों ने
उठा लिया तो मेरे एक रिश्तेदार ने (जो छोटे स्तर का एक नेता था) ने
अमृतसर शहर में खोज की तो पाया कि बी एस ऍफ़ (Border Security Force) के
जवानों ने सिख वेश में उसे उठा लिया था, पैसे देकर तीसरे दिन उसे
सुरक्षित लौटा लिया गया था, इसके बाद उसने पंजाब ही छोड़ दिया था! अब मेरे
उस रिश्तेदार की भी मृत्यु हो चुकी है! यह घटना उसने स्वयं मुझे सुनाई थी !
खैर! सिख युवक आतंकवादी करार दे
दिए गये! जो सिख कभी हिन्दुओं की बहन-बेटियों को बचाने वाले थे,
जिन्होंने हिन्दू धर्म और इस देश के लिए अपनी जाने कुर्बान कीं — आज
उन्हीं की औलादें इन बहादुरों को आतंकवादी घोषित कर रही थीं ! कृतघ्नता एवं
कपटता का ऐसा खेल शायद ही संसार की किसी दूसरी जाति ने खेला हो!
अब इंदिरा गाँधी ने दरबार साहिब पर
आक्रमण करने की अपनी योजना को कार्यान्वित करना शुरू किया! इसके लिए
१९८२ के अंत में ही देहरादून के समीप (एक पहाड़ी स्थल लगभग 90 km) स्थित हिल स्टेशन चकराता को
जो कि १९६२ में ही मिलिट्री छावनी में तब्दील किया जा चुका था), में
दरबार साहिब काम्प्लेक्स का एक मॉडल तैयार किया और सैनिकों को आक्रमण करने
की ट्रेनिंग शुरू कर दी गयी जब कि अभी किसी भी प्रि-प्रेक्ष्य में
आक्रमण वाली कोई राजनीतिक स्थिति भी न बनी थी! इस ट्रेनिंग का रहस्योदघाटन
भारतीय सेना के नंबर दो रहे प्रमुख जनरल सिन्हा ने अपनी पुस्तक में किया
है! इस से इंदिरा के शातिर दिमाग का पता चलता है! इसी जनरल सिन्हा को
इंदिरा गाँधी ने चौक मेहता (जिला बटाला-पंजाब स्थित गुरूद्वारे और
दमदमी टकसाल के मुख्यालय को टैंकों से उड़ाने का आदेश दिया था, जिसे जनरल
सिन्हा ने यह कह कर मानने से इंकार कर दिया था कि फौज की इस कार्रवाई से
भारतीय सेना के सिख सैनिकों की धार्मिक भावनाएं आहत होंगी और उनमें
रोष उत्पन्न होगा तथा वे अपने सैनिकों की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ नहीं
कर सकते!
जनरल सिन्हा को भारतीय सेना की कमान संभालनी थी लेकिन इंदिरा ने उनसे जूनियर जनरल वैद्य को तरक्की देकर सेना प्रमुख बना दिया! क्षुब्ध होकर जनरल सिन्हा ने सेना से त्यागपत्र दे दिया था ! एक निर्भीक, वीर और महान देश-भक्त सेनानी को किसी पवित्र धार्मिक स्थल पर सैनिक कार्रर्वाई करने से इंकार करने पर अपने जीवन की भारी कीमत चुकानी पड़ी! वाह रे इस देश का दुर्भाग्य?
इंदिरा द्वारा दरबार साहिब पर
आक्रमण की तैयारियों की सूचना फैलनी शुरू हो गयी थी !
अमेरिका स्थित सिखों के एक प्रतिनिधि मंडल ने फरवरी १९८४ में इंदिरा को
पत्र लिखा और उसे इस कार्रवाई के दुखद परिणामों से अवगत करवाया था
परन्तु अपनी जिद्द की पक्की इंदिरा ने उनकी एक न सुनी !
क्या संत जरनैल सिंह एवं उनके सहयोगी आतंकवादी थे?
यदि वास्तव में
सिख आतंकवादी थे या संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले आतंकवादी थे
तो जिस समय दरबार साहिब पर आक्रमण के लिए फौज को एक नकली माडल बना
कर चकराता में ट्रेनिंग दी जा रही थी, उस दौरान देश के शीर्षस्थ नेता संत
जी से मिलने दरबार साहिब आते रहे थे! जिस की प्रामाणिक तस्वीरें मौजूद हैं!
क्या वे एक आतंक- वादी से मिलने जाते थे ?
संत जरनैल सिंह रोजाना ही पहले लंगर हॉल की छत
पर बैठते थे और फिर बाद में श्री अकाल तखत पर लोगों से मिलते रहते थे!
प्रेस के लोग तो करीबन रोज़ ही उनसे मुलाकात करते थे और
उनके विचार जान कर अख़बारों की सुर्खियाँ बनाते रहते थे या रेडिओ से
प्रसारित करते थे! जब वे छत पर बैठे होते थे तो क्या उन्हें किसी
भी टेलीस्कोपिक राइफल से निशाना नहीं बनाया जा सकता था?
एक आतंकवादी को मारना इतना आसान था तो फिर दरबार साहिब पर हमला क्यों
किया गया और वो भी जान-बूझ कर उस दिन — जिस दिन सिख
श्रद्धालु अधिकाधिक संख्या में दरबार साहिब में
अपने गुरु का शहीदी दिवस मनाने के लिए उपस्थित थे?
यदि संत जरनैल सिंह
भिंडरांवाले एक आतंकवादी थे —जैसा कि आज भी भारत सरकार प्रचारित करती है तो
हम सिख इसका प्रमाण मांगते हैं ! भारत सरकार यह स्पष्ट करे कि क्या किसी
अदालत द्वारा उन्हें हाज़िर होने के लिए कोई सम्मन जारी किया गया था और
क्या वे उपस्थित न हुए थे? और क्या कोई वारंट भी जारी हुआ था? क्या किसी
अदालत ने उन्हें मुजरिम या आतंकवादी घोषित किया था? या स्वयं भारत सरकार ने
अपने किसी आदेश द्वारा उन्हें आतंकवादी घोषित किया था? क्या इस देश की
संसद को भी विश्वास में लिया गया था और क्या संसद ने भी उन्हें आतंकवादी
घोषित किया था? इसका प्रमाण दे भारत सरकार?
सच्चाई तो यह है कि संत जरनैल सिंह जी का सिख युवकों में प्रभाव इतना बढ़ चुका था कि
वे नशे अदि दुष्कर्म छोड़ कर सिख धर्म अपनाने लगे थे! जो शराब आदि का
व्यसन करते थे या आदि थे - उन्होंने शराब छोड़ दी! जो अपने दाढ़ी तथा केश
कत्ल करवाते थे, उन्होंने अपने केश और दाढ़ी बढ़ा ली तथा
अमृत लेकर विधिवत सिख धर्म अपना लिया ! सिख धर्म को अपनाने
के लिए कई मुस्लिम भी आये और वे भी सिख सजे! इससे पूर्व भी
कई ऐतिहासिक प्रमाण हमें मिलते हैं जब मुसलमान, सिख धर्म ग्रहण करते थे!
संत जी के प्रभाव से भी इन मुसलमानों ने सिख धर्म अपनाया था और उनमें से कई
तो संत जी के पक्के अनुयायी भी बन गये थे! वे अंत तक संत जी के
साथ दरबार साहिब जी की रक्षा के लिए लड़ते हुए शहीद हो गये थे!
पंजाब केसरी अख़बार ने तो इन मुस्लिम
युवकों की लाशें प्राप्त होने पर इन्हें पाकिस्तानी बता दिया था ! कारण था —
सरकार द्वारा फौजी हमले को उचित करार देना और सिखों को बदनाम करना!
इस समाचार ग्रुप के पास कोई प्रमाण न था लेकिन मैं आपको प्रमाण भी
देता हूँ! इस निचली तस्वीर में देखिये कि एक मुस्लिम युवक सिख बना और
फिर एक सिख लड़ाकू जरनैल भी ?
इन मुस्लिम युवकों की पहले से सुन्नत
की होती थी जिस कारण पंजाब केसरी अख़बार ने इन्हें पाकिस्तानी मुस्लिम
कहा जब कि मुर्दे बोलते नहीं — नहीं तो वे भी उठ कर अपने परिचय दे देते
कि वे सिख हैं !
और
सिर्फ मुसलमान ही नहीं, बहुत से हिन्दू नौजवान भी इस धार्मिक युद्ध में
संत जरनैल सिंह जी के साथ थे, परन्तु पंजाब की हिन्दू प्रेस ने कभी भी यह
भेद नहीं खोला! हमें सिर्फ एक तस्वीर हासिल हुई है जो भाई दुला की है! यह
हिन्दू भाई भी इस जंग में संत जी का साथ देते हुए शहीद हुए! हम उनकी शान
में अपना शीश झुका कर नमस्कार करते हैं! इनके बलिदान पर सिख समुदाय को गर्व
है!
देखिये भाई दुला जी की तस्वीर;
एक
समुचित जानकारी के अभाव में हम किसी ठोस नतीजे पर नही पहुंच सकते , न ही
इस सिख आन्दोलन में हिन्दू भाइयों या अन्यों की भागीदारी पर विस्तार पूर्वक
रौशनी डाल सकते हैं! ये सभी लोग अपनी मर्जी से इस आन्दोलन में शामिल हुए
जिन पर कोई लेख नही लिखे गए! न ही इनकी वीरता के कोई गीत गए गए फिर भी इनकी
शहादत को प्रणाम है!
श्री
रोशन लाल बैरागी के संबंध में कुछ रोचक तथ्य सामने आए हैं! कहा जाता है कि
ये पहले हिन्दू भाई हैं जिन्होंने संत जरनैल सिंह जी के सानिध्य से
प्रभावित होकर सिख धर्म अपनाया था! ये बैरागी ब्राह्मण अधिकांशत: बेहद गरीब
परिवारों से संबंधित होते हैं ! विशेषत: हिन्दू ब्राह्मणों का यह वर्ग सिख
धर्म के काफी नजदीक है! पंजाब के अमृतसर जिले के लगभग सभी गांवों में इन
परिवारों में से कोई न कोई तो अवश्य ही मिल जाएगा!
कुछ
और हिन्दू पंजाबी भाइयों के नाम, जो भारतीय मीडिया द्वारा ही बताये गए हैं
और जिन्होंने सिख आन्दोलन को अपनाया, उनमें से प्रमुख हैं - प्रदीप कुमार
उर्फ़ शेर सिंह शेर (अमृत पान करने के बाद का नाम), राकेश कुमार उर्फ़
रंजीत सिंह पप्पू शहीद १९९२, बलवंत राय उर्फ़ गुरदित्त सिंह गुल्लू शहीद १९९२,
अशोक कुमार बिल्ला, रमेश लाल उर्फ़ काबुल सिंह शहीद, विकास पंडित और उसका
भाई अशोक कुमार (सुखविंदर सिंह), के सी शर्मा शहीद, सुशिल कुमार शहीद, शाम
सुंदर शास्त्री उर्फ़ रंजीत सिंह बिट्टू शहीद १९९२, भाई देस राज देस सलेम तबरी शहीद १९९२, तरसेम राज पुलिस गिरफ्त से फरार १९९२ और रामस्वरूप पंडित उर्फ़ सुरजीत सिंह शहीद 1992
वास्तव में इन पंजाबी हिन्दू भाइयों
जिन्होंने धर्म युद्ध मोर्चा नामक आन्दोलन को अपनाया, के बारे में समुचित
जानकारी के अभाव में विस्तार पूर्वक कुछ बता पाना काफी दुष्कर है क्योंकि
इसके बारे में पर्याप्त सूचनाएँ उपलब्ध नहीं हैं, ये सब सूचनाएँ भी नेट से
हासिल की गई हैं! हमारी संपूर्ण कोशिश है कि इन हिन्दू भाइयों के बारे
में यथा संभव जानकारी प्राप्त करके अपने पाठकों तक पहुंचाई जाए !
हालंकि
मीडिया ने इस बारे में चुप्पी साध रखी है परन्तु सच्चाई तो यह है कि बहुत
से हिन्दू भाइयों को भी अमृतसर के दरबार साहिब (स्वर्ण मन्दिर) पर भारतीय
फौज के आक्रमण से और आनंदपुर प्रस्ताव को नामंजूर करने से काफी दुःख पहुंचा
था क्योंकि सिखों द्वारा प्रस्तुत यह मांग पंजाब प्रान्त के सिर्फ सिखों
के लिए ही नहीं थिस, इससे प्रान्त के सभी निवासियों के हित जुड़े हुए थे!
सभी ने इसके लागु होने से लाभान्वित होना था! अत: इन पंजाबी हिन्दू भाइयों
में से अनेकों ने सरकार के विरोध के फलस्वरूप सिख धर्म अपनाया और सिख
भाइयों के साथ ही कंधे से कंधा मिला कर भारतीय फौज, पुलिस तथा अन्य अर्ध
सिंकी बलों के साथ वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी !
संत
जरनैल सिंह जी खालसा भिंडरांवाले हिन्दू औरतों के एक जत्थे (दल) के साथ,
जो कि धर्म युद्ध मोर्चे (आन्दोलन) के दौरान श्री दरबार साहिब जी में संत
जी से मिलने आईं थीं, संत जी ने सबको अपना आशीर्वाद दिया था और सबको अपनी
बेटियां कह कर सम्मानित किया था!
गुरु
गोबिंद सिंह जी ने खालसा को यह उपदेश दिया था कि, 'वेख पराईयां चंगीयां
मावां धीयां भैनां जाणो !' अर्थात दूसरी संदर औरतों को देखकर उन्हें अपनी
माता, पुत्रियाँ तथा बहने मानो ! इस लिए खालसा को प्रत्येक स्त्री को बिना
किसी धर्म, जाति या अन्य नस्ली भेदभाव के अपनी माता, पुत्री या बहन ही जानना चाहिए !
इनमें
से कई हिन्दू जरनैल सिंह जी भिंडरांवाला की ओर से को दी गई सहायता और
साहिब प्रस्ताव के पास से पंजाब प्रान्त आने वाली खुशहाली के में पूरा
ज्ञान था! वे भी अपने अन्य सिख भाइयों की तरह ही श्री अकाल तख्त साहिब जी
को फौज द्वारा गिराए जाने से निराश अवश्य थे ! वे भी अपनी मातृ-भूमि पंजाब
का कर्ज़ उतारने के लिए अपने सिख भाइयों के साथ कंधे से कंधा मिला कर
लड़ने को तैयार हो गए और वीरता भारतीय फौज का मुकाबला करते हुए शहादत को
प्राप्त हुए! उन्हें पूरा संज्ञान था कि उनके बड़ों ने इससे पूर्व उनकी
मातृ-भूमि से द्रोह ही किया था, लेकिन अब अपने प्राणों की आहुति देकर उस
कलंक को धोना उन्होंने बेहतर समझा !
एक उदाहरण जब एक नेपाली हिन्दू, जिसने सिख धर्म अपनाया और बब्बर खालसा का सक्रिय सदस्य बना!
सीनियर
सुपरिंटेंडेंट पुलिस ने बलबीर सिंह के बारे में बताया कि वह एक नेपाली
हिन्दू था और उसने कुछ वर्ष पहले सिख धर्म अपना लिया था, उसे 1996 में
गिरफ्तार कर लिया गया था! यह बलबीर सिंह ही था जिसने जगतार सिंह तारा और
जगदीश सिंह (पंजाब के मुख्य मंत्री बेअंत सिंह हत्या केस में बंदीयों को जो
सन 2004 में चंडीगढ़ की बुढैल जेल भागने के आरोपियों को नेपाल भागने में
मदद की थी)!
यही नहीं सिर्फ हिन्दू या मुस्लिम ही नहीं, पंजाब के ईसाई भी इस आन्दोलन में अपना योगदान देने से पीछे नहीं रहे! खुर्रम मसीह उर्फ़ मनजीत सिंह उर्फ़ काला उर्फ़ अकाल, एक ईसाई जिसने सिख धर्म अपनाया और जो 'नीटा' का सहयोगी भी था, एक पुलिस मुकाबले में जम्मू के आर एस पुरा क्षेत्र के डब्लेहार गाँव में 28 दिसंबर 2000 को शहीदी प्राप्त की! प्राप्त सूचनाओं के आधार पर वह 'नीटा' का हिट-मैन था! यह खुर्रम मसीह जम्मू, दिल्ली, पंजाब आदि में लगभग 20 विस्फोटों के लिए जिम्मेदार था!
मुझे याद है श्री जय प्रकाश नारायण ने भारत सरकार द्वारा जारी एक नारे….”INDIRA IS INDIA INDIA IS INDIRA” के नारे पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी और कहा था कि …… “हमारे
संविधान में है ….. कुछ आप कहें – कुछ हम सुनें, कुछ हम कहें तो आप
सुनें ! एक दूसरे को कहते सुनते भी मुल्क की तरक्की हो सकती है ! लेकिन सब
कुछ हो कर भी कोई एक मुल्क की तकदीर और तस्वीर नहीं हो सकता !”
लेकिन
भारत सरकार के चापलूस अधिकरियों ने 'इंदिरा को भारत और भारत को ही इंदिरा'
की संज्ञा दे दी थी! आज पूछो तो भाई कि (इंडिया) भारत तो है लेकिन इंदिरा
कहाँ है?
संत
जरनैल सिंह जी ने इंदिरा गाँधी को पंजाबी भाषा में एक पत्र लिखा था जिसकी
प्रतिलिपि नीचे दी गई है, पाठकों की सुविधा के लिए इस पत्र को हिंदी भाषा
में भी अनुवादित कर दिया गया है! कृपया इसे अवश्य पढ़ें और देखें कि पंजाब
के लोगों को केंद्र से क्या शिकायतें थीं, यह उन पर अपनी मोहर लगाता है!
राजनीतिक पक्ष से भारत की मुख्य प्रतिनिधि बीबी इंदिरा जी, मैं अपने कुछ विचार प्रकट कर रहा हूँ, जो कि इस पत्र के द्वारा आपके बहरे कानों तक पहुंचेंगे! सिखों के खिलाफ की गई ज्यादतियों के बारे मेरी आवाज़ आप तक पहुंचेगी! इन ज्यादतियों ने सिखों की भावनाओं को आहत किया है! इस पत्र में जिस किस्म की भाषा का प्रयोग किया गया है, उस से शायद आपके बहरे कान भी सुनने लगेंगे! आपके बहरेपन को दूर करने के लिए मैं इस पत्र में अपनी भावनाएं प्रकट करना चाहता हूँ! इसे जरा ध्यान से पढ़िए! हिन्दुओं से संबंधित लाला जगत नारायण की मौत की जांच तीन दिनों में ही पूरी हो गई! यह मेरी गिरफ्तारी के वारंट से साबित होता है! पर सिखों के गुरु के कातिलों. सिखों की संपत्ति को नष्ट करने वालों और चन्दो-कला में सिखों की तीन लाख की संपत्ति लूटने वालों के खिलाफ जांच एक अफसर की रिट पर रोक दी गई, कि यह मामला एक सिख जज़ के पास है! मेरा केस हिन्दू जज़ के पास पेश किया गया! यह आपके बहरेपन का एक उदाहरण है, क्योंकि किसी भी सिख को यह आपत्ति नही थी कि मेरे केस की जाँच एक हिन्दू जज़ के पास क्यों है? हिंदी सूबे के लिए कोई हिन्दू जेल नहीं गया, हिन्दू मन्दिरों के नाम पर ट्रेन का नाम रखने के आरोप में किसी हिन्दू को हिरासत में नहीं लिया गया! कुछ हिन्दू रेलवे स्टेशनों को पवित्र शहर का दर्जा प्राप्त करने के लिए कभी कोई जेल नहीं गया! न ही किसी हिन्दू को किसी हिन्दू धार्मिक चिन्हों की रक्षा के लिए बलिदान देना पड़ा! आज़ादी के बाद उन्होंने सब कुछ हासिल किया जो कि उनके धर्म के अनुकूल सही बैठता था! पर इसके विपरीत आज़ादी के बाद से एक लाख सिखों को गिरफ्तार किया गया और बड़ी गिनती में सिखों ने पंजाबी सूबे, दरबार साहिब में ट्रांसमीटर लगाने, अलग राज्य की मांग, अमृतसर को पवित्र शहर का दर्जा देने की मांग, सिखों को अपने पवित्र चिन्हों को भी पहनने का अधिकार प्राप्त करने के लिए बलिदान दिया! उस वक़्त आपके बहरे कानों को कुछ सुनाई नहीं दिया!
सिखों
को पहले भी शासकों के जुल्मों का शिकार होना पड़ा, पर आपको यह जान लेना
चाहिए कि जब सिखों का सब्र जवाब दे गया तो उन्होंने भी श्री गुरु गोबिंद
सिंह जी के आदेश अनुसार हथियारों से सुसज्जित होकर वापसी की! जब
शांतिपूर्वक हल के सभी रास्ते बंद हो जाएँ तो फिर हथियार उठाना ही आखिरी
जायज़ हल बनता है! (जफरनामा)
पर
अभी हमारा हथियार उठाने का कोई प्रोग्राम नही है! पर यदि सिखों के साथ ऐसे
ही अन्याय जारी रहा तो और सहन नहीं किया जायेगा, क्योंकि हमारा सब्र भी अब
जवाब दे गया है! हमने लम्बे समय से शांतिपूर्वक ढंग अपना कर देख लिया है!
जब भी हम सरकार से अपनी मांगे मनवाने की बात करते हैं तो हम कहते हैं कि
प्रत्येक हिन्दू को अपने धार्मिक चिन्हों में पूर्ण विश्वास रखने का अधिकार
है! हम ऐसे प्रत्येक हिन्दू को अपने भाई की तरह देखते हैं! इसी तरह एक
मुस्लिम और एक सिख को भी अपने धर्म में पूर्ण होना चाहिए! यह सबक हम रोज़
सिखाते हैं! फिर भला ऐसे व्यक्ति को आतंकवादी कहना कहाँ तक उचित है?
सिखों
की इज्ज़त को रौंदना, एक सिख के मुंह में तंबाकू डालना और उस पर थूकना,
शारीरिक अंगों पर जख्म करके नमक डालना, सिखों के घरों को आग लगाना, सिख
लडकियों पर गलत आरोप लगाना, सिख विद्यार्थियों को गिरफ्तार करके उन्हें
झूठे मुकाबलों में मार देना आदि ऐसी घटनाओं का यहाँ उल्लेख करना आवश्यक है!
इस पत्र में सब कुछ संक्षेप में लिखा गया है! यदि आपके पास समय हो तो मैं
आपको सिखों के खिलाफ किए जा रहे भेदभाव के बारे में विस्तार सहित वर्णन
करूंगा!
जरनैल सिंह खालसा
(द संडे इंडियन से धन्यवाद सहित)
तो जिस दिन ३ जून १९८४ को इंदिरा
द्वारा श्री दरबार साहिब जी पर फौजी हमला करवाया गया, उसी दिन इंदिरा के
भाग्य का फैसला भी हो चुका था! सिख लोग सब कुछ भूल
सकते हैं परन्तु अपने गुरु घर पर किये गये आक्रमण या बे-अदबी को
बर्दाश्त नहीं कर सकते! इसलिए इस आक्रमण के द्वारा इंदिरा ने अपने
“डैथ-वारंट ” (अपनी मृत्यु के आदेश पत्र) पर स्वयं ही हस्ताक्षर कर दिए थे!
आप सब को याद होगा कि ब्रिटिश जनरल डायर
ने १९१९ में भी वैसाखी के पवित्र दिन पर अमृतसर शहर में दरबार साहिब के
बिलकुल समीप जलियांवाला बाग में निहत्थे लोगों पर गोलियों की बौछार की थी
जिसमें करीबन १००० लोग मारे गये थे! उधम सिंह नाम के एक सिख नौजवान ने
उस दिन शपथ ली थी कि वह जनरल डायर को उस के किये की सज़ा देगा और
लगभग २० साल बाद उसने इंग्लैंड में इस नर-संहार के आरोपी की हत्या कर
देश का सम्मान बचाया था और पापी को दंड दिया था! परन्तु शायद इंदिरा ने
इतिहास नहीं पढ़ा था, यदि पढ़ा होता तो याद रखती कि इस फौजी हमले के उपरांत
सिखों की प्रतिक्रिया क्या होनी थी?
फिर भी ऐसा प्रतीत
होता है कि इंदिरा को अपनी गलती का अहसास हो गया था और वो जानती थी अब सिख
उसे जीवित नहीं छोड़ेंगे ! उसने अपनी इस भयंकर भूल से कोई सबक तो न
सीखा अपितु अपने पुत्र राजीव गाँधी को अपनी हत्या होने पर सिखों से कैसे
बदला लेना है — यह निर्देशित करती रही और अपने चुनिन्दा विश्वसनीय प्रशसनिक
अधिकारीयों से मिल कर अपनी हत्या के उपरांत किये जाने वाले नर-संहार की
तैयारियां करती रही — जैसे कि
वोटर लिस्टों से सिखों के व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, उनके घरों, तथा उनके
कारखानों आदि को चिन्हित किया गया और निशानदेही (पहचान) कर ली गयी! उन
दिनों कम्प्यूटर तो न थे और न ही फोटोस्टेट की आधुनिक तेज गति से
प्रिंट छापने वाली मशीनें थीं अत: दिन-रात करके इन लिस्टों को तैयार करके
रखा गया!
यह सारा कार्य बड़े ही गोपनीय तरीके से
अंजाम दिया गया और इस में सिर्फ अपने विश्वसनीय लोगों की ही मदद ली गयी
अन्यथा सरकारी दफ्तरों में सभी धर्मों के लोग नौकरी करते हैं ! उनसे यह
बात छुपी नहीं रह सकती थी! संभवत: यह कार्य गृह मंत्रालय के आधीन ही
निर्देशित किया गया होगा?
एक नवंबर १९८४ की सुबह ही यह लिस्टें दंगाइयों और भाड़े के कातिलों के हाथों में देखी गई थीं, जिस से इस की तैयारी की पूर्ण झलक का अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है!
दिल्ली के सिख कत्लेआम के आंकड़े
यह आंकड़े प्रसिद्ध वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता नवकिरन सिंह जी द्वारा उपलब्ध करवाए गये हैं!
यह
वो आंकड़े हैं जो १९८४ से १९९४ के बीच एकत्रित किये गये, इनमें भी १९८४ के
सिख कत्लेआम में मरने वालों की संख्या २०,००० ही बताई गई है जो
विभिन्न एकत्रित आंकड़ों से मेल खाती हैं!
इसके साथ ही
एक कटु सत्य मैं और भी बताना चाहूँगा कि स्वर्ण मंदिर (दरबार साहिब)
पर किसी फौज द्वारा किया गया यह कोई पहला हमला नहीं था! इससे पूर्व भी
कई बार हमले किए गए लेकिन वे सभी हमले मुग़ल शासकों द्वारा सिखों
को खत्म करने के उद्देश्य से और सिख धर्म को जड़ से खत्म करने के
लिए इस धार्मिक स्थल को निशाना बनाया जाता रहा है! महत्वपूर्ण पहलू तो यह
है कि किसी भी आतताई हमलावर को इस पवित्र स्थल पर हमला करने के उपरांत
अपनी शेष जिंदगी के १५४ दिन पूरे करने नही मिले! कोई भी हमलावर १५३ दिन से
ज्यादा जिंदा नहीं रहा !
इस
१५४ दिन का क्या राज़ है — वैसे तो सत्य ईश्वर ही जाने लेकिन अपनी तुच्छ
बुद्धि और ईश्वर द्वारा प्रदत्त ज्ञान द्वारा मैं यहाँ स्पष्ट करना चाहूँगा
कि केवल पवित्र आत्माएं ही ८४ लाख योनियों के पश्चात् मिले इस जीवन के
उपरांत ईश्वर के दर्शन कर पाती हैं, अन्य पापी और
दुष्ट आत्माएं घोर नर्क के अंधेरों में दफन हो जाती हैं — उन्हें ईश्वर
या प्रभु के दर्शन नहीं होते!
देखिए न्यूमेरोलोजी (अंकविज्ञान) क्या कहता है :
१५४ = १+५+४ = १० = १
अर्थात इस
का (१५४ का) कुल योग एक हुआ और यह एक तो केवल सत्य को ही प्रदर्शित
करता है या ईश्वर को (सत्य तो केवल ईश्वर है जो युगों से — आदि काल से
सच है और आने वाले सभी कालों में भी सच ही रहेगा) और यह ‘एक’ पापी और दुष्ट
आत्माओं को दर्शन नहीं देता !
भारत की कांग्रेस सरकार का दमन चक्र…….?
अब पहली नवंबर की सुबह हुई! यह
सवेरा अपने साथ कालिमा लेकर आया था! आज जो घटित होनेवाला था वो कलुषित कलंक
- जो भारत माता के भाल पर लगने वाला था और उसे लगाने वाले भी उसके अपने ही
बेटे थे —स्वयं भारतवासी - उसकी अस्मिता के रखवाले?
दिन निकला और सरकार द्वारा पोषित कांग्रेसी गुंडे सडकों पर उतर पड़े — उन्हें सुरक्षा की गारंटी दी हुई थी, भारतीय प्रशासन, पुलिस, मंत्री परिषद, सभासद आदि सभी का सहयोग उन्हें प्राप्त था! उनके हाथों में सिखों के दफ्तरों, घरों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, मोटर गराज़ों, टैक्सी स्टैंड आदि की पूरी लिस्ट थी! जो स्वयं भारत सरकार के मंत्रियों ने उन्हें उपलब्ध करवाई थीं!
अब जो भी सिख
मिल जाता उसे पेट्रोल या केरोसिन या किसी भी अन्य ज्वलनशील पदार्थ से भिगो
कर आग लगा दी जाती! उनके वाहनों को भी आग के हवाले कर दिया जाता,
उनकी स्त्रियों के साथ छेड़ - छाड़ और बलात्कार भी किए गए ! ऐसा कुत्सित और
घिनौना कृत्य तो केवल हिन्दू ही कर सकते हैं क्योंकि मुसलमानों ने धर्म
परिवर्तन के लिए प्रलोभन अवश्य दिए थे परन्तु बलात्कार आदि नही किए थे
परन्तु इस देश के मूल वासी हिन्दू तो सभी सीमायें पार कर गए थे!
हैवानियत का नंगा नाच चारों और दृष्टि-गोचर हो रहा था! सिसकती सिख महिलाओं
को उनके मृत पतियों, भाइयों आदि की लाशों के बीच ही बलात्कार का निशाना
बनाया गया! ऐसा न कभी सुना था — न देखा था! शायद तैमुरलंग की आत्मा को भी
शर्म महसूस हो गई होगी परन्तु ये हिन्दू गुंडे तो उसे भी कई कदम आगे थे?
इंदिरा
गाँधी के मृतक शरीर को अंतिम दर्शनों के लिए तीन मूर्ति भवन में रखा गया
था जो पहले देश के प्रथम प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरु का सरकारी आवास था
अब यह एक संग्रहालय है! लोगों का ताँता लगा हुआ था! लोग
शांति-पूर्वक पंक्ति बना कर अपनी नेता को श्रद्धांजली दे रहे थे ! भारत के
नये युवा प्रधान मंत्री और इंदिरा के बेटे राजीव गाँधी भी स्वयं
वहां उपस्थित थे कि तभी भारतीय सिने जगत का मशहूर अभिनेता अमिताभ बच्चन भी
दिखाई दिया ! वह गाँधी परिवार का पारिवारिक मित्र था अत: उसका वहां
होना कोई अचम्भित करने वाली घटना न थी, परन्तु उसने जो इस देश-वासियों को
अपील की, वह अविस्मरणीय है !
उसके लिए दूर-दर्शन
(सरकारी टी वी चैनल) की टीम को बुलाया गया था ! जब कैमरा आदि की सभी
तैयारियां हो गईं तो अमिताभ बच्चन वहां पहुंचे और इस देश के
महान निवासियों को अपने गुस्से वाले और उकसाने वाली मुद्रा बना कर अपील की
……. 'खून का बदला खून!' और कि, "इंदिरा के मारने वालों के खून के छींटे उनके घरों तक पहुंचने चाहिएं….”
इस तरह अमिताभ बच्चन ने सब से पहले टी
वी पर आ कर हिन्दुओं को सिखों के खिलाफ भड़काया! उनका खून करने का सीधे
आह्वाहन किया! दिल्ली के कांग्रेसी लीडर जैसे कि सज्जन कुमार, स्वनाम
धन्य हरी किशन लाल भगत, जगदीश टाईटलर, धर्मदास शास्त्री, ललित माकन,
कमल नाथ आदि तो उन कुत्तों की तरह थे जो अपने इलाके में ही रक्त-पात कर
सकते थे और ऐसा ही उन्होंने किया भी! अपने-अपने इलाकों में इन कांग्रेसी
नेताओं ने वाल्मीकि, गूजर और जाटों को लेकर यह कत्लेआम अंजाम दिया परन्तु
अमिताभ तो वो शख्स था जिसने सारे देश में यह आग लगाई!
अमिताभ को सार्वजनिक रूप से सिखों को
कत्ल करने के लिए भडकाने का आरोप तो स्वयं पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के
भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री आर एस नरुला ने नानावटी कमिशन जो कि ०८ -०५
-२००० को सिख दंगों की जांच के लिए एक अध्यादेश द्वारा नियुक्त किया गया
था! अपनी ३८ प्रश्नों की प्रश्नावली में चौथे और पांचवें नंबर पर भी
यही पुछा गया है कि, "वह कौन व्यक्ति था जो दूरदर्शन पर सिखों के
विरुद्ध हिन्दुओं को भड़का रहा था औरअपने भड़काऊ नारों से सिखों का खून
मांग रहा था जबकि इस व्यक्ति को आसानी से स्पष्ट देखा और
पहचाना जा सकता था? यह व्यक्ति ३१ अक्टूबर की और की रात और पहली नवंबर को
टी वी पर दिखाई दिया था!
और हमने इसका स्पष्ट खुलासा किया है यह व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि सिने जगत का जाना-माना चेहरा अमिताभ बच्चन ही था! जस्टिस नरूला तो न्यायाधीश होते हुए इस शैतान का नाम नही ले सके थे लेकिन हम स्पष्ट रूप से इस कुख्यात व्यक्ति की पहचान जग जाहिर करते हैं ! जस्टिस नरूला अपने पांचवें प्रशन में स्पष्ट रूप से आरोप लगाते हुए पूछते हैं कि क्यों इस जाने-पहचाने व्यक्ति पर दो समुदायों में फूट डालने और सिखों के खून करने के लिए उकसाने पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
लोग कहेंगे कि इसका नाना (अमिताभ बच्चन
का) भी तो सिख था और उसकी माता तेजी बच्चन भी सिख परिवार से थीं पर वे यह
भूलते हैं कि उसकी माता ने एक विधर्मी कायस्थ से शादी कर के सिख धर्म
छोड़ दिया था और अब वह एक कायस्थ ग्रहिणी थीं! उसकी इंदिरा गाँधी से
मित्रता इलाहबाद से ही थी और अमिताभ बच्चन को फिल्मों में काम दिलवाने के
लिए भी इंदिरा गाँधी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया था!
मशहूर फिल्म निर्माता ख्वाजा अहमद अब्बास को इंदिरा गाँधी ने एक
सिफारिशी पत्र लिखा था, जिसे लेकर अमिताभ बच्चन बंबई गया था और
फिर इसे पहली फिल्म ‘सात हिन्दुस्तानी’ में एक छोटा रोल मिला था!
अब समय था उस कर्ज़ को उतारने का! अत:
अमिताभ ने टी वी पर आकर हिंदुस्तान के हिन्दुओं को सिखों का खून करने के
लिए उकसाया! उसकी इस उकसाहट की वजह से सिखों के खिलाफ देश भर में दंगे हुए
और निर्दोष सिखों के कत्ल हुए ! गैर प्रमाणिक स्त्रोतों की रिपोर्ट्स के
अनुसार सारे देश में लगभग २०,००० निर्दोष सिख कत्ल कर दिए गए थे!
विडंबना तो यह है कि इस के खिलाफ सभी सबूत मिटा दिए गए हैं! दूर-दर्शन के
पास इसकी विडियो है लेकिन वे नहीं देते ! मैंने प्रयत्न किया था लेकिन
दूर-दर्शन विभाग ने उस विडियो की क्लिप देने से मना कर दिया था!
मैंने स्वयं ने अमिताभ बच्चन के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में एक PIL इसके १९८४ में
सिखों के खिलाफ हिन्दुओं को भड़काने और सारे देश में
सिख विरोधी लहर पैदा करने तथा इसके
दूर-दर्शन पर लगाये गए उकसाने वाले नारों के कारण २०,००० से
अधिक हत्याएं करवाने के दोष में मुकद्दमा चलाने की विनय की
थी जिसे मन मोहन कुमार नामक जज़ ने मंजूर करने से इंकार कर दिया था और
तब मैंने इंटरनेट पर सब सामग्री डाल दी थी जिस के कारण अमिताभ बच्चन
का यह वीभत्स चेहरा सारी दुनिया के सामने आ सका! कृपया देखें http://failedattemptonamitabh.blogspot.com/ इस ब्लाग में आप सारी कानूनी कार्रवाई मय अदालती सबूतों के देख सकते हैं !
मैंने तो अपना बयान भी इंटरनेट पर
डाल दिया है जिस से यदि मुझे यह अपने प्रभाव से, भविष्य में कभी भी किसी
सरकारी एजेंसी द्वारा या भाड़े के गुंडों से कत्ल भी करवा देता है तो भी
दुनिया पढ़ सके कि सच्चाई क्या है? कृपया मेरे बयान के लिए देखें: http://monsteramitabh.blogspot.com/
१४ दिसंबर २००९ को
सदस्य लोक सभा सरदार तरलोचन सिंह जी ने देश की संसद में खुले आम यह
आरोप लगाए थे और रहस्योदघाटन भी किया था कि इस देश के
भूतपूर्व प्रधान मंत्री राजीव गाँधी और सिने अभिनेता अमिताभ बच्चन के १९८४
के सिख कत्लेआम में उनके हाथ थे (शामिल थे)! प्रमाण देखिए — http://www.emgonline.co.uk/news.php?news=8272/
श्रीमती प्रतिभा पाटिल
श्रीमती प्रतिभा पाटिल को भी इस देश राष्ट्रपति बना कर कांग्रेस ने अपना ऋण ही चुकाया था, इस पद द्वारा वे पुरस्कृत की गई थीं क्योंकि उनके पति के चुनाव क्षेत्र में भी १९८४ में निर्दोष सिखों का कत्लेंआम किया गया था !
देखें यह रिपोर्ट :
नानावती कमिशन की रिपोर्ट में भी उन
सिखों की गवाहियाँ मौजूद हैं जिनके पारिवारिक सदस्य प्रतिभा पाटिल के चुनाव
क्षेत्र में १९८४ में हिन्दुओं द्वारा कत्ल कर दिए गए थे ! इस रिपोर्ट को
आधार बना कर एक NGO शीघ्र ही RTI दाखिल करने जा रही है !
राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल द्वारा 6 Lancer, आर्म्ड कोर की एक रेजिमेंट को "The Standards" द्वारा सम्मानित किया गया ! इस रेजिमेंट ने आपरेशन ब्लू स्टार में भी भाग लिया था ! सिख्स फार जस्टिस (SFJ) एक मानवाधिकार NGO, जो
की १९८४ के सिख कत्लेआम की सच्चाइयों को उजागर करने में प्रयत्नशील है, ने
इस पर अपनी आपत्ति दर्ज़ की है और श्रीमती प्रतिभा पाटिल के १९८४ के सिख
कत्लेंआम में भागीदारी निभाने को लेकर अपनी शंका जाहिर की है ! यह विदित हो
कि महाराष्ट्र
के जलगाँव में नवंबर १९८४ में लगभग ७०० निर्दोष सिखों की हत्याएं कर दी गई
थीं ! इस दौरान श्रीमती प्रतिभा पाटिल एक विधायक और महाराष्ट्र सरकार में राज्य मंत्री (Cabinet Minister) थीं !
श्री
गुरपतवंत सिंह पनुन, कानूनी सलाहकार सिख्स फार जस्टिस ने बताया कि
महाराष्ट्र के जलगाँव में और आस पास के क्षेत्र में १९८४ में कई सौ सिखों
के कत्ल किए जाने के पुष्ट प्रमाण मिले हैं !१९८४ में इस क्षेत्र में
श्रीमती प्रतिभा पाटिल ही कांग्रेस की विधायक और राज्य मंत्री थीं ! जस्टिस
नानावती कमिशन के पास इस क्षेत्र से ७० से अधिक एफिडेविट प्राप्त हुए थे
जो मरने वालों के पारिवारिक सदस्यों द्वारा जमा किए गए थे ! श्रीमती
प्रतिभा पाटिल के इंदिरा से संबंध और सिखों के महाराष्ट्र में केवल उनके ही
क्षेत्र में ही कत्ल होने के पीछे श्रीमती प्रतिभा पाटिल का हाथ होने से
इंकार नहीं किया जा सकता! यह देखने की बात है कि १९८४ में सिर्फ जलगावं
क्षेत्र को छोड़ कर महाराष्ट्र में और कहीं सिखों को कोई नुकसान नहीं हुआ
!
प्रेजिडेंट
(राष्ट्रपति) पाटिल जो कि संसार के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक राष्ट्र की
अध्यक्ष हैं, उन्हें अपने क्षेत्र में १९८४ में निर्दोष सिखों के कत्लेआम
में अपना हाथ होने के संदेह को स्वयं सामने आकर दूर करना चाहिए ! इसके
लिए सिख्स फार जस्टिस सूचना के अधिकार का इस्तेमाल करते हुए १९८४ में
सिखों के नर संहार पर जलगाँव क्षेत्र से पुलिस में दाखिल सभी FIR की सही गिनती का पता करेगी !
इस
पुस्तक के लिखते वक़्त श्रीमती प्रतिभा पाटिल इस देश की राष्ट्रपति अवश्य
थीं, लेकिन किताब के प्रेस में जाते वक़्त तक वे अपना कार्य कल पूरा कर
चुकी थीं और श्री प्रणव मुखर्जी इस देश के नए राष्ट्रपति चुन लिए गए थे जो
अपना प्रभार संभाल चुके हैं !
इंदिरा के जुल्मों की दास्तान
आप लोगों ने मुगलों द्वारा हिन्दुओं और
सिखों पर किये गये अत्याचारों के बारे में अवश्य सुना होगा या पढ़ा होगा,
जैसे यदि ये मुस्लिम आतताई हिन्दुओं का जबरदस्ती धर्म परिवर्तन न करवाते तो
सिख धर्म तो होता पर शायद खालसा नहीं ! खालसा की स्थापना मुगलों के
जुल्मों से हिन्दुओं को बचाने और हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए की गई थी!
खालसा धर्म का प्रथम उद्देश्य ही जुल्म से टक्कर लेना है और
अब यहाँ जालिम स्वयं हिन्दुओं की अपनी सरकार थी जो अहसान फरामोश थी और
खालसा/सिख धर्म को मिटा देना चाहती थी?
आप
सब कलकत्ता के होल्वेल स्मारक से भी परिचित अवश्य होंगे! इस स्मारक
को अंग्रेजों ने बनवाया था क्योंकि लगभग १२२ ब्रिटिश औरतें तथा मर्द बंगाल के
मुस्लिम नवाब द्वारा एक १०’x१०’
के छोटे से कमरे में बंद कर दिए गए थे! इन में से अधिकांश की गर्मी से
दम घुटने के कारण मृत्यु हो गयी थी! ऐसा जुल्म भी
सिखों पर भारत सरकार द्वारा किया गया था
जिसका संपूर्ण आखों देखा वृतांत हाज़िर है …
जाने-माने
पत्रकार हरबीर सिंह भंवर अपनी पुस्तक में अपने एक मित्र द्वारा प्रस्तुत
आखों देखा वृतांत पेश करते हुए लिखते हैं कि…...प्रोफेसर धवन के कोई नजदीकी
रिश्तेदार स्थानीय मिलिटरी कैम्प (अमृतसर) में काम करते हैं ! वे कैम्प
में POW (जंगी
कैदियों) को देख कर आये हैं! उन्होंने बताया है कि एक कमरे में बहुत
ज्यादा सिख बंदे कैद कर के रखे गये हैं! एक सरकारी अफसर ने भी इसकी पुष्टि
की है कि एक स्कूल की नई बनी इमारत के एक कमरे में ६० - ७० बन्दों को बिना
पंखे या पानी के रखा गया है, इनके कपडे फटे हुए हैं ! जख्मों का इलाज नहीं किया
गया है और न ही इलाज का यहाँ कोई प्रबंध है) [पेज ५७] गर्मी भयंकर है,
पंखा भी नहीं लगा है! दो व्यक्तियों को टट्टियाँ लग गई तो वे खिड़की के
रास्ते से बाहर आ गए! फौज ने उन्हें गोली मार दी! इलज़ाम यह लगाया गया कि
वे भागने की कोशिश कर रहे थे! (इस तरह पीछे इस के बाद अनेकों सिख कैंट में
ही गोली मार कर शहीद कर दिए जाने की खबर भी सुनी)
अब आप ही देखिए कि
सिख धर्म अकेला ऐसा धर्म है जो बिना किसी नस्ली, रंग-भेद, धर्म या उंच-नीच
तथा जाति-पांति के भेद-भाव के बिना सब मनुष्यों को एक ही पंक्ति में खाना
खिलाता है (लंगर) परन्तु भूखे-प्यासे या बीमार मनुष्यकी सेवा करने की
बजाय उसे गोली मरने का काम हिन्दू या भारत की सेना करती थी!
कितना जमीन-आसमान का फर्क है खालसा/सिख धर्म और हिन्दू धर्म में?
यहाँ
यह भी बताना आवश्यक है कि पत्रकार हरबीर सिंह भंवर का घर जो
दरबार साहिब की परिक्रमा में था, उसे भी फौजी जवानों ने लूट लिया था और
उनकी पत्नी के गहने तथा आलमारी से नकदी आदि भी चुरा ली गई थी!
असल फौजी हमला ५ जून की रात को
हुआ था!संत लोंगोवाल और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी के
प्रधान गुरचरन सिंह तोहड़ा भी उस दिन अपने दफ्तर में ही मौजूद थे जो कि
समुंदरी हॉल (गुरु राम दस सराय में स्थित है)! पांच जून की रात १०
बजे फौज ने अन्दर स्थित सिखों का कत्लेंआम शुरू किया!
गुरमीत सिंह चीमा, पब्लिसिटी इंचार्ज SGPC जो
उस रात वहां मौजूद थे, बताते हैं कि ……..फौज के लिए हर सिख आतंकवादी था!
खास नोट करने वाली बात थी कि हर फौजी शराब के नशे में धुत्त था (होश में
होता तो शायद भगवान से डरता और निर्दोषों पर जुल्म न करता और न ही उनकी
हत्याएं इसीलिए इन फौजी जवानों को अधिक मात्रा में शराब दी गई थी)
दरबार साहिब जैसे पवित्र स्थान पर हमला करने के लिए उन्हें शराब पिला कर
उकसाया गया था! दरबार साहिब परिसर (क्म्पेक्स) में घनघोर लड़ाई चल रही थी!
इस दौरान संत लोंगोवाल और तोहड़ा जी, प्रधान जी के दफ्तर में थे और हम अपने
कुछ साथियों के साथ अंदर समुंदरी हॉल के दफ्तर में ! सारा समुंदरी हॉल और
दफ्तर खचा-खच श्रद्धालुओं और SGPC के कर्मचारियों से भरे पड़े थे!
दरबार साहिब परिसर में घनघोर लड़ाई चल
रही थी! सुबह पौने चार बजे फौज ने समुंदरी हॉल घेर लिया और दहशत फैलाने के
लिए अँधा-धुंध गोलीबारी शुरू कर दी! जैसे ही फौजियों को पता लगा कि संत
लोंगोवाल जी भीतर हैं तो उन्होंने जोर से चिल्ला कर इसकी सूचना अपने
अफसरों को दी कि, "लोंगोवाल साहिब यहाँ हैं!”
आवाजें सुनते ही संत लोंगोवाल और
तोहड़ा जी बाहर आ गए! एक अफसर ने इनको बाजुओं से पकड़ा और अपनी हिरासत में
ले लिया ! अब इसके बाद फौजी जुल्मों का नया दौर शुरू हुआ!
हमारी सबकी तलाशी ली गई और हमारे धार्मिक चिन्ह किरपान को उतार लिया,
हमारी पगड़ियाँ भी उतार दी गईं और जेबें खाली कर दी गईं!
इस के बाद हमें गुरु रामदास सराय के
खुले अहाते में ले जाया गया ! एक हजार के लगभग निहत्थे लोग यहाँ एकत्रित थे
! कोई साढ़े चार बजे सुबह का समय होगा, अभी हमने अपनी पांच-छह लाइनें ही
बनाईं होंगी कि सराय कि उपरी मंजिल से हम पर दो ग्रेनेड फेंके गए जो हमारे
बीच आ कर फटे! ग्रेनेडों के हमले से बचने के लिए पब्लिक में
अफरा-तफरी फैल गई, लोग बचने के लिए इधर-उधर भागने लगे ! इसी बीच फौजियों ने
भीड़ पर अँधा-धुंध फायरिंग शुरू कर दी! बेपनाह लोग मारे गए या जख्मी हुए!
इस अहाते की पुरानी तस्वीर देखें;
इसके बाद हम बचे हुए लोगों को सराय के
बरामदों में बिठा दिया गया! हम तड़पते जख्मियों और चारों और छितरी लाशों के
मध्य बैठे थे! फौज बड़ी बेदर्दी से बेगुनाहों के खून से होली खेल रही थी!
हमारे सामने ही लोगों को हाथ खड़े करवा कर भगाया जाता और पीछे से गोली मार
दी जाती! कोई कमरा ऐसा नहीं था जहाँ लाशें न थीं! वो फौज जिस पर हर देशवासी
गर्व करता है — उसका एक नया चेहरा देखने को मिला! कमरों में
पहले आग लगाने वाला बंब फेंका जाता फिर फायरिंग शुरू कर दी जाती!
सिर्फ सराय में ही आठ सौ से अधिक लोग कत्ल कर दिए गये! गुरूद्वारे में
उपस्थित इन लोगों को ४ जून से पानी की बूँद नसीब नहीं हुई थी! हॉल नंबर
पांच में ३५ आदमी थे जिसमें से ३१ की प्यास से तड़पने के कारण मृत्यु हो गई
थी!
क्या आप अपनी ही फौज से ऐसी उम्मीद रख सकते हैं? इस भारतीय फौज ने निहत्थों को बचाने के बजाय
उन्हें स्वयं ही गोलियों से भून डाला! क्या शर्म नहीं आई होगी इन नर-भक्षी
भेड़ियों को? तो क्या इंदिरा गाँधी दोषी नहीं थी इन सब निर्दोषों की
हत्याओं के लिए जिन्हें दरबार साहिब परिसर से सुरक्षित निकलने का कोई
मौका नहीं दिया गया था?
तो
क्या इंदिरा दोषी नहीं थी, और क्या उसे इन सब निहत्थों के खून से होली
खेलने का दंड नहीं मिलना चाहिए था? यदि सिख कौम के महान शूरवीरों ने
इसे दंड दिया तो क्या गुनाह किया? है कोई जवाब आपके पास?
यदि निर्दोष भारतीयों पर जलियाँवाला
बाग में गोली चलाने वाला अँगरेज़ जनरल डायर भारतीयों की नजर में
दोषी था और सरदार उधम सिंह जी ने, जिसने बीस साल बाद इंग्लैण्ड में उसे
मार कर देश की लाज रखी और निर्दोष भारतीयों की हत्या का बदला लिया और देश
भक्त कहलाया तो इंदिरा गाँधी जैसी आतताई प्रधान मंत्री और भारतीय
फौज के मुखी हजारों निर्दोष सिखों और
उनकी महिलाओं तथा बच्चों को मारने वाले सिख' शहीद नहीं तो
क्या वे आतंकवादी हैं? किस परिमाप से देश-भक्ति की
सूची तैयार होती है इस देश में? अरे इस देश की कांग्रेस सरकार ने तो
आज तक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी को भी देश-भक्त स्वतंत्रता सेनानी नहीं
माना है — माना है तो सिर्फ नेहरु और गाँधी या अन्य कुछ कांगेसी नेताओं को —
भारत का इतिहास पढ़िए और इस कटु सत्य को स्वयं देखिए!
और भारत की सेना तथा
पुलिस के सिखों पर अमानवीय अत्याचारों ने तो हिटलर को भी
पीछे छोड़ दिया था! एक सिख युवती जो कनाडा की रहने वाली थी और अपने पति तथा
१३ साल के बेटे के साथ श्री दरबार साहिब जी
के दर्शनार्थ अमृतसर आई हुई थी, उसे भी गिरफ्तार कर लिया गया! उसके साथ
किये गये अत्याचारों को पढ़ कर तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं — वह अभी भी
जीवित है और गवाह है उस त्रासदी की जो उसने भुगती, उस पशुता की और नीचता की
जो यह सैनिक बल किसी मनुष्य के साथ कर सकते हैं, जो उसने
झेला परन्तु न जाने कितनी और बदनसीब सिख महिलाएं होंगी जिन पर
इन राक्षसों ने यह जुल्म ढाए होंगे? उन अबलाओं का न जाने क्या हुआ होगा जो
इन अमानवीय अत्याचारों को न सह सकी होंगी? या तो उन्होंने ग्लानी से
आत्म-हत्या कर ली होगी या इन नर पिशाचों ने उनका वध कर दिया होगा —
ईश्वर जाने !
प्रस्तुत है....उस वीरांगना सिख महिला की आत्म कथा जो उसने खुद बयान की है, माई हरिंद्र कौर अभी जीवित है!
दुर्योधन
की सभा में उसके भाई दु:शासन द्वारा द्रोपदी को केशों से पकड़ कर खींच कर
लाया जाना और फिर अर्ध नग्न किया जाना---हिन्दू समाज पर आज भी कलंक है
लेकिन इस घटना ने महाभारत का युद्ध करवा दिया था ! यह एक कटु सत्य है तो
हमारी सिख स्त्रियों के साथ जो इस से भी बढ़ कर भारतीय सरकार और इसके
अर्ध-सैनिक बल, सेना तथा पुलिस द्वारा जो अत्याचार किये गए--उसकी सिर्फ एक
मिसाल वो भी भुक्त भोगी यातना पीड़ित महिला का खुद का बयान मैं यहाँ हिंदी
में अनुवादित कर रहा हूँ! ऐसे अत्याचार और कितनी मेरी बहनों ने अपने बदन पर
सहे होंगे--वितृष्णा आती है इस भारत भूमि से जहाँ ऐसे पापी लोग रहते हों
और निर्बल महिलाओं पर अत्याचार करते हों? कैसे मान लें इस देश को अपना?
क्यों न अपना अलग देश मांगे जहाँ हमारी माँ-बहनों व बेटियों की अस्मिता
सुरक्षित हो? क्या हमारा अपना अलग देश मांगना फिर भी अपराध है? यदि हाँ तो इस अपराध में हमें दे दो फांसी? क्यों नहीं उस नर
पिशाच के पी एस गिल को भी उसके मानवता के विरुद्ध किये गए अपराधों के
लिए इसे दंडित नहीं किया जाता? क्या हमें गर्व से कहना चाहिए कि,
"हम भारतवासी हैं?"
इंदिरा गाँधी का जुर्म :
आखिरी बार जब मैं अमृतसर में थी - जून १९८४, द्वारा; माई हरिंद्र कौर
४ जून १९८४
मैं अपने पति मणि और तेरह वर्षीय पुत्र संदीप के साथ अमृतसर में थी! हम करीबन दोपहर से ही शहर में थे और हमारा रिश्तेदारों के घर आना-जाना लगा हुआ था जिनमें से अधिकांश उसी क्षेत्र में रहते थे !
तारीख जो शायद तुम में से अधिकांश को
याद भी नहीं होगी-- आपरेशन ब्लू स्टार की शुरुआत की थी, जैसा कि इसे भारतीय
सरकार ने नाम दिया था जब कि भारतीय फौज ने हरमंदिर साहिब जी पर आक्रमण
किया था, इस दावे के साथ कि वे आतंकवादियों की तलाश कर रहें हैं !
फौज
को पता था कि हजारों श्रद्धालु सिख गुरुद्वारा साहिब के अंदर शहीदी
गुरुपर्व मनाने के लिए एकत्रित हैं ! फिर भी फौज ने सारे परिसर में अँधा
धुंध गोलियां चलाईं, भगवान जाने कितने मार दिए? जब फौज की यह कार्रवाई चली, उस समय हम भाग्यवश अपने एक रिश्ते के भाई के घर में थे, इस कारण हम सुरक्षित थे !
फिर भी हम इतने भाग्यशाली न थे! परन्तु सौभाग्यवश हमारे तीनों के पास हमारे पासपोर्ट मौजूद थे !
मुझे यह तो याद नहीं कि हमें कहाँ ले
जाया गया था, शायद कहीं कोई पुलिस स्टेशन होगा ! उन्होंने हम औरतों और
मर्दों को अलग अलग कर दिया ! मुझे डर था कि शायद मैं आखिरी बार अपने पति
तथा अन्यों को देख रही हूँ !
तब उन्होंने हम औरतों को अलग अलग कमरों
में बंद कर दिया ! मैं इन्तिज़ार करती रही ! जिंदगी में पहली बार मुझे डर
लगा ! कुछ समय बाद एक बहुत ही नौजवान पुलिस अफसर कमरे में आया ! यद्यपि
मेरे हाथ कमर के पीछे बंधे हुए थे फिर भी किसी तरह मैंने अपना कनेडीयन पास
पोर्ट बाहर निकाला !
उस पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा !
'क्या तुम सिख हो?' बिना किसी भाव को प्रदर्शित किए ही मुझसे पूछा !
'हाँ!' मैंने शांति पूर्वक जवाब दिया!
'गलत जवाब ' यह कह कर मेरे गाल पर थप्पड़ जड़ दिया
'क्या तुम सिख हो?' किसी भाव को प्रदर्शित किये बिना पूछा!
'हाँ!' मैंने फिर शांति पूर्वक उत्तर दिया !
'गलत जवाब' उसने जोर से थप्पड़ मेरे गाल पर जड़ दिया !
'क्या तुम सिख हो?' बिना कोई भाव प्रदर्शित किए उसने फिर पूछा !
'हाँ!' मैंने शांति पूर्वक फिर से जवाब दोहरा दिया !
'गलत जवाब और तुम मूर्ख भी हो' उसने अपनी हाथ की मुट्ठी को बंद किया और मेरे मुंह पर घूँसा जड़ दिया !
'क्या तुम सिख हो?' हल्की मुस्कुराहट से फिर पूछा!
'हाँ
! मैं खालसा हूँ!' मेरे मुंह से खून बाहर बह रहा था ! मैं सोचती हूँ, मुझे
कहना चाहिए था कि मैं भयभीत नहीं हूँ पर यह कहना झूठ होगा ! एक बड़ा झूठ!
मैं तब से आज तक जिंदगी में कभी इतना न डरी थी ! फिर भी मैंने अपनी आवाज़
को काबू किया !
वह मेरे उपर झुका और मेरी कमीज़ को
फाड़ कर फ़ेंक दिया ! फिर उसने मेरी किरपान को खींच कर निकाल लिया ! "छोटी
संत सिपाही के पास छोटा चाकू" ताना मारते हुए बोला ! फिर किरपान का फल मेरे
गले पर रख दिया ! मैं बिना किसी भय के खिलखिला उठी ! एक बिना सोचा समझा
कृत्य!
दूसरे
अन्य सिखों की तरह, मैं खुन्डित (बिना धार वाली) किरपान नहीं पहनती ! मैं
जानती हूँ ! मैं जानती हूँ! किरपान एक धार्मिक चिन्ह है, कोई शस्त्र नहीं !
मैं माफ़ी चाहूंगी यदि मेरी बात से किसी को कोई दुःख पहुंचा हो ! मैं
जानती हूँ कि इस से जरूर किसी को दुःख होगा लेकिन मेरे दिव्य पिता श्री
गुरु गोबिंद सिंह जी ने कभी भी हमें बिना हथियार के रहने को कहा हो ! इसलिए
साधारणत: रेजर की धार वाला फ्रेंच खंजर पहनती हूँ जो कि मेरी घर की एक
बूढी स्त्री ने मुझे दिया था ! मेरा मानना है कि इसे सही मायने में किरपान
कहना उचित नहीं होगा परन्तु मैं इसे ही पहनती थी ! मुझे पूरी तरह याद नहीं
कि क्यों इसे मैंने उस दिन इसे नहीं पहना था ! यदि पहना होता तो मेरी
मृत्यू उस दिन निश्चित थी !
इसलिए मैं खिलखिला कर हंसी थी !
यह
उसको चिढाने के लिए काफी था, तब उसने मेरी पैंट उतार दी ! इसी समय एक अन्य
पुलिस वाला भीतर आया ! पहले वाले ने मेरे केश पकड़ कर खींचे ! "तुम
असभ्य खालसे इन की बहुत पूजा करते हो? करते हो या नहीं? क्या यह सच है कि
तुम इन केशों को कटवाने से पहले मरना पसंद करोगे?"
मैंने स्वीकार किया,"हाँ !"
"बेवकूफ"
दूसरे पुलिस वाले ने उसे एक जोड़ी
बड़ी कैंची की दीं ! उसने तब मेरे केशों की और इशारा किया! "मैं इसका
इस्तेमाल करने जा रहा हूँ ! मर्जी तुम्हारी है: यहाँ! "मेरे केशों की ओर इशारा
किया, "या यहाँ?" और तब उसने मेरे कछहिरे (अंडर वीयर) का उपरी हिस्सा काट
डाला जिससे वह नीचे गिर पड़ा ! "मेरी योनी की ओर इशार करते हुए बोला !"
वह हंसता रहा, हंसता ही रहा !
इस पर मैं भी घबराहट में भी हंस पड़ी !
भय से मैं सुन्न थी ! मैं कुछ नहीं बोली परन्तु भीतर से मेरे शरीर का रोम रोम पुकार रहा था !
गोबिंद
न 'गुरु,' न 'सिंह,' और न ही 'जी,'
सिर्फ 'गोबिंद'
उसी
क्षण इस का परिणाम दिखा ! मेरा भय काफूर हो चुका था ! मुझे दर्द भी नहीं
हो रहा था ! मैं नहीं जानती ! मैं कैसे जान सकती थी की किस कारण उनकी
हिम्मत नहीं हुई मेरे केश काटने की ! मैं इस से रत्ती भर भी परेशान नहीं थी की वे मेरे साथ क्या करेंगे ! मुझे मेरे पिता के कहे शब्द सुनाई दिए, "मेरी मर्जी के बगैर कोई मुझे नीचा नहीं दिखा सकता!"
मैं हंसी ! "मैं खालसा हूँ !"मैंने कमरे में लगे शीशे की ओर देखा !
मैं पूरी तरह से बेवकूफ नहीं हूँ! मैं जानती थी कि पुलिस के जांच केन्द्रों में एक तरफा पारदर्शी शीशे लगे होते हैं ! और मैं पूरी
तरह निश्चिन्त थी कि पुलिस वाले मेरे पति और मेरे बेटे को इन राक्षस,
हरामजादे दोगलों द्वारा किया जा रहा मेरे प्रति कृत्य अवश्य दिखा रहे होंगे
! मैंने अपने दिखाई न देने वाले पति की (शीशे के पार) ओर मुस्कुरा कर अपना
सिर हिलाया !
उसने मेरे पेट पर जोर से प्रहार किया
लेकिन मुझे कुछ नहीं हुआ ! उसने ऐसे प्रहार कई बार और मेरे ऊपर किये जब तक
कि उसने आखिरी बार मेरे पैरों पर प्रहार करके मुझे फर्श पर गिरा नहीं दिया !
मैंने स्वयं को कभी इतना शांतचित्त तथा पूर्ण नहीं पाया था, इसे शब्दों
में बयान करना कठिन है लेकिन सत्य यही है!
वह तब मेरे उपर खड़ा हो गया और मेरी ओर
घूरने लगा, में पूर्णत: नग्न थी और फर्श पर गिरी हुई थी ! उसने बार बार
मेरे सिर पर प्रहार किए ! तब उसने मेरे केशों को पकड़ कर खींचा और अपने
साथी की मदद से मुझे एक कुर्सी पर बिठा दिया ! तब उसने मिर्चों के पाऊडर की
थैली खोली और मेरे सारे चेहरे पर मला, मेरी नाक में डाला और मेरी आँखों
में भी ! मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं की !
उसने मेरी टांगों को चौड़ा किया और तब
मिर्च पाऊडर को मेरी योनी और उसके चारों ओर लगाया ! दूसरे ने मुझे आगे मेरे
पैरों की ओर खींचा जबकि पहले वाला मेरे गुदा द्वार में से मल निकाला और
मेरे मुंह में डाल दिया ! ! सारे समय वह मुझे हर तरह से नीचा दिखाने के
लिए ताने मरता रहा ! पर इन सब से भी मेरी हिम्मत नहीं टूटी ! मैं यह सब तो
नहीं बता सकती कि उस ने मुझको क्या-क्या कहा, विशेषत: यह सब ठेठ पंजाबी में
था जिसे मैं थोडा बहुत ही समझ सकती थी और यह सब बताने से कुछ प्राप्ति भी
नहीं होगी सिवाय किसी को यह सिखाने के, कि किसी के साथ दुर्व्यवहार कैसे
किया जाता है !
जब
वह मिर्चें लगानी बंद कर चुका तो उसने कैंची पकड़ ली जो काफी तेज दिखाई
देती थी ! मेरी सारी छाती पर, फिर मेरे पेट पर उसने छोटे-छोटे कट लगा कर
घाव किये ! परन्तु जब मैंने कोई प्रतिक्रिया प्रदर्शित नहीं की तो उसने
मेरे पैरों के नीचे तलवों पर घाव बनाए ! अब तक वह पूर्णत : निराश हो चुका
था ! मैंने सोचा कि या तो वह मेरा गला काट देगा या मेरी ऑंखें बाहर निकाल
देगा !
उसने
मुझे फिर से मेरे केशों से पकड़ा और जमीन पर फ़ेंक दिया और मेरी टांगों
को फिर से चौड़ा किया ! उसने अपनी कैंची मेरी योनी पर लगाई ! यह उसकी मुझ
से बलात्कार की मंशा ज़ाहिर करने का इशारा था ! वह रुका, उस क्षण को बचाने
के लिए ! (एक तरह से धमकी)
ठीक उसी समय दरवाज़ा खुला और कोई जोर से चिल्लाया ! ठहरो ! हमें हुकम है कि कनाडीयों से न उलझा जाए !
उसने मेरी ओर पूरी घृणा से देखा ! लेकिन रुक गया ! दूसरे पुलिस वाले ने मेरी कलाइयाँ खोल दीं !
मैं
खड़ी हुई, अपना कछहिरा उठाया और पहना, फिर अपनी पैंट पहनी ! मेरी कमीज़
सारी बेतहाशा फट चुकी थी ! मेरे मुंह में अब भी खून भरा हुआ था जो मैंने
उसकी ओर मुंह करके, उसके पैरों के पास थूक दिया ! वह बड़ी धीमी आवाज़ में
बोला जिसे केवल मैं सुन सकती थी, "फिर यदि कभी मैंने तुम्हें दुबारा देखा,
तुम्हें अपने पर पश्चाताप होगा कि मैंने तुम्हें आज ही क्यों नहीं खतम कर
दिया !"
तो
मुझे अपने भीतर क्या महसूस हो रहा था जब वह मुझे शारीरिक और
मानसिक यातनाएं दे रहा था! मैं दावे के साथ कहती हूँ ये यातनाएं ही थीं!
मैं देख सकती थी, सुन सकती थी और जो कुछ भी हो रहा था, उसे महसूस कर सकती
थी ! परन्तु मुझे कोई दर्द नहीं हुआ! न शारीरिक और न मानसिक, न तब और न बाद
में! वास्तव में मुझे मूल मंत्र बोलने की बहुत सी आवाजें सुनाई दे रहीं
थीं ! बार बार सुनाई दे रही थीं ! यह एक बहुत ही सुखद अहसास था जो कि कोई
कल्पना ही कर सकता है ! इस सब ने मुझे (मेरी आत्मा को) कहीं दूर पहुंचा
दिया था जहाँ दर्द महसूस नहीं होता ! यह सुखद अहसास मुझे अपनी इस जिंदगी
में दूसरी बार हुआ था ! तब से फिर यह इसके बाद नहीं हुआ !
मुझे
अपने आप में दो जिंदगीयां एक साथ जीने का अहसास हो रहा था ! मेरी सभी
चेतनाएं फिर से मुझ पर हावी हो चुकी थीं ! मेरी सुनने की शक्ति बढ़ चुकी थी
! आस पास के रंग स्पष्ट और जीवंत हो उठे थे ! मैं पूरी तरह से चेतन और
जाग्रत थी ! मैं यह स्पष्ट कर देना चाहती हूँ कि मैं कोई बहुत बहादुर,
मजबूत, या हीरो नहीं हूँ ! और मैं कोई ऐसी स्त्री भी नहीं हूँ जो किसी
दूसरे व्यक्ति द्वारा शारीरिक पीड़ा पहुंचाए जाने से स्त्री-सुख (सेक्सुअल)
प्राप्त करती हूँ ! मैं एक खुशहाल जिंदगी जीने वालों में से हूँ जैसी कि
मैं कल्पना कर सकती हूँ ! मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि वे मेरे साथ
क्या कर रहे थे !
मैं
क्यों सोचूँ कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि मैं उस विश्वास पर कायम
हूँ जो मेरे पिता ने किया था ! इस सब में मैं कोई विशेष अहमियत नहीं रखती
हूँ ! इस स्थिति में कोई भी खालसा हो, उसे अधिकार है शायद कर्तव्य पालना
करना कि वह भी ऐसा ही करे ! कोई विशेष नहीं, कोई गुप्त शब्द नहीं (संदेश)
कोई मूर्खता भरे संस्कार नहीं, केवल पूर्ण ध्यान पिता दसमेश का !
इस के साथ ही मैं कुछ शब्द यहाँ कहना
चाहूंगी ! सबसे पहले, कुछ बातें मर्यादा बनाए रखने की खातिर जो मैंने छोड़
दी थीं, कि मेरा बलात्कार नहीं हुआ था, क्योंकि बलात्कार केवल पुरुष लिंग
के योनी प्रवेश को ही कहते हैं! कृपया ध्यान दें कि किसी को यातनाएं देना
कोई सुखद, आकर्षित करने वाला अहसास नहीं है, इसके लिए किसी विशेष उपकरण की
आवश्यकता नहीं, केवल कुछ मिर्चें, एक जोड़ी तेज धार वाली कैंची और मेरी
कलाइयों को बांधने के लिए कुछ भी ! और केवल थोड़ी कल्पना यन्त्रणा देने के
लिए !
मैंने यह भी स्पष्ट नहीं किया है कि, उस
समय मैं अपने गर्भकाल की पहली तिमाही में थी (तीसरा महीना चल रहा था),
उनको, बे-शक किसी भी तरह से यह पता नहीं चल सकता था और न ही उन्हें इससे
कोई फर्क पड़ता था ! मेरे गर्भ के शिशु को तब, वहां क्यों कोई नुकसान नहीं
पहुंचा, मैं केवल यह कह सकती हूँ कि उनकी और मेरी रक्षा किसी भी तरह
से मेरे पिता गुरु गोबिंद सिंह जी ने ही की है !
"मैं केवल मुस्कुराती रही ! " कृपया क्या मैं अपनी किरपान वापस ले सकती हूँ?"
दूसरे पुलिस वाले ने मेरी किरपान, मेरे पासपोर्ट के साथ मेरे हाथों में दे दी !
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और अपने साथ एक बड़े कमरे (हॉल) की ओर
ले चले जबकि अभी भी मैं अर्ध-नग्न थी और मेरे खून भी बह रहा था ! बड़े ही
सम्मान सहित मेरे १३ वर्षीय बेटे ने अपनी कमीज़ उतार कर मुझे पहनाने में
मदद दी!
"इस
ओर माँ !" उसने कांपती आवाज़ में कहा ! उन्हें भी पुलिस वालों की बदतमीजी
से थोडा बहुत गुजरना पड़ा था और उनमें से शायद ही कभी किसी ने ढीली-ढाली,
बेतरतीब ढंग से पहले ऐसी पगड़ी पहनी हो ! इस पर हम बाद में चर्चा करेंगे !
मुझे बहुत बुरी शारीरिक यातनाएं दी गईं थीं !
बाद में हमने इस सारी घटना पर विचार किया! मणि ( मेरे पति) ने मेरी आँखों में देखा! "उस एक क्षण के लिए मैंने सोचा था कि तुम बिखर (टूट) जाओगी !"
"मैंने उस की आँखों में ऑंखें डाल कर पूछा ! क्या सचमुच मैं टूट गयी थी !"
"मैंने आप मैं बदलाव महसूस किया था! अचानक जैसे तुम कोई और हो गईं थीं ! क्या हुआ था?"
.मैंने उसे सब बता दिया ! वह हमारे बेटे
की ओर मुड़ा ! (बिना शक यह सब १९८४ जून महीने में हुआ था इसलिए सब
सांकेतिक है केवल इसके सिवाय कि यह सब मुझे आज भी पूर्णत:याद है)!
"तुम्हारी
माता एक आश्चर्यजनक महिला हैं! तुम्हें उसके जैसी कोई और नहीं मिल सकती !
पर मैं आशा करता हूँ कि जब तुम्हारी शादी होगी तुम भी अपनी पत्नी को ऐसा ही
प्यार दोगे और सम्मान करोगे जैसा मैं करता हूँ !"
क्या कोई पत्नी, किसी पति द्वारा दर्शाए गए ऐसे प्यारे शब्दों को भूल सकती है?
संदीप ने मेरी ओर देखा और धीमी आवाज़ में कहा, "माँ तुम सौभाग्य-शालिनी हो जो वे ऐसे समय रुक गए जब उन्हें रुकना चाहिए था !"
"हम दोनों एकमत होकर बोले, "भाग्य का इससे कुछ भी लेना देना नहीं था !"
मैं
यहाँ इस दुखद कहानी का अंत करती हूँ, इन शब्दों के साथ कि यह मेरी ताकत न
थी और न मेरा साहस जिसने मुझे इतनी शक्ति दी, यह मेरे पिता गुरु गोबिंद
सिंह जी द्वारा प्रदत्त उपहार था मेरे लिए !"
मैं केवल एक ही श्रेय ले सकती हूँ कि मैंने भीर (कष्ट) पड़ने पर मदद के लिए पुकार की, जब इस मदद की मुझे अत्यंत आवश्यकता थी !
उस दिन हम अपने पारिवारिक घर पर न जा
सके परन्तु कुछ भले लोगों ने हमें उस दिन पुलिस स्टेशन के बाहर खड़े देखा
तो वे हमें अपने घर ले गए !
यद्यपि शहर के कुछ भागों में पानी की
सप्लाई रोक दी गई थी परन्तु हमारे आतिथ्य करने वालों के घर पानी आ रहा था !
मैं अपने को घृणित रूप से बेहद गंदा महसूस कर रही थी! एक अच्छे स्नान के
लिए ईश्वर का धन्यवाद! मेरे पति मणि ने मुझे स्वच्छ होने में मेरी मदद की!
मुझे नहलाया, मेरे केश फिर से संवारे जो कि पुलिस वालों ने मेरी केश-सज्जा
खत्म कर दी थी, फिर से सुंदर दिखने लगे! वह विश्वास नहीं कर सकता था कि मैं
अपने पैरों से रिसते जख्मों के बावजूद अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हूँ!
फिर भी इसके बाद भी जब मैं अपने जख्मों का इलाज करवा रही थी, मुझे कभी कोई
दर्द न हुआ, कुछ खरोंचें रह गईं थीं, मेरी सुनने की क्षमता को थोडा धक्का
लगा था, कमजोर हो गई थी, लेकिन यह कुछ खास नहीं!
मणि जो कि स्वयं एक फिजीशियन (डाक्टर) हैं, ने मेरी पूर्ण जांच की लेकिन मेरी पिटाई के बावजूद जो मैंने सही, कोई बड़े जख्म न थे!
हमारे आतिथ्यकर्ता जो हिन्दू थे, हमें
पहनने के लिए स्वच्छ कपड़े दिए, सचमुच बेहतरीन लज़ीज़ खाना भी, आरामदायक
बिस्तर और एक अहसास कि अमृतसर में भी भले लोग रहते हैं! हमने अपने पुराने
वस्त्र जला दिए, केवल अपने पास मैंने अपने बेटे संदीप द्वारा दी गई वह
कमीज़ याददाश्त के लिए रख ली! हमारे अमृतसर के पारिवारिक घर में यह आज भी
सहेज कर रखी हुई है!
मेरे पास उस समय के अमृतसर के बारे में
लिखने के लिए और भी बहुत कुछ है, वह गंध, गर्मी, कीड़े मकौड़े और पवित्र
सरोवर जो लाशों से पटा और खून से रंगा हुआ था लेकिन उस सब के बारे में नेट
पर बहुत कुछ लिखा मिल जाएगा! मैं केवल अपना व्यक्तिगत अनुभव ही लिख रही
हूँ! .
October 31, 2011
आगे देखिए पत्रकार सुहास मुंशी द्वारा लिखित जुल्मों का सच…
Suhas Munshi New Delhi, November 1, 2011 | UPDATED 14:53 IST
सिख
दंगा जोसेफ मल्लियाकान एवं राहुल बेदी द्वारा रहस्योद-घाटन कि उन्होंने
जान से मारने के लिए अपने नाश्तों के दौरान भी समय निकला !
उच्च श्रेणी के पत्रकार राहुल बेदी एवं जोसेफ मल्लियाकान १९८४ की दहशत में आज भी !
उन
७२ घंटों की दहशत जब उत्तेजित भीड़ द्वारा १९८४ में हजारों सिखों का कत्ल
कर दिया गया ! पुलिस निर्मूक रही जब उत्तेजित भीड़ ने हजारों सिखों का
निर्ममता से कत्ल कर डाला, इस कत्लेंआम की पीड़ा से सीनियर पत्रकार जोसेफ
मल्लियाकान एवं राहुल बेदी भी अछूते न रहे जिन्होंने इस घटना को अपने
शब्दों में लिखा !
"To visualise that time close your eyes and
imagine that there's no state. The police remain
inert while rabid mobs attack you minute after
minute with military precision. The
administrators look the other way with complete
indifference and the situation seems never to
abate," Bedi, who covered the massacre in Trilokpuri's Block-32, says.
imagine that there's no state. The police remain
inert while rabid mobs attack you minute after
minute with military precision. The
administrators look the other way with complete
indifference and the situation seems never to
abate," Bedi, who covered the massacre in Trilokpuri's Block-32, says.
उस
दुखद घटना को मूर्त-रूप से देखने के लिए अपनी आँखों को बंद कीजिए और
कल्पना कीजिए कि कोई राज्य नहीं है, कोई शासन नहीं है ! पुलिस निर्मूक रहती
है जबकि प्रति मिनट
एक हत्या हो रही है और पागल भीड़ ढूँढ ढूंढ कर सिखों का बेरहमी से कत्ल कर
रही है ! प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी से पूर्णत : ऑंखें फेर ली हैं, ऐसा
लगता है कि यह कभी नहीं रुकेगा ! बेदी - जिन्होंने त्रिलोकपुरी ब्लोक-३२ के
सिखों के कत्लेआम पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है !
पूर्वी
दिल्ली की इस छोटी सी कालोनी में इस हत्या कांड को अंजाम देने के लिए पहले
से ही पूर्ण तैयारियां कर ली गईं थीं ! उन्होंने जानकारी ली तो पाया कि
करीबन ३२० सिखों को मर्दों, औरतों व बच्चों को केवल दो दिनों में ही कत्ल
कर दिया गया था !
पहली नवंबर को (इंदिरा गाँधी की हत्या के एक दिन बाद) घटना स्थल पर पहुंचने पर मल्लियाकान एवं राहुल बेदी खदेड़ दिए गए थे ! परन्तु पत्रकारों ने ठान लिया था अत: अगले दिन सुबह वे फिर वहां दुबारा जा पहुंचे ! जहाँ इन्होने देखा, "सिख निर्दयता पूर्वक कत्ल कर दिए गये थे, पुलिस तो वहां थी लेकिन सब कुझ होते हुए देख कर भी, किसी ने भी इतनी जहमत नहीं उठाई कि सहायता के लिए और पुलिस बल बुलवाते?
यह
नर संहार घरों व सडक के किनारे वाले संकरे रास्ते पर दो दिनों तक जारी रहा
! कातिल इतने भरोसे से अपना काम कर रहे थे “जैसे उन्हें अपने कत्ल करने के
काम में कोई जल्दी न हो ! वे अपने खाने के समय के दौरान भी बलात्कार करने
के लिए, कत्ले आम के लिए तथा अत्याचार करने के लिए समय निकाल रहे थे !”
बेदी ने बताया !
मल्लियाकान जो अब JEM पत्रिका में संपादक हैं, बताते हैं कि जब उन्हें उन चार दिनों तक होने वाले नर संहार की याद आती है तो वे शोक में डूब जाते हैं !
वे
बताते हैं कि उन्होंने देखा कि भीड़ ने एक सिख युवक को जो अपनी पत्नी के
साथ अपने घर में था, उसे पकड़ कर बाहर खींच लिया, उस पर मिटटी का तेल
(केरोसिन) डाल कर आग लगा दी, इस घटना को वे जिंदगी भर नहीं भूल सकते ! इसे भूलने का तो सवाल ही नहीं उठता !
वे उन दिनों को याद करते हैं जब पुलिस और फौज इस इलाके में दाखिल हुई थी और दंगों के शिकार बचे हुए लोगों को बाहर निकला था ! यह पहला दिन था जब पत्रकारों को दंगा ग्रस्त इलाकों में जाने दिया गया था ! मैंने पहली बार एक इंसानी हड्डी के टुकड़े को देखा कि वह कैसी होती है ! मल्लियाकान शोक में डूब जाते हैं और एक लम्बा सांस लेते हैं! मैंने पहले एक बच्चे को संभाला जो श्वेत पड़ चुका था और जिसने पिछले ३० घंटों से कुछ नहीं खाया था ! जब इलाके का ACP मेरे सामने आया तो मैं क्रोध से काँप रहा था, मैंने उसे कहा कि, "उसको स्वयं को गोली मार लेनी चाहिए यदि उसकी नजरों में अपनी वर्दी की कोई भी इज्ज़त बाकी हो !" वे बताते हैं !
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<http://indiatoday.intoday.in/story/1984-sikh-riot-senior-journalists-rahul-bedi-joseph-malliakan/1/158167.html>http://indiatoday.intoday.in/story/1984-sikh-riot-senior-journalists-rahul-bedi-joseph-malliakan/1/158167.html
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*संगत
जी यह सब निम्नलिखित कारणों से दिल्ली में हुआ ! इस के बाद सरकार संपूर्ण
पंजाब में सिखों और दमदमी टकसाल के विरुद्ध हो गई ! नतीजा----१९८४ का सिख
कत्ले आम ....*?
दिल्ली के रामलीला ग्राउंड में ७ दिसंबर १९७५ को सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर जी का शहीदी दिवस मनाया जा
रहा था, इतने में करीबन दो लाख से अधिक लोगों का हजूम रामलीला ग्राउंड की
और बढ़ा! प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी भी स्वयं स्टेज पर आईं जहाँ कि श्री
गुरु ग्रन्थ साहिब जी भी सुशोभित थे, जो लोग स्टेज पर उपस्थित थे, वे सब
इंदिरा जी के आगमन पर उनका स्वागत करने के लिए उठ खड़े हुए लेकिन बाबा
करतार सिंह जी (मुखी दमदमी टकसाल) नहीं उठे और गुरु ग्रन्थ साहिब जी के
सम्मुख आदर देते हुए बैठे रहे ! फिर बाबा जी ने धीर गंभीर आवाज में जनता को
संबोधित करते हुए इस सिख विरोधी एवं गुरु साहिब के प्रति अनादर प्रकट किए
जाने की निंदा की (गुरु ग्रन्थ साहिब जी सिख धर्म के गुरु हैं अत: उनकी
हाजरी में किसी भी व्यक्ति विशेष को उठ कर आदर नहीं दिया जाता) ! बहुत से
उपस्थित लीडरों ने इंदिरा की प्रशंसा की और कहा कि इंदिरा जी ने पंजाब के
साथ बहुत अच्छे संबंध बना रखे हैं, आदि आदि ! इसके उपरांत इंदिरा ने अपने
भाषण में कहा कि, 'दिल्ली ने ही तेग बहादुर जी को शहीद किया था और आज यही
दिल्ली उनके सम्मान में दंडवत है ! वही दिल्ली सरकार जो सिखों के विरुद्ध
शिकायतें भेजती थी, आज वही दिल्ली सरकार तेग बहादुर जी को श्रद्धांजली और
सत्कार दे रही है !'
बाबा करतार सिंह जी द्वारा जनता को
संबोधित करने का समय अब इंदिरा गाँधी के बाद ही था ! उन्होंने कहा कि,
'पहले राजपूत राजा मुस्लिम शासकों को अपनी कन्याएं भेंट करने में
गौर्वान्तित महसूस करते थे ! आज सिख स्वयं को अपमानित महसूस करेंगे यदि वे
ऐसा करते हैं तो? इसलिए अपमानित होने से बचने के लिए प्रत्येक सिख को अपनी
बेटी की शादी किसी मोने या पतित व्यक्ति से नहीं करनी चाहिए ! सिख
रहतनामा Sikh Code of Conduct कहता है कि, * कन्या देवे सिख को लेवे नहीं किछु दाम ! सोई मेरा सिख है पहुंचे गुरु के धाम !
एक सिख जो अपनी कन्या की शादी किसी सिख से करता है और इसके बदले में किसी
किस्म का लेन-देन नहीं करता तो वह एक सच्चा सिख है और अपनी जीवन लीला की
समाप्ति पर वह मेरे धाम सचखंड ही आएगा ! (भाई साहिब सिंह रहतनामा पन्ना
१६०)
�*First Rajput Kings used to give their daughters to get rewards. Today
Sikhs are disgracing themselves if they do the same. For this reason no Sikh
is to marry their daughter to a Mona or a patit and the rehatnama says:*
ਕੰਨਿਆ ਦੇਵੈ ਸਿਖ ਕੋ ਲੇਵੈ ਨਹਿ ਕਿਛੁ ਦਾਮ । ਸੋਈ ਮੇਰਾ ਸਿਖ ਹੈ ਪਹੁਚੇ ਗੁਰ ਕੇ ਧਾਮ ।
A Sikh that marries his daughter to a Sikh and does not take any
money/dowry, he is a true Sikh of mine and will reach my abode in Sachkand.
(Bhai Sahib Singh Rehatnama, p.160)
Sikhs are disgracing themselves if they do the same. For this reason no Sikh
is to marry their daughter to a Mona or a patit and the rehatnama says:*
ਕੰਨਿਆ ਦੇਵੈ ਸਿਖ ਕੋ ਲੇਵੈ ਨਹਿ ਕਿਛੁ ਦਾਮ । ਸੋਈ ਮੇਰਾ ਸਿਖ ਹੈ ਪਹੁਚੇ ਗੁਰ ਕੇ ਧਾਮ ।
A Sikh that marries his daughter to a Sikh and does not take any
money/dowry, he is a true Sikh of mine and will reach my abode in Sachkand.
(Bhai Sahib Singh Rehatnama, p.160)
दूसरी महत्वपूर्ण बात जो बाबा करतार सिंह जी ने कही कि, 'हम
इंदिरा गाँधी से पूछना चाहते हैं कि दिल्ली सरकार का कनून किसने बनाया !
यदि आप यहाँ गुरु तेग बहादुर जी को श्रद्धा सुमन अर्पित करने आई हैं तो
आपने कोई महान कार्य (अहसान) नहीं किया ! यदि गुरु जी ने अपनी शहादत न दी
होती तो इस तख्त का मालिक एक मुस्लिम होता और चारों ओर से सलाम-वालेकुम की ध्वनियाँ ही सुनाई देतीं ! आप भी यहाँ बुरका पहन कर ही आतीं!*
जितने
रोम (शरीर के बाल) इंदिरा जी के शरीर पर हैं, यदि उतनी बार ये अपना सर
कटवा कर गुरु को अर्पित कर दें तो भी गुरु तेग बहादुर जी के उपकारों से से
उऋण नहीं हो सकतीं ! चाहे प्रधान मंत्री होने के नाते वे कितनी भी
शक्तिशाली क्यों न हों? उम्हें गुरु ग्रन्थ साहिब जी, जो कि दस गुरुओं की
ज्योति स्वरूप हैं - को सम्मान देना चाहिए ! गुरु ग्रन्थ साहिब जी की हाजरी
में कोई आवश्यकता नहीं कि हम उठें और इंदिरा जी को सम्मानित करें ! इतना
सुनते ही चारों और से सिख जयकारों से आसमान गूँज उठा!
बाबा करतार सिंह जी द्वारा इन सत्य
वचनों को बोल देने के कारण ही इंदिरा गाँधी की दमदमी टकसाल से टकराव शुरू
हो गया था ! यदि कोई भी गुरु ग्रन्थ साहिब जी की बे-अदबी करता था तो बाबा
जी इसे बर्दाश्त नहीं कर पाते थे ! यही कारण भी थे जो उन्होंने ने नकली
निरंकारियों के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाई थी जो कि सरकार द्वारा सिखों के
१९८४ के नर संहार तक जा पहुंची !
बाबा करतार सिंह जी८ वर्षों तक दमदमी
टकसाल के मुखी रहे और इन वर्षों में उन्होंने सिख धर्म का काफी प्रचार किया
! ३ अगस्त १९७७ को वे मलीहा (जालन्धर) से सोलन जा रहे थे कि रास्ते में
हुसैनपुर में उनकी कार एक पेड़ से जा टकराई, गंभीर घायल अवस्था में उन्हें
लुधियाना के CMC हस्पताल
में ले जाया गया जहाँ १६ अगस्त १९७७ को वे सदा के लिए सच खंड गुरु चरणों
में प्रस्थान कर गए ! उनका अंतिम संस्कार २१ अगस्त १९७७ को मेहता (बटाला)
के गुरुद्वारा गुरदर्शन प्रकाश में किया गया !
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Another episode of 1984—tale of horror…..१९८४ का एक और दुखांत--डरावनी सत्य कथा
Another episode of 1984—tale of horror…..१९८४ का एक और दुखांत--डरावनी सत्य कथा
क्या ये दंगे थे, या एक नस्ल का कत्लेआम ?
लेखिका : अर्तिका बख्शी
शशी थरूर- अनेक लफ्जों का धनी-- सभी अर्थों से परिपूर्ण शब्द, जो कि जब प्रयोग किये जाते हैं---अपना महत्व रखते हैं !
मैंने उन्हें संयुक्त राष्ट्र संघ में बोलते सुना है और तब भी जब वे भारतीय राजनीति में आए ! मैं उनसे अत्यधिक प्रभावित हुई! एक आदमी तो था जो जिस में गुण था किसी सत्य को वास्तविक रूप से प्रस्तुत करने का !
उसके द्वारा लिखित पुस्तक, 'The Riots' से मेरी उनसे बातचीत के कुछ अंश यहाँ प्रस्तुत हैं !
इन सब वर्णित घटनाओं में से मुझे केवल एक चरित्र ने सबसे अधिक प्रभावित किया---गुरिंदर सिंह जो एक आई पी एस अधिकारी हैं तथा सैंट स्टीफन कालेज के भूतपूर्व छात्र हैं !अपनी ओज पूर्ण, छल्लेदार भाषा, मजाकिया लहजा और इस सब के बीच अपने गिलास से शराब के घूँट लगाते रहना- एक आदर्श नायक की भांति प्रतीत होते हैं !
गुरविंदर
१९८४ के सिख कत्लेआम की उन न भूलने वाली यादों में खो जाते हैं जिनके
ज़ख्म उनके और सभी सिखों के दिल के कहीं भीतर छिपे हैं ! मेरा मानना है कि
प्रत्येक भारतीय जिसने कभी भी धार्मिक सौहार्द और एकता का स्वप्न देखा
होगा, इस भावना को भली-भांति समझ सकेगा !
मेरे लिए तो १९८४ की यादें भूली बिसरी हैं लेकिन गुरविंदर के शब्द मेरे हृदय को भीतर तक झंझोड़ डालते हैं ! हम शीघ्र ही पंजाब में शुरू हुई.... पर एक द्रष्टिपात करते हैं जिसमें पंजाब सरकार द्वारा सिखों के मानवीय अधिकारों का दमन किया गया था, श्री दरबार साहिब पर इंदिरा द्वारा फौजी हमला किया गया और इसकी पवित्रता भंग की गई थी जिस की कोई जरूरत न थी ! इसकी कीमत भी उसे अपने ही सुरक्षा कर्मियों द्वारा अपनी जान चुका कर देनी पड़ी थी !
इस सब के बाद जो हुआ वह था भारत के पूर्वी छोर से पश्चिमी छोर तथा उत्तर से दक्षिण तक निर्दोष सिखों का कत्लेआम , एक बदनुमा काला अमिट दाग जो भारत के भाल पर लगा इसके अपने नागरिकों के कत्ल का ! गुरविंद्र सिंह के अनुभव द्वारा, शशी थरूर ने सिखों द्वारा मानवता की असीम सेवा को जन सामान्य तक पहुँचाने का एक प्रयत्न किया है !
इस
कत्लेआम में जब गुरविंदर सिंह का १० वर्षीय भतीजा और उनके बहनोई की बेरहम
भीड़ द्वारा नृशंस हत्या कर दी गई तो उन्होंने फैसला लिया कि वे पुलिस के
उच्च पदाधिकारी की नौकरी से त्यागपत्र दे देंगे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं
किया !
उनके बूढ़े पिता ने उन्हें रोका और समझाया कि काननों की रक्षा करने वाली संस्था में अफसर रहते हुए ही वे ऐसे अपराधों को दुबारा होने से रोकने में जनता की सहायता कर सकते हैं, इस संस्था (पुलिस) से दूर रहकर नहीं! इस तरह उन्होंने ने सिख धर्म के महान नियम 'सरबत दा भला' पर चलने का निर्णय लिया जबकि प्राकृतिक रूप से उनके लिए यह असंभव था !
इसके अतिरिक्त इस पुस्तक में १९८४ के सिखों के कत्लेआम पर शायद ही कुछ और लिखा हो! !
न्यायाधीश आर एस नरुला (मुख्य न्यायाधीश, पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट) द्वारा १९८४ के वे ज्वलंत प्रश्न जिनके उत्तर नहीं दिए गए!
उनका यह लेख 'सिख रिव्यू ' पत्रिका सितंबर २००० से साभार लिया गया है!
दिल्ली सरकार द्वारा एक नोटिफिकेशन
जारी कर मई २००० में जस्टिस नानावती को १९८४ के सिख कत्लेआम की जांच करने
के लिए नियुक्त किया गया! इस कमीशन के लिए इन नृशंस हत्याओं पर कुछ ज्वलंत प्रश्न !
एक बार मैंने १९८४ के सिख कत्लेआम पर
एक लेख लिखने की सोची थी! परन्तु मैंने समय होते हुए भी, इस पर लेख लिखने
से परहेज़ किया क्योंकि इस लेख द्वारा इन गुनहगारों को कानून से बचने का
रास्ता मिल जाता और वे इससे संबंधित सभी सबूत नष्ट कर देते, इसलिए मैंने
लेख नहीं लिखा!
फिर भी इस कमीशन के लिए कुछ ज्वलंत प्रश्न ---वास्तव में सरकार के लिए---जिनका जवाब अवश्य चाहिए!
१८)- परिस्थिति को तुरंत ही गंभीरता
से क्यों नहीं लिया गया जबकि पहली नवंबर को शाम साढ़े छ: बजे से ही लाशों
के सडकों पर पड़े होने के समाचार पुलिस को वायरलेस से प्राप्त हो रहे थे,
पुलिस रिकार्ड में इन लाशों की पहचान सिख लिख कर क्यों नहीं की गई?
१९)-
क्या पुलिस के उच्च पदस्थ अधिकारी एवं प्रशासनिक अधिकारीयों, गृह मंत्री
नरसिम्हा राव को सांप सूंघ गया था जब की कल्याणपुरी और त्रिलोकपुरी (पूर्वी
दिल्ली) की खबरें आ रही थीं (अ) शाम ५.३१ पर बर्बरता पूर्वक की जा रही
हत्याओं और लूट पाट की खबरें बढ़ चढ़ कर प्राप्त हो रही थीं, और फिर, (ब)
डी सी पी आर के शर्मा को उसके वायरलेस पर सूचना प्राप्त हुई कि लगभग २००
व्यक्तियों को केवल त्रिलोक पूरी क्षेत्र में ही कत्ल कर दिया गया था?
२०)-
क्या किसी सूचना को गंभीरता पूर्वक न लेकर उस पर कार्रवाई न करना कहीं
प्रधान मंत्री के उस बयान की निर्देशिता को प्रमाणित नहीं करता कि यह सब तो
एक बड़े पेड़ के गिरने का नतीजा है !
३६)- ऐसा
कैसे संभव हुआ कि हजारों लोग दिल्ली के बाहरी भागों और हरियाणा से एकत्रित
होकर आये और सब के हाथों में एक ही साइज़ और बनावट की लोहे की छड़ों से
थीं! क्यों नहीं हत्याएं बंद होने और शांति स्थापित होने पर इनसे उन छड़ों
को जब्त नहीं किया गया ?
३१
अक्टूबर को किसी भी सिख की कहीं पर कोई हत्या नहीं हुई, किसी का घर नहीं
लूटा गया! यदि हम अगली सुबह के समाचार पृष्ठों पर नजर डालें तो किसी अप्रिय
घटना की कोई खबर नहीं मिलती---हां हिंदुस्तान टाइम्स के मुख पृष्ठ पर एक
साइड के कालम में दिल्ली के बाहरी इलाके और गाज़ियाबाद के कुछ क्षत्रों
में थोड़े तनाव की और मार पीट की घटना अवश्य देखने में आई थी ! क्या कारण
था कि जो भारतीय जनता इंदिरा के मरने के बाद सहनशील रही, सुबह ०९.२० से रात
तक कहीं कोई अप्रिय घटना नही घटती लेकिन एक रात में ही परिदृश्य बदल जाता
है और यही हिन्दू जनता अपने ही भाई, सिखों के खून की प्यासी क्यों हो उठती
है? इस पर नज़र मारनी अति आवश्यक है ! जिस दिन इंदिरा की हत्या हुई, जनता
शांत थी और भयभीत भी ! सभी भयभीत थे, चाहे हिन्दू हों या सिख या मुस्लिम
लेकिन कहीं कुछ न हुआ ! कुछ शरारती हिन्दुओ ने माहौल बिगड़ने की कोशिश
अवश्य की, (जैसा AIIMS में
देखने को मिला) लेकिन कुछ खास नहीं! हिन्दू भी किसी सिख के घर पर या उस पर
हमला करने से घबराते थे क्योंकि सिख आखिरी दम तक लड़ता और अपने परिवार की
रक्षा करता? इस कारण किसी ने भी किसी सिख परिवार पर कहीं भी हमला नहीं
किया ! हमला तभी हुआ जब इन हिन्दुओं को उनकी हिफाजत का भरोसा दिया गया,
उन्हें सिखों के विरुद्ध उकसाया गया जिस से उन्हें मानसिक रूप से तैयार
किया गया कि वे निर्दोष सिख परिवारों को निशाना बनाएं, उनके घरों को आग लगा
दें और जहाँ भी कोई सिख मिले उसे जान से मार दें! इस सबके लिए भारत सरकार
ने अपने सभी प्रचार तंत्रों का सहारा लिया जैसे दूर दर्शन, आकाशवाणी
(रेडियो) तथा समाचार पत्र आदि!
People's Union for Democratic Rights (PUDR) and people's Union for Civil Liberties (PUCL) द्वारा
गठित एक टीम ने सिख कत्लेआम जिन्हें भारत सरकार ने सिख विरोधी दंगों का
नाम दिया था, (दंगा---वह कहलाता है जिसमें समाज के दो या अधिक वर्ग आपस में
लड़ पड़ें परन्तु यहाँ तो सिर्फ सिखों का सामूहिक कत्ल
किया गया था) यह टीम दिल्ली के हर उस कोने में गई जहाँ कहीं भी निर्दोष
सिखों को कत्ल किया गया था ! इन कत्लों के पीछे छुपे राज को इन संस्थाओं ने
बड़ी शीघ्र ही पुस्तिका बनवा कर बाज़ार में उतार दी थीं, इन पुस्तिकाओं
में से प्रमुख थी, हिंदी में, "दोषी कौन" जिसे अंग्रेजी में 'Who are the Guilty' के
नाम से प्रकाशित किया गया था ! इस पुस्तिका के प्रकाशन से राजीव गाँधी,
संपूर्ण भारतीय सरकार तथा समूचा सरकारी तंत्र हिल गया था ! उस समय की
कांग्रेस की दिल्ली की अध्यक्षा ने इस पुस्तिका को ' झूठ का पुलिंदा' भी
कहा और इन संस्थाओं को धमकी भी दे डाली थी जिन्होंने ने इसे लिखा, तैयार
किया एवं प्रकाशित करवाया!
इस
टीम के सदस्यों ने बचे हुए सिख परिवारों से, उनके पड़ोसियों से सभी
जानकारियां एकत्रित कीं और उन घटनाओं को सिलसिलेवार जांच करने पर पाया कि
---इन घटनाओं के पीछे पहला मुख्य कारण था---अफवाहें! पहली अफवाह में तो
सिखों द्वारा इंदिरा गाँधी की हत्या पर मिठाई बाँटने की थी जो निराधार पाई
गई, उन्हें कोई आँखों देखा गवाह न मिला, दूसरा ----ये अफवाहें स्वयं दिल्ली
पुलिस द्वारा भी फैलाई गईं थीं जैसे पुलिस की गाड़ियाँ लाउड स्पीकरों से
जनता को कालोनियों में आगाह कर रही थीं कि पानी मत पियें, उसमें सिखों ने ज़हर मिला दिया है तथा कि पुरानी
दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पंजाब से हिन्दुओं को कत्ल करके ट्रेन भर कर लाशें
भेज दी गई हैं ! इन सभी अफवाहों से जनता को सिखों के खिलाफ भडकाया गया !
दूसरा दौर शुरू
हुआ....हथियारों से सुसज्जित नौजवान हिन्दुओं का ...जो टेम्पो, वैन, बसों
और ट्रकों में भर कर आये ! उनका दिल्ली आना ३१ अक्टूबर की मध्य रात्रि में
ही शुरू हो गया था और अगली सुबह वे दक्षिण दिल्ली से लेकर उत्तरी दिल्ली,
पश्चिमी दिल्ली से लेकर पूर्वी दिल्ली और मध्य दिल्ली के हर भाग में पहुँच
चुके थे ! जैसे उन्हें दक्षिण दिल्ली के मुनीरका, साकेत, साउथ एक्सटेंशन,
लाजपत नगर, भोगल, जंगपुरा और आश्रम क्षेत्र में देखा गया था ! इसके साथ ही
दक्षिणी-पूर्वी दिल्ली के कनाट प्लेस के बाज़ारों और फिर जमना पार की
कालोनियों में तथा उत्तरी दिल्ली के क्षेत्रों में भी देखा गया ! उनके
हाथों में पेट्रोल से भरे पीपे (केन) थे और कालोनियों में जाकर वे सिखों के
घरों को, दुकानों को तथा गुरुद्वारों में आग लगा रहे थे ! हमें इन
क्षेत्रों के निवासियों ने बताया कि इनका नेतृत्व जाने माने कांग्रेसी नेता
तथा कांग्रेस के कार्यकर्ता ही कर रहे थे जो सिखों के घरों और दुकानों की
पहचान कर भीड़ को बता रहे थे ! दिल्ली पुलिस के एक उच्च पदाधिकारी ने अपना
नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि, ' दुकानों के साइन बोर्ड तो हिंदी या
अंग्रेजी में लिखे होते हैं जिनसे इन आग लगाने वाले अशिक्षित गुंडों को
कैसे पता लग सकता था कि किस दुकान का मालिक सिख है या हिन्दू, जब तक कि
उसकी सही पहचान किसी पढ़े लिखे
व्यक्ति या स्थानीय निवासी द्वारा न बताई जाये? कुछ क्षेत्रों जैसे
त्रिलोकपुरी, मंगोलपुरी एवं जमनापार की कालोनियों में नजदीकी ग्रामों से
गुर्जर तथा जाट किसानों तथा स्थानीय निवासियों, जिनमें से अधिकांश कांग्रेस
पार्टी के कार्यकर्ता थे ! हमें बताया गया कि भंगी जाति के लोगों ने लूटने
के कार्य को अंजाम दिया ! दक्षिण दिल्ली में दिल्ली ट्रांसपोर्ट कापोरेशन
की बसें इन कातिल दरिंदों को कत्ल करवाने की यात्रा पर एक स्थान से दूसरे
स्थान को ले जा रही थीं ! DTC कैसे अपनी बसों को इन गुंडों को ढोने की इजाजत दे सकती थी?
इन
कातिल दस्तों ने कत्ल करने के लिए एक विशेष प्रोग्राम तय किया हुआ था !
१९७१ की जन गणना के अनुसार दिल्ली में २० से २५ वर्ष के सिख युवकों की
संख्या लगभग १,००,००० थी ! इस कत्लेआम में मारे जाने वाले अधिकांश सिखों
की उम्र भी इसी उम्र की ही थी ! हिंदुस्तान टाइम्स की ७ नवंबर और ११ नवंबर
के मुताबिक केवल ३२५ सिखों की हत्याएं हुई थीं जिसमें ४६ हिन्दू भी शामिल
थे ! यह मारे गए लोगों के प्रति एक मजाक था ! उस समय के आंकड़ों से जो
झुग्गी झोपडी कालोनी तथा अन्य स्त्रोतों से एकत्रित किए गए थे, उनके अनुसार
मरने वालों की संख्या १००० से ऊपर थी. बाद में आधिकारिक रूप से यह सरकारी
संख्या २७३३ निकली जबकि गैर सरकारी सूत्रों के अनुसार केवल दिल्ली में ही
१०००० से अधिक सिखों का क़त्ल कर दिया गया था !
त्रिलोकपुरी
और मंगोलपुरी के इलाकों में जहाँ सब से ज्यादा हत्याएं होने के समाचार
मिले हैं, में भी सिखों के घरों, दुकानों तथा गुरुद्वारों को आग लगाने के
लिए भी यही तरीका प्रयोग में लाया गया ! शिकार ज्यादातर नौजवान सिखों को ही
बनाया गया ! उन्हें घरों से बाहर घसीटा गया, मारा-पीटा गया और तब जिन्दा
जला दिया गया ! जबकि बूढ़े व्यक्तियों को, औरतों तथा बच्चों को साधारणत: बच
कर निकल जाने दिया गया, उनके घरों से कीमती सामान , गहने, नकदी आदि को
लूटने के बाद आग लगा दी गई ! उनके घरों की मिल्कियत (रजिस्ट्री) के
कागजातों को भी जला दिया गया ! मंगोलपुरी में तो हमें यह भी बताया गया कि
बच्चों को भी नहीं बख्शा गया ! हमें सिख औरतों के साथ सामूहिक बलात्कार के
समाचार भी प्राप्त हुए ! सिखों की सम्पत्ति को नष्ट करने का सिलसिलेवार
जघन्य कार्य उनके घरों, दुकानों, फैक्ट्रियों से लेकर गुरुद्वारों और सिख
स्कूलों तक को निशाना बनाया गया ! हर प्रभावित क्षेत्रों में, सिखों को
सडकों पर जिन्दा जलाने का एक निश्चित पैमाना स्थापित किया गया था ! इंदिरा
की हत्या के पांच दिनों बाद भी मंगोलपुरी में कांग्रेस के दफ्तर के बाहर
हमें इंसानों के जलने के निशान दिखाई दिए, स्थानीय निवासी हमें पहले ही सूचित कर चुके थे कि यहाँ चार सिखों की जला कर हत्या कर दी गई थी जबकि फुटपाथों की सफाई की जा चुकी थी !
एक
महत्वपूर्ण तथ्य; सब से अधिक प्रभावित क्षेत्रों जैसे त्रिलोकपुरी,
मंगोलपुरी एवं सुल्तानपुरी में भीड़ को स्थानीय कांग्रेसी नेताओं द्वारा
निर्देशित किया गया था !ये क्षेत्र विशेषत; कांग्रेस द्वारा शहरी विकास
हेतु बनाये गए थे और तब से ये कांग्रेस के गढ़ हैं क्योंकि किसी भी रैली के
लिए कांग्रेस को भीड़ इन्हीं क्षेत्रों से मिलती है! एक माननीय राजनीतिज्ञ
नेता ने इन क्षेत्रों के बारे में अपनी राय देते हुए कहा था कि, 'ये
क्षेत्र तो कांग्रेस की रखैल है !
दिल्ली
के चारों और फैले हुए ग्रामों से गुर्जर और जाट समुदाय ने सिखों को लूटने,
कत्ल करने आदि में अपनी अहम भूमिका निभाई थी ! इन्होने सिख विरोधी दंगों
को भडकाया, हवा दी और बर्बरता पूर्वक सिख नौजवानों की हत्याएं कीं ! जस्टिस नरुला ने भी स्वयं ही लिखा कि .....आश्चर्य तो यह है कि ऐसा
कैसे संभव हुआ कि हजारों लोग दिल्ली के बाहरी भागों और हरियाणा से एकत्रित
होकर आये और सब के हाथों में एक ही साइज़ और बनावट की लोहे की छड़ें थीं!
उन्हें ये छड़ें कहाँ से प्राप्त हुईं? किसने उन्हें हजारों की संख्या में
इन लुटेरे और निर्दयी लोगों को बांटा? क्या कारण थे कि हत्याएं बंद होने
और शांति स्थापित होने पर भी इन दरिंदो से उन छड़ों को जब्त नहीं किया गया
? इन
गुर्जर और जाट समुदाय में से अधिकांश पश्चिमी और दक्षिणी दिल्ली में अपना
वर्चस्व कायम किए हुए हैं, बहुतायत में हैं ! कभी इनकी जमीने बेर सराय,
मुनीरका तथा मुहम्मदपुर में थीं! दिल्ली के चतुर्मुखी विकास में इनकी जमीने
सरकार द्वारा ले ली गई थीं इनकी बंजर जमीनों, (जो किसी काम की न थीं) ने
भी इन्हें अच्छे पैसे दिलवा दिए थे !वे अब कृषि पर निर्भर न होकर अन्य
उद्योगों पर निर्भर हो गये थे, पैसे की अधिकता ने उनमें से अधिकांश को
स्थानीय राजनीति की ओर भी आकर्षित किया था! यह एक सर्व विदित तथ्य है कि इन
इलाकों में चुनावों में गुर्ज़र और जाट समुदाय किसी एक पक्ष की ओर ही होता
है! पुलिस को सिख विरोधी दंगों के दौरान इन क्षेत्रों से हटा लिया गया था !
इसी कारण इन क्षेत्रों में पुलिस और अपराधियों की सांठ-गाँठ देखने में
मिलती है! इन सिख विरोधी दंगों में यह सत्य भी उभर कर सामने आया है!
और -दलित वर्ग के प्रति जिन्हें शहरी
विकास के लिए विस्थापित किया गया था, उन्हें आरक्षण की सुविधा का लाभ
मिला, वे दिल्ली में बस गये और पुलिस, तथा अन्य सरकारी दफ्तरों में रोज़गार
मिला! भंगी लोग कारपोरेशन में लग गये! धानुक--जो दलित वर्ग की निम्नतम
जाति से है--- को भी समाज में स्थान मिला! इन दलित वर्ग के लोगों को जो
झुग्गी झोपडी कालोनी में रहते थे, ज्यादातर जगजीवन राम के समर्थक थे, जबकि
भंगी कांग्रेस के! संयक्त टीम को मिली जानकारी के अनुसार इन भंगियों द्वारा
ही - जो कारपोरेशन में कार्यरत थे, द्वारा ही सिखों को अधिकतर नुकसान
पहुँचाया गया!
पुलिस का कृत्य ;
३१
अक्टूबर से ४ नवंबर के सारे समय के दौरान दिल्ली पुलिस द्वारा सिखों के नर
संहार की चरम सीमा में भी अपने कर्तव्य से विमुख ही रही!(१) - वे कहीं नजर
नहीं आये, (२)- जहाँ उपस्थित भी थे, वहां भी शांति से हत्याएं होती देखते
रहे, (३)- या सिखों के प्रति खुद भी बेरहमी से पेश आये और उनकी हत्या या
लूट-पाट में शामिल रहे ! पहली नवंबर को जब टीम ने लाजपत नगर का दौरा किया,
तो टीम ने पाया कि पुलिस जान बूझ कर उस क्षत्र से अनुपस्थित थी जबकि सिखों
की दुकानों को लूटा जा रहा था, आग लगाई जा रही थी! नौजवान लुटेरे हाथों में
त्रिशूल, सरिये, तलवारें, खंजर तथा लोहे की छड़ें लेकर बाज़ारों और गलियों
में घूम रहे थे! दिखाई दी तो केवल एक जीप जो कि शांति यात्रा निकाल रहे
लोगों को आगे जाने से रोक रही थी! इन शांति प्रिय लोगों द्वारा बाद में
'नागरिक एकता मंच' को संगठित किया था! जब शांति प्रिय लोग एकत्रित होकर
लाजपत नगर के मुख्य बाज़ार की और बढ़ रहे थे तो एक पुलिस की गाड़ी में
उपस्थित एक इंस्पेक्टर ने इन्हें रोका और चेतावनी दी कि शहर में कर्फ्यू
लगा है और धारा १४४ लागू है! जब इन शांति प्रिय व्यक्तियों के हजूम के
प्रबंधकों ने उससे पूछा कि यदि धारा १४४ लागु है और कर्फ्यू लगा है तो आप
इन गुंडों को क्यों नहीं रोकते जो आग लगा रहे हैं और हत्याएं कर रहे हैं!
उसने कोई उत्तर न दिया और केवल इतना ही कहा कि वे अपने जोखिम पर लाजपत नगर
मुख्य बाज़ार तक जा सकते हैं! बाज़ार में पहुंच कर इन लोगों ने उन गुंडों
को समझाने की कोशिश की कि इंदिरा की हत्या में इन सभी सिखों का कोई हाथ
नहीं है और इन्हें कोई नुकसान नही पहुंचाया जाना चाहिए! जब ये लोग इनकी बात
सुन रहे थे तो भीड़ में से कुछ लोगों ने माइक छीनने की कोशिश की और
'इंदिरा गाँधी जिंदाबाद' और 'हिंदी हिंदी भाई भाई' के नारे लगाये! जहाँ
जहाँ भी इस टीम के सदस्य गये, उन्होंने इन गुंडों के चेहरों पर शोक की कोई
छवि नहीं देखी, वे शोकग्रस्त न थे! उनके चेहरे खिले हुए थे जैसे कि उन्हें
लूटने के त्यौहार में शामिल होने का न्योता मिला था!
पिछले
कुछ दिनों से मैं इंग्लैंड की एक संस्था 'सेवा ८४' के साथ १९८४ के इन
पीड़ित परिवारों से काफी मिला हूँ और दिल्ली के तिलक विहार, मंगोलपुरी,
रोहणी, जहांगीरपुरी अदि के इलाकों में घूमा और मैंने एक बात स्पष्ट रूप से
देखी कि ये सभी परिवार राजस्थान के गांवों से संबंधित थे और दिल्ली में
रहकर बेचारे रोजाना कमाने और खाने वाले दिहाड़ीदार गरीब परिवारों से थे
जिनकी न तो कोई राजनीतिक पहुँच थी और न ही वे धनवान लोग थे! लगभग ये सभी जो
दिल्ली के बाहरी और अविकसित कालोनियों में बस गए थे, तो केवल सस्ती जमीन
के कारण! इनकी कोई पहुंच न थी और सिख समुदाय में भी ये लगभग विस्मृत ही थे
लेकिन १९८४ के इन कत्लेआम के ये मुख्य शिकार बने ! इनमें से भी अधिकांश
बेचारे युवा ही थे जो घर से बाहर काम काज और रोज़ी की तलाश में बाहर निकले
थे! मैं नहीं जानता कि सज्जन
कुमार या हरी किशन लाल भगत को इन गरीब, लाचार, बेसहारा लोगों का कत्ल करके
क्या मिला होगा? क्या सिर्फ अपने मालिक (उस समय देश के नव-नियुक्त प्रधान
मंत्री और इंदिरा गाँधी के बेटे) राजीव गाँधी के अहम की तुष्टि के लिए इन
गरीब लोगों का कत्ल कर दिया गया? जहांगीरपुरी, सुल्तानपुरी, कल्याणपुरी, मंगोलपुरी और त्रिलोकपुरी में सब से अधिक सिख कत्ल किए गए ! आज
भी दिल्ली की विधवा कालोनियों में अधिकांश इन्हीं क्षेत्र की ही हैं! इन
बेचारों के पास आत्म-रक्षा के लिए और न ही किसी प्रकार का प्रतिरोध करने के
लिए भी कोई शस्त्र तक नहीं था! अन्य क्षेत्रों में तो थोडा बहुत प्रतिरोध
भी हुआ लेकिन अपनी अज्ञानता, हिन्दुओं पर पूर्ण विश्वास (अंध विश्वास),
अशिक्षा, मुख्य सिख समाज से दूरी, आर्थिक कमजोरी एवं अत्यंत गरीबी का
जीवन ही इनकी हत्याओं का कारण बने!
इस के अतिरिक्त जो भी अकेला
या दुकेला सिख सडकों पर या गलियों में मिला, इन हजारों की भीड़ के आगे
बेबस हो कर इनका निशाना बना और मारा गया, चाहे वह कोई फौजी था जो छुट्टी
मनाने घर आ रहा था या छुट्टी मना कर घर से जा रहा था, किसी रेलवे स्टेशन या
किसी ट्रेन में इन वहशियों का शिकार बना वरना सच्चाई तो यह है कि पुलिस और
प्रशासन का साथ होते हुए भी इन कायरों में इतनी हिम्मत न थी कि कहीं भी
एकत्रित सिखों का सामना कर पाते ! सड़क
पर किसी ट्रक को रोक कर उसके ड्राइवर की हत्या कर देनी साधारण बात है
लेकिन किसी शस्त्रधारी सिख के सामने खड़े होकर उससे दो-दो हाथ करना एक
मूर्खता ! अत; इन वहशियों ने केवल शस्त्रविहीन और अकेले - दुकेले
व्यक्तियों को ही निशाना बनाया ! कोई बहादुरी की मिसाल कायम नही की जिस पर
ये कांग्रेसी गुंडे फख्र महसूस कर सकें!
कल्यानपुरी
के एस एच ओ (भाटी) जो कि त्रिलोकपुरी का क्षेत्र भी देखते थे, ने पुलिस
कर्मियों को ड्यूटी से हटा दिया था और खुद भी सिखों को मारने वालों का साथ
दे रहे थे ! इन्होने अपनी पुलिस की सरकारी जीपों से भी तेल निकल कर सिखों
के घरों और दुकानों को जलाने के लिए दिया था ! इन पर दो सिख युवकों की
हत्या करने का भी आरोप है परन्तु इन पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई!
पुलिस वाले घूम घूम कर अपनी जीपों से सिखों के खिलाफ अफवाहें फैला रहे थे,
लोगों को भड़का रहे थे!
पर
दिल्ली पुलिस भी तो केंद्र के गृह मन्त्रालय के अधीन थी जिसका कार्य भार
गृह मंत्री नरसिम्हा राव के जिम्मे था! तो गृह मंत्री ने क्या किया? वह भी
तो राजीव गाँधी के निर्देशों पर काम कर रहा था! यदि दिल्ली पुलिस के उच्च
अधिकारीयों ने अपना कर्तव्य पालन नही क्या था तो देश की अन्य सभी सुरक्षा
दल उसके अधीन थे, वह चाहता तो अर्ध-सैनिक बल या फौज को नागरिकों की सुरक्षा
में लगा सकता था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और अपने पद की गरिमा को भी ठेस
लगाई और अपने कर्तव्य का पालन नही किया!
इसके
द्वारा सिखों को कत्ल किया जाने में इसका सीधा हाथ भले ही न हो लेकिन उन
निर्दोषों के कत्लों को अपरोक्ष रूप से समर्थन देने और नागरिकों की सुरक्षा
में जान बूझ कर की गयी लापरवाही तथा देश के गृह मंत्री होते हुए इसकी
विफलता---इसे संदेह के घेरे में रखती है ! इस पर हम आगे और चर्चा करेंगे!
दिल्ली
पुलिस का तो यह हाल था कि इसके अतिरिक्त कमिश्नर गौतम कॉल ने आल इंडिया
मेडिकल इंस्टीट्युट के सामने एकत्रित विप्लववादियों के समक्ष यह माना था
कि, 'हम इस तरह के हालात का सामना नही कर सकते!' (इंडियन एक्सप्रेस १,
नवंबर 1984) आश्चर्य तो यह है कि ऐसे अकुशल अधिकारी को शीघ्र ही Additonal Commissoner, Security का ज़िम्मा भी सौंप दिया गया !
तीन
नवंबर की सुबह ८.३० बजे के लगभग विपक्ष के दो सदस्यों ने नरसिम्हा राव तथा
शिव शंकर से ट्रेनों से पंजाब से दिल्ली आने वाले सिख यात्रियों की
सुरक्षा प्रदान करने के लिए कहा जिसे दोनों के द्वारा अनसुना कर दिया गया!
कोई पुलिस या फौजी दस्ते नहीं भेजे गए और उन बेचारे निर्दोष यात्रियों को
इन निर्दयी कातिलों के रहमो-करम पर छोड़ दिया गया जो उन्हें ट्रेनों से
खींच कर बाहर निकालते थे और उनके टुकड़े करके उनके मृत शरीरों को वहीँ
रेलवे लाइनों पर या प्लेट फार्म पर ही फ़ेंक देते थे! उनमें से कई को तो
जिंदा ही आग के हवाले कर दिया गया था! अख़बारों में ४३ व्यक्तियों के मारे
जाने के समाचार प्रकाशित थे जबकि शाम को ही सरकारी टी वी चैनल दूर दर्शन
ने अपनी खबरों में इसका खंडन कर दिया था! स्टेट्समैन समाचार पत्र के
पत्रकार ने उसी दिन शाम को ३.३० बजे तुगलकाबाद स्टेशन पर जा कर देखा था कि
प्लेटफार्म पर दो सिखों के शव पड़े थे! पुलिस तथा अन्य सुरक्षा दस्ते या तो
घटना घटित होने के पश्चात पहुंचे थे या फिर मूक दर्शक बन कर हत्याएं होते
देखते रहे थे!
http://www.carnage84.com/official/kusum/ch11.htm राष्ट्रपति
ज्ञानी जैल सिंह के विचार में उन्हें दखल देने का कोई अधिकार नहीं था!
दिल्ली पुलिस के कमिश्नर सुभाष टंडन कहते हैं कि उन्हें जो कुछ हो रहा था,
उस की कोई सूचना उन्हें नही दी गई थी जबकि वे गुरुद्वारा रकाबगंज पर हमला
करने वाली भीड़ में देखे गये थे!गृह मंत्री नर सिम्हा राव मौन रहे!
लेफ्टिनेंट गवर्नर गवाई की सोच थी कि सब कुछ कंट्रोल में है और उन्होंने भी
फौज बुलाने का निर्णय नही लिया! राष्ट्रपति को उन्होंने कहा था कि.....यदि
फौज बुलाई गई तो स्थिति काबू से बाहर हो सकती है! एक मैजिस्ट्रेट भीड़ पर
बल प्रयोग (यदि आवश्यक हो तो) द्वारा काबू करने के आदेश पत्र पर हस्ताक्षर
करने से मना कर देता है जब कि उसके पडोस में ही सिखों के घर बार जलाये जा
रहे थे और उन्हें जिन्दा जलाया जा रहा था!
कांग्रेस के सीनियर राजनेता जैसे
राजपाल सरोज ३१ अक्टूबर की देर रात तक गुप्त मीटिंग करते रहे और भीड़ को
कैरोसिन तथा एक सफेद रंग का ज्वलनशील पदार्थ बाँटने की अपनी योजना को
कार्यान्वित करने को मूर्त रूप देने में व्यस्त थे! दिल्ली ट्रांसपोर्ट
कापोरेशन तथा दिल्ली पुलिस की मदद लेना भी इसमें शामिल था!
खाकी कपड़ों में भेड़ियों का समूह;
प्राप्त सबूत व्याकुल करते हैं कि
दिल्ली पुलिस ने भी सिखों के कत्लों को अनदेखा किया! एक उच्च पदस्थ पत्रकार
तुषा मित्तल २५ वर्ष पूर्व हुए इस नर संहार की कड़ियाँ जोड़ते हैं कि किस
तरह एक योजना बद्ध रूप से इसे अंजाम दिया गया!
दिल्ली पुलिस ने १९८४ के सिखों के नर
संहार पर जो रोल अदा किया उसका संपूर्ण विवरण इस प्रकार है;....... वे
देखते रहे,! उन्होंने अनियंत्रित भीड़ को सिखों के घरों पर हमला करने की
छूट देते रहे! इसमें कई पुलिस वालों ने तो स्वयं भी भाग लिया! उन्होंने
अपनी फ़ोर्स में से उन सिख पुलिस अफसरों को ड्यूटी से हटा दिया था जो इन
कातिलों के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकते थे! उन दिल्ली के सिखों से उनके
हथियार ले लिए थे जिससे वे आत्मरक्षा न कर सकते थे! न ही पुलिस ने उनकी
रक्षा की! उन्होंने ने वे वायरलेस संदेश तो प्रसारित किये जिनमें सिखों के
हाथों में किरपान थीं परन्तु ऐसा कोई संदेश न दिया जिनमें भीड़ उन्हें मार
रही थी!
बस
यही वो सब कुछ है जो दिल्ली पुलिस ने १९८४ के सिख कत्ले आम में किया? जो
कत्ल कर दिए गये, उनकी मृत देह तो थीं लेकिन उनकी गिनती को छिपाया! ७००
केसों में से ३०० को बंद कर दिया कि आरोपियों का पता नही लगाया जा सका था!
निचले अधिकारीयों को निर्देश दिए गये थे कि वे केस रजिस्टर न करें!
सैंकड़ों केसों की एक ही प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज़ की गई! पुलिस तथा अन्य
सरकारी अधिकारीयों के खिलाफ कोई एफ आई आर दर्ज़ करने से मना कर दिया गया!
और भी दुखदायी तो यह है कि सिखों के खिलाफ ही एफ आई आर दर्ज़ की गयीं!
आँखों देखी गवाहों को धमकाया गया और उन्हें मजबूर किया गया कि वे पुलिस के
पक्ष में ही एफिडेविट पर हस्ताक्षर करें! गंभीर अपराधों को सामान्य अपराध
की श्रेणी में दर्ज़ किए गए! सबूतों को मिटाया गया, उनसे छेड़-छाड़ की गई,
महत्वपूर्ण कागजात नष्ट किए गए! पुलिस का कहना था कि कुछ क्षेत्रों में
कर्फ्यू लगाया गया था लेकिन यह सिर्फ सिखों के लिए ही था जो कि उनके
सामूहिक नर संहार के बाद लगाया गया था!
इससे और भी अधिक
बदतर हुआ था! पीड़ित होने का छलावा देते हैं लेकिन इसके बहुत से अधिकारीयों
ने उन कांग्रेसी नेताओं को नामजद नही किया जो कातिल दस्तों (भीड़) को
भड़काते हुए देखे गए थे!
नरसंहार के लगभग बाद से ही कई जांच
कमीशन आए और गए, सब ने इसमें पुलिस की संलिप्तता की जांच की! पहले १९८४ में
भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी वेद मरवाह की अध्यक्षता में! दूसरा-- १९८७
में, एक कमेटी का गठन भारतीय प्रशासनिक सेवा की अधिकारी कुसुम लता मित्तल
की अध्यक्षता में! तीसरा -- १९९० में, जैन- अग्रवाल कमेटी---रिटायर्ड जज जे
डी जैन एवं भारतीय पुलिस सेवा के सेवा निवर्त्त अधिकारी डी के अग्रवाल की
संयुक्त अध्यक्षता में! फिर चौथा २००० में नानावती कमीशन, जो कि सुप्रीम कोर्ट के सेवा निवर्त जज जी टी नानावती की अध्यक्षता में! प्रत्येक कमीशन ने हजारों एफिडेविट प्राप्त किए जिनमें पुलिस की
सिखों के कत्ले आम में भूमिका को स्पष्ट वर्णित किया गया था, इन सब ने
सुभाष टंडन को ही आरोपित किया था, उन्हीं का प्रमुख हाथ बताया गया था!
सुरिन्दर
सिंह---जो कि जगदीश टाईटलर के खिलाफ मुख्य गवाह है, जिस पर कातिलों की
भीड़ को नेतृत्व करने का आरोप है- ने पुलिस कमिश्नर सुभाष टंडन से मदद की
गुहार की तो देखिये सुभाष टंडन ने सुरिन्दर सिंह से क्या कहा कि हमने उनकी
मदद की जो मारे गये, हम तुम्हारी भी मदद करते यदि तुम मारे जाते? असल में
इस सूअर टंडन का इस हत्याकांड में खुद का भी हाथ था!
लगभग एक चौथाई सदी बीत जाने के बाद भी, न तो इंसाफ ही मिला है और न ही किसी को इस नर संहार का दोषी माना गया है! कुल मिला कर सभी जांच आयोगों ने १४७ पुलिस अधिकारीयों की भूमिका सिखों के नर संहार में उनकी संलिप्तता दिखाती है! किसी भी पुलिस अधिकारी को सज़ा नही दी गई! सन २००५ तक इनमें से ४२ पुलिस अधिकारी या तो रिटायर (सेवा निवृत) हो चुके थे या उनकी मृत्यु हो गई थी! बाकी बचे हुए पुलिस अधिकारीयों पर दिल्ली सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की!
बहुत से अधिकारी जिनकी सिखों के नर संहार में भूमिका और सबूतों को नष्ट करने के आरोप में बर्खास्तगी की सिफारिश की गई थी, को तरक्की दे दी गई! कई अन्य को सम्मान पूर्वक सेवा निवृति का अवसर प्रदान किया गया! केंद्रीय गृह मन्त्रालय ने ऐसे पांच अधिकारीयों को विशेष रूप से सम्मानित किया! इसी दौरान, ऐसे प्रबंध किए गए कि जो लोग सिखों के नर संहार के लिए दोषी थे, उन्हें बिना किसी भय के देश में कहीं भी स्वतंत्र घूमने की सहूलियत प्रदान की गई!
एस
एच ओ शूरवीर सिंह त्यागी जो कि पूर्वी दिल्ली के एक थाने में तैनात था, की
अपनी निगरानी में ५०० सिखों को निर्दयतापूर्वक कत्ल किया गया! राजधानी के
किसी एक भाग में कत्ल किये गए सिखों की यह सब से बड़ी संख्या थी! कुसुम लता
मित्तल ने अपनी जांच में त्यागी के बारे में लिखा.... नर संहार के दौरान
इसे 'आपराधिक दुष-चारित्रिक व्यक्ति' बताया गया और टिप्पणी की गई की कि,
‘किसी भी पुलिस बल के लिए यह शर्म की जिन्दा मिसाल है!'
फिर भी की त्यागी की नौकरी में सीढियां
चढ़ने की कोशिशें कामयाब रहीं! मित्तल जी अपनी रिपोर्ट में लिखती हैं कि
......आँखों देखे गवाहों को दबाव डाल कर इसके पक्ष में लिखे गए एफिडेविट
स्पष्ट संकेत करते हैं कि यह पूर्णत: असंभव था कि कोई भी गवाह इतना साहस
जुटा पाता कि वह आता और इसके खिलाफ कोई सबूत पेश कर पाता ! उसका यह
रहस्योदघाटन चौंकाने वाला है कि ....त्यागी को पुलिस सेवा से सम्मानपूर्वक
विदाई दी गई क्योंकि पुलिस केन्द्रीय गृह मंत्रालय से उसके खिलाफ चार्ज शीट
दाखिल करने के आदेश पत्र को प्राप्त करने में विफल रही जो कि किसी सरकारी
अधिकारी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के लिए अत्यंत आवश्यक था! उसके खिलाफ
कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई! २००५ में तो उसे असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर (ACP) की पदोन्नति भी दे दी गई थी!
सेवा
दास डी सी पी (पूर्व) त्यागी के ऊपर तैनात थे! सेवा दास का चरित्र किसी
पुलिस संग्ठन के लिए एक बदनुमा दाग है! उसे किसी भी महत्वपूर्ण कार्य की
जिम्मेदारी नहीं सौंपनी चाहिए, वह विश्वास के काबिल नहीं है! सेवा दास ने
सिख पुलिस अफसरों को ड्यूटी से हटा दिया था जो कि इन दंगाइयों और कातिलों
से निपटने की क्षमता रखते थे! उसके नीचे काम करने वाले सभी एस एच ओ
अधिकारीयों ने अपने इलाकों में सिखों से हथियार रखवा लिए थे और उन्हें
निहत्था कर दिया था जिस से वे स्वयं की तथा अपने परिवार की रक्षा नही कर
सकते थे! इस के बावजूद ऐसे कोई प्रयत्न उन सिखों के प्राणों की रक्षा के
लिए नहीं किए गए थे! सेवा दास को सीधे निर्देश पुलिस कमिश्नर सुभाष टंडन से
मिलते थे!
कांग्रेस की शह पर दिल्ली के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर सुभाष टण्डन ने इस नर संहार को अंजाम दिया......
नानावती कमीशन के सम्मुख सुभाष टंडन के बयान के कुछ अंश;
उसने
आगे कहा कि वहां दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर, उसके स्वयं के और मेजर जनरल
जामवाल (दिल्ली क्षेत्र के जनरल आफिसर कमांडिंग) के मध्य एक मीटिंग चल रही
थी, दोपहर के बाद मेजर जनरल जामवाल ने उसे बताया कि उस के पास फौज की इतनी
अधिक यूनिट नहीं है और वह केवल दिल्ली के दो जिलों में ही फौज की तैनाती
कर सकता है! जैसे दिल्ली कैंट में आर्मी हैड क्वार्टर के नजदीकी क्षेत्र !
उसकी सलाह पर जामवाल केन्द्रीय दिल्ली और दक्षिण दिल्ली के क्षेत्र में
सेना की टुकडियां भेजने को सहमत हुए! उसने गुरुद्वारा रकाबगंज पर हमले की
बात भी की और बताया कि वह भी वहां गया था! उसने बताया कि जब वह गुरुद्वारा
पहुंचा था तो भीतर से आग की लपटें उठ रही थीं! तब वह गुरुद्वारा परिसर के
अंदर घुस गया और उसने एक नेता से कहा कि वह भीड़ को और आग लगाने से रोके!
उसने यह भी बताया कि वह अपने साथ तीन हिन्दुओं को (जो गुरूद्वारे में नौकरी
करते थे) और उनकी पत्नियों को भी गुरुद्वारा से अपने साथ सुरक्षित बाहर ले
आया था इसने भीड़ पर अच्छा प्रभाव डाला था, उन्हें संतुष्टि हुई थी कि
उनको (हिन्दुओं) कोई नुकसान नहीं पहुंचा था! उसने कमल नाथ के वहां होने की
पुष्टि भी की और कहा कि कमल नाथ भीड़ को वहां से जाने के लिए कह रहे थे!
उसने यह भी कहा कि उस समय वहां पर दिल्ली के अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर भी
वहां आ पहुंचे थे और उस क्षेत्र के डी सी पी को भीड़ को नियन्त्रण में रखने
के लिए कहा! उसने कई और मीटिंगों के बारे में भी जानकारी दी जो लेफ्टिनेंट
गवर्नर और गृह मंत्री के मध्य पहली नवंबर को हुई थीं! !
उसे
त्रिलोकपुरी में सिखों के नर संहार किए जाने की जानकारी शाम को छ: बजे
मिली थी तब उसने अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर दिल्ली क्षेत्र को निर्देश दिए थे
कि वे वहां स्वयं जाएँ और उचित प्रबंध करें! उसने आगे कहा कि उस क्षेत्र के
एस एच ओ ने सिखों को बचाने के अपने कर्तव्य पालन करने में लापरवाह पाया
गया, जिस पर उसे गिरफ्तार कर लिया गया था और पुलिस की सेवा से निलंबित भी
कर दिया गया था (जबकि आप उसे स्वतंत्र घूमते देख सकते हैं)! इसलिए उसे
स्वयं को त्रिलोकपुरी जाना पड़ा था और बाकी बचे हुए सिखों को बचाने और उनकी
सुरक्षा के लिए निर्देश दिए थे! उसने आगे कहा कि स्थिति में चार नवंबर के
बाद से सुधार होना शुरू हुआ था! उसके अनुसार उसे केंद्रीय गृह मन्त्री
द्वारा बहुत से निर्देश ३१ अक्टूबर से पहली नवंबर की शाम तक प्राप्त हुए
थे! उन निर्देशों का कोई खुलासा नही किया गया और न ही इस पर विस्तार पूर्वक
चर्चा की गई! क्या नानावती कमीशन घास खोद रहा जो उसके पास कोई प्रश्नावली
नहीं थी ? सिर्फ अपराधियों को बचाने का षड्यन्त्र ही जारी था!
१९८९ के बाद भले ही वे भारत के प्रधान मंत्री न रहे हों लेकिन कांग्रेस के महासचिव वे १९९१ तक बने रहे! उन्होंने श्री लंका के तमिल ईलम LTTE को पहले तो भारत में ट्रेनिंग दी, फिर श्री लंका सरकार की मदद के लिए इन तमिल टाइगर्स को कंट्रोल करने और शांति स्थापना के लिए अपनी फौज ही श्री लंका भेज दी, जिस का अंत तमिल टाइगर्स से सीधे टकराव के बाद ही हुआ! २१ मई १९९१ को वे तमिलनाडु के श्री पेरुम्बुदुर में वहां के कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में चुनाव प्रचार करने गए थे जहाँ एक आत्मघाती बम विस्फोट में इनकी मृत्यु हो गई! याद रखने वाली बात है कि सिखों के कत्ले आम पर अपने एक बयान में उन्होंने कहा था कि, 'जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है और कीड़े मकौड़े मरते ही हैं!' लेकिन आश्चर्य तो यह है कि उसकी स्वयं की हत्या पर तमिलनाडु में कोई धरती न तो हिली थी और न ही कोई कीड़ा मकौड़ा मरा था अपितु वहां के लोगों ने इसे तमिलों का दुश्मन माना हुआ था और उनकी सहानुभूति तो तमिल टाइगर्स के साथ थी!
यह
हमारी समझ से बाहर है कि यदि दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर गवई ने केंद्रीय
गृह मंत्रालय के आदेशों को मानने से इंकार कर दिया था तो उन पर गृह
मंत्रालय द्वारा कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों नही की
गयी जबकि अगले ही दिन ४ नवंबर को ही छुट्टी पर चले गये थे, उनके स्थान पर
गृह सचिव एम एम के वली को नियुक्त किया गया था ! तहलका के प्रसिद्ध पत्रकार
अजमेर सिंह ने लेफ्टिनेंट गवर्नर गवई का इंटरव्यू लिया था जो अपने पाठकों के लिए हम यहाँ प्रस्तुत करते हैं;
तहलका के पत्रकार अजमेर सिंह द्वारा लिया गया इंटरव्यू
नवंबर १९८४ के सिख
कत्ले आम में श्री पद्माकर गवई दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर थे! उनके
इंटरव्यू के कुछ अंश जो उन्होंने तहलका के पत्रकार अजमेर सिंह को २००५ में
दिया था!
क्या आपने प्रधान मंत्री राजीव गाँधी को दिल्ली के हालात को मद्दे नजर रखते हुए फौज लगाने की सलाह दी थी?
हाँ
! मैंने दी थी! लेकिन मैं क्यों उसके पास जाता---क्या सिर्फ अपना प्रभाव
डालने के लिए? इसके बाद तो मेरे पास सिर्फ एक ही रास्ता बचता था कि गृह
मंत्रालय को सिफारिश की जाये क्योंकि पुलिस तो केवल उन्हीं के आदेश का पालन
करती है!
प्रधान मंत्री राजीव गाँधी ने क्या प्रतिक्रिया दी थी जब आपने दिल्ली में फौज लगाने की सलाह दी थी?
अब
मैं आपको राजव गाँधी के साथ हुई बातचीत के बारे में क्या बताऊँ? जगदीश
टाईटलर और धर्मदास शास्त्री भी वहां बैठे हुए थे! उसने (राजीव गाँधी) ने
मुझे उत्तर दिया कि फौज को बुलाने में कुछ विलंब हो सकता है! मैंने कहा कि
मैं आप से इस विषय पर बहस तो नहीं कर सकता, आप शोक में हैं, लेकिन मैं
जानता हूँ कि इसके क्या परिणाम होंगे!
तो क्या इसका मतलब है कि कुछ लोग आप के खिलाफ संगठित हो गये थे?
ये
सभी व्यक्ति, जगदीश टाईटलर, शास्त्री मेरे खिलाफ संगठित थे! इन्होंने
मेरे द्वारा दिल्ली के हालात को संभालने पर राजीव गाँधी के कान भर दिए थे!
लेफ्टिनेंट गवर्नर की क्या हैसियत होती है! टाईटलर को यह बर्दाश्त नहीं था
कि एक दलित दिल्ली का लेफ्टिनेंट गवर्नर बने! उसने यह कहा था कि, गवई उनके
खिलाफ काम कर रहा है!
इस सब के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं?
खुले
मन से मैं आप के साथ अपने अहसास बाँटना चाहता हूँ. गृह मंत्री चूहे की तरह
छिपे रहे, मुझे हिदायत दी, लोग फंस गये हैं, आप मदद कीजिए, मेरे दोस्त हैं
पर उसके सिवाय कोई मदद नहीं! ये क्या बताना चाहते हैं? ये सब चोर लोग,
बोले साले पर सारा ठीकरा फोड़ दो
तो क्या नरसिम्हा राव एक चूहे की भांति छिपा रहा?
हाँ!
डर के कारण! वह एक चूहे की भांति छिपा रहा! (वह इंदिरा गाँधी और राजीव
गाँधी - दोनों का ही विश्वास पात्र था जो बाद में इस देश का प्रधान मंत्री
भी बना)!
और कौन कौन जिम्मेदार है?
जामवाल
! उसने पुलिस कमिश्नर (एस सी टंडन) से मिलने से इंकार कर दिया था! वह
मुझसे मिलना चाहता था लेकिन मैंने उसे कहा की शीग्रता करो और समय व्यर्थ न
गवाओ! इन दोनों को मिलना चाहिए था! मैंने टंडन से फौज लगाने के बारे में
पूछा था! मैंने जब चीफ आफ आर्मी स्टाफ जनरल वैद्य से फौज न लगाये जाने की
शिकायत की तो उसने मेरी बात को हल्के में लेते हुए उत्तर दिया था कि इस सब
में समय लगता है! (मेजर जनरल जे एस जामवाल उस समय दिल्ली क्षेत्र के
कमांडिंग आफिसर थे)!
आप ने पहले एक मीटिंग का भी जिक्र किया था?
यह
मीटिंग डाक्टर पी सी एलेग्जेंडर (प्रधान सचिव) ने बुलाई थी! बहुत ही कीमती
समय व्यर्थ में नष्ट किया गया! इस मीटिंग में भी मैंने फौज को बुलाने पर
जोर दिया था! सभी मुझसे सहमत थे!
लेकिन एलेग्जेंडर ने तो ऐसी किसी भी मीटिंग के होने से इंकार किया है?
हाँ
मुझे पता है! लेकिन उसने इस मीटिंग की अध्यक्षता भी की थी! गृह मंत्री भी
वहां उपस्थित थे! मुझे वहां छुट्टी पर जाने के लिए कहा गया था! बदले में,
मुझे यू पी एस सी के चेयरमैन का पद देने की पेशकश भी की गई थी! मैंने
उन्हें स्पष्ट कहा था कि ऐसी परिस्थितोयों में लेफ्टिनेंट गवर्नर छुट्टी पर
नहीं जाता, अपना इस्तीफा अवश्य देता है! यह बड़ी ही शर्म की बात है!
एलेग्जेंडर वहां क्या कर रहा था? सिर्फ पत्र ही लिख रहा था! मै अकेला पड़
गया था!
आप ने गृह मंत्री नरसिम्हा राव के रोल की बात की है! राजीव गाँधी का इस सब में क्या रोल था?
उन्होंने संसार को यह दिखाया कि स्थिति पूर्णत: नियन्त्रण में है लेकिन, लेफ्टिनेंट गवर्नर से स्थिति को संभालने के लिए कहा गया था!
क्या प्रधान मंत्री ने सब कुछ आप पर छोड़ दिया था?
राजीव गाँधी के सलाहकारों का इसमें अहम रोल था, उन्होंने बहुत कीमती समय व्यर्थ में नष्ट कर दिया!
लेफ्टिनेंट
गवर्नर पद्माकर गवई के उपरोक्त बयान (रहस्योद घाटन) से स्पष्ट है कि किस
तरह से राजीव गाँधी, जनरल ए एस वैद्य, पी सी एलेग्जेंडर तथा राजीव के
सलाहकारों और भारत सरकार के गृह मंत्री नरसिम्हा राव तथा उनका
मंत्रालय---यानि कि न केवल भारत सरकार (कांग्रेस) ही सिखों के कत्लों के
लिए दोषी थी, भारत सरकार का सारा प्रशासन भी निकम्मा था और राजीव तथा अन्य
कांग्रेसी नेताओं के समक्ष घुटने टेक चुका था, प्रशासन द्वारा जान बूझ कर
समय नष्ट किया गया और स्थिति को बिगड़ने दिया गया, उसे संभालने की कोई
कोशिश न की गयी! सिखों को निर्दयी कातिलों के दस्तों के हवाले किया गया! वे
चुन चुन कर निहत्थे सिखों का खून करते रहे और भारतीय सरकार के प्रशासनिक
अधिकारी घोड़े बेचकर गहरी नींद में सोते रहे! नीरो बंसी बजा रहा था जबकि
रोम जल रहा था लेकिन यहाँ दिल्ली केवल जल ही नही रही थी अपितु तैमुर लंग के
पश्चात सदियाँ बीत जाने पर भी खून के आंसू पी रही थी, उसे तैमुर लंग या
राजीव गाँधी में कोई अंतर नजर न आ रहा था! बस चारों और खून ही खून फैलता जा
रहा था, निर्दोषों की हत्याएं हो रही थीं और राजीव सिर्फ अपनी माता का शोक
मना रहा था, उसे किसी अन्य परिवार के दुःख से कोई मतलब न था! किसी भी
परिवार पर क्या बीत रही थी, या कौन सा परिवार मातम मना रहा था, उसे क्या
?---वह तो सिर्फ अपनी दुनिया में मस्त था,,,, माता तो गई परन्तु विरासत में
उसे राज्य तो मिला? शोक तो केवल बहाना था!
नरसिम्हा
राव द्वारा फौज नहीं बुलाई गई थी फिर भी दुनिया को दिखाने के लिए मेरठ से
फौज को बुलाया गया जो कि दिल्ली से केवल ६५ किलो मीटर की दूरी पर है और
कार से यात्रा करने में केवल एक घंटा ही लगता है, फौज की इस टुकड़ी को
गाज़ियाबाद से पहले ही रोक लिया गया था क्योंकि इस टुकड़ी में सिख सैनिक भी
थे !उधर अख़बारों में सूचना देने के पश्चात भी, आकाशवाणी तथा दूर दर्शन
द्वारा देखते ही गोली मारने के आदेश प्रसारित किए जाने के समाचारों के
बावजूद भी तथा कर्फ्यू लगा दिए जाने के बाद भी सैनिकों को कोई दिशा निर्देश
नहीं थे कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं? पुलिस ने उन्हें कोई सहयोग
नहीं दिया था! फौज तथा पुलिस की कोई संयुक्त कमेटी नहीं बनाई गई थी!
कर्फ्यू की घोषणा तो अवश्य की
गई थी लेकिन किसी अधिकारी ने इसे लगाया नहीं था! दिल्ली के पुलिस कमिश्नर
अपने आफिस (पुलिस मुख्यालय) में थे, फौज के दिल्ली के क्षेत्रीय कमांडर
दिल्ली कैंट के धौला कुआं में थे और लेफ्टिनेंट गवर्नर अपने राज निवास में!
पुलिस के जवान फौजियों को कोई सहयोग न दे रहे थे जबकि पुलिस द्वारा इन
फौजी जवानों को गुमराह करने की खबरें भी प्राप्त हुई थीं! फौजियों को
दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों के १९७४ के पुराने नक़्शे दिए गये थे जिनमें
बाद में बसी पुनर्वास कालोनियों में जहाँ अत्यधिक विनाश हुआ था, का कोई
नामों-निशान न था! फौज को दिल्ली में स्थिति को काबू करने के लिए नहीं
अपितु ३००० फौजी जवानों को इंदिरा गाँधी की अंत्येष्टि में आये वी आई पी
जनों की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था, अंत्येष्टि के उपरांत ही इन
जवानों को दिल्ली में स्थिति को काबू करने के काम पर लगाया गया जो कि खुद
दिशा विहीन थे और जिन्हें पुलिस ने कोई सहयोग न दिया! इन जवानों को तब वहां
पहुंचाया जाता था जहाँ पहले हिंसा हो चुकी होती थी या घटना घटित होने के
पश्चात ही इन्हें उस स्थान पर ले जाया जाता था जिससे ये स्थिति को कंट्रोल
न कर सके थे! इस तरह से फौज को भी जान बूझ कर महत्वहीन एवं अनुपयोगी बना
दिया गया था!
इस
तरह प्रशासन पंगु बना रहा और सिखों की हत्याएं होती रहीं, फौज को बुलाने
की सामर्थ्य तथा अधिकार सुपरिंटेंडेंट पुलिस तथा जिलाधिकारी - दोनों के पास
होती है परन्तु दिल्ली में किसी ने अपने इस अधिकार का प्रयोग निरीह तथा
निहत्थे सिखों को बचाने के लिए नहीं किया, परिणाम स्वरुप लगभग १०,०००
निर्दोष सिख दिल्ली में ही कत्ल कर दिए गए! सरकरी आंकड़े केवल २७३३ मौतें
ही दर्शाते हैं लेकिन जो रिपोर्ट दर्ज़ नहीं की गयीं, या जो पूरे परिवार ही
कत्ल कर दिए गए या यदि कोई
सदस्य किसी परिवार में बचा भी होगा, वह दिल्ली छोड़ कर चला गया---उनका कोई
रिकार्ड नहीं है! भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली में राज्य के दौरान दिल्ली
के मुख्य मंत्री मदन लाल खुराना ने सभी केसों की जांच दुबारा शुरू करवाने
में अहम रोल अदा किया और जब भुक्तभोगी पीड़ित सिखों ने फिर से एफिडेविट जमा
किये तो इनकी संख्या ६००० से अधिक थी लेकिन इनमें से अधिकांश भारतीय जनता
पार्टी के नेताओं तथा कार्य-कर्ताओं के खिलाफ भी थे, जिन्हें गायब कर दिया
गया था! अत; बेदाग तो भारतीय जनता पार्टी और इसके नेता भी नहीं हैं!
पहली
नवंबर की देर रात तक फौज को नहीं बुलाया गया था जबकि कुछ सम्माननीय नागरिक
तथा दिल्ली के सरकारी अधिकारी राष्ट्रपति भवन जा कर राष्ट्रपति महोदय
ज्ञानी जैल सिंह जी से मिले थे और फौज बुलाने तथा शांति स्थापना के लिए
प्रार्थना भी की थी, उन्हें आश्वासन दिया गया था कि वे फौज बुलाने पर विचार
कर रहे हैं परन्तु दिल्ली के दिल कनाट प्लेस में सिखों के व्यावसायिक
प्रतिष्ठान और दुकानों को देर रात तक आग के हवाले किया जाता रहा, पुलिस तथा
अर्ध-सैनिक बल तमाशा देखते रहे परन्तु इन सुरक्षा दस्तों को शायद लकवा
मार गया था जिससे ये निष्क्रिय ही यह सब आगजनी देखते रहे! केवल फरीदाबाद के
जिलाधिकारी ने पहली नवंबर को ही फौज की मांग कर दी थी लेकिन फौज की
टुकडियां फरीदाबाद तीन नवंबर को ही पहुंची! क्यों? क्या पहली नवंबर से तीन
नवंबर तक मेरठ या आगरा से फौज को पहुंचने में इतना वक़्त लगता है या
प्रशासन द्वारा जान बूझ कर देरी की गयी? यह सब एक सोची समझी साजिश का ही
नतीजा लगता है! इसी कारण उपद्रवियों की संख्या में निरंतर इजाफा हो रहा था
क्योंकि उन्हें रोकने वाला कोई न था! पहली नवंबर की अपेक्षा अगले दिन दो
नवंबर को इनकी संख्या में दोगुना इजाफा हो चुका था! त्रिलोकपुरी में तीन
नवंबर को फौज भेजी तो गयी लेकिन सिर्फ पेट्रोलिंग के लिए (गश्त लगाने के
लिए) उपद्रवियों को रोकने या उन पर कार्रवाई करने के लिए नहीं!
दिल्ली
के इस कत्ले आम में कांग्रेसी नेताओं के उपद्रवी भीड़ को भडकाने और उन्हें
निर्देशित करने के भी आरोप हैं! पीड़ित परिवारों ने तथा इलाके के अन्य
गण-मान्य हिन्दुओं तक ने इन कांग्रेसी नेताओं के रोल की आलोचना की है और
इन्हें ही मुख्य आरोपी माना है! इनमें प्रमुख तो सज्जन कुमार, जगदीश
टाईटलर, कमल नाथ, हरी किशन लाल भगत, धर्म दास शास्त्री, ललित माकन, अर्जुन
आदि हैं परन्तु इनसे छोटे स्तर के नेता तथा कार्यकर्ताओं की लम्बी लिस्ट है
जिसे एक गैर सरकारी संगठन पी यू सी एल तथा पी यू डी एफ ने प्रकाशित किया
था! उन्होंने अपनी टीम को सिखों के इन सरकारी कत्लेआम के दौरान दिल्ली के
हर इलाके में भेजा था तथा आँखों देखी आंकड़े प्रस्तुत किये थे! उनके द्वारा
प्रकाशित पुस्तक 'दोषी कौन' तथा अंग्रेजी में "Who are the guilty”
को सरकारी आदेश द्वारा जब्त कर दिया गया था परन्तु तब तक तो ये लाखों की
संख्या में हाथों हाथ बिक चुकी थीं. आप इसका अंग्रेजी अनुवाद http://guiltyof1984.blogspot.in/ इस वेब साईट पर देख सकते हैं!
दिल्ली
के क्षेत्रय नेताओं ने तो उपद्रवी भीड़ को निर्देशित किया और इन्हें भड़का
कर सिखों के घरों, दुकानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तथा कारखानों को आग
लगवाई और निर्दोष सिखों को सरे आम गले में टायर डाल कर जिंदा जलाया! इन
कातिलों के पास पहली नवंबर की सुबह ही इलेक्शन कमिशन की वोटिंग लिस्ट की
प्रतिलिपियाँ मौजूद थीं जिस से इन्हें सिखों के सभी घरबार तथा अन्य
जानकारियां मौजूद थीं! इन प्रतिलिपियों को इन नेताओं के हाथों में देखा गया
था जिससे वे भीड़ को सिखों के घरों पर हमले के लिए निर्देशित कर रहे थे!
परन्तु इतनी शीघ्र ही ये प्रतिलिपियाँ कैसे तैयार की गयीं और इन्हें कैसे
इन नेताओं को बांटा गया? आइये !इस पर कुछ विचार करते हैं!
आपरेशन
ब्लू स्टार (जून १९८४) से इच्छित परिणाम न निकलने से और फौज के अत्यधिक
संख्या में हताहत होने से, सिखों द्वारा वीरता पूर्वक भारतीय सेना का
मुकाबला करने से तथा सारा दोष पाकिस्तान के सर मढ़ देने से भी इंदिरा गाँधी
को वांछित परिणाम नहीं निकले, वह तो सिखों को सबक सिखाना चाहती थी जिससे
वे भविष्य में कभी भी गाँधी परिवार या केंदीय सरकार के विरुद्ध बोलने से
पहले सौ बार सोचें परन्तु उसे ऐसा कुछ हासिल नही हुआ अपितु सिखों का संघर्ष
केंद्र और कांग्रेस के खिलाफ और तेज हो गया! उधर अमृतसर के सिखों के
पवित्रतम गुरुद्वारा दरबार साहिब, जिसे स्वर्ण मन्दिर या गोल्डन टैम्पल भी
कहते हैं, पर फौजी कार्रवाई को सिखों ने सिख धर्म पर हमला माना था और
उन्होंने इंदिरा गाँधी को जान से मारने की न केवल धमकी ही दी थी अपितु
सर्वमान्य निर्णय से इसे अंजाम देने की कोशिशें भी जारी थीं!
वे किसी भी हालत में इंदिरा को मार कर अपने धर्म स्थल पर किए गए फौजी हमले
का प्रतिशोध लेना चाहते थे! सिख कौम तो इंदिरा को मारने का निर्णय ले चुकी
थी और इंदिरा भी इससे अवगत थी! अत: इंदिरा के शातिर दिमाग ने सिखों को
खत्म करने और दबाने का एक और प्लान तैयार किया जिसे 'आपरेशन शांति' का नाम दिया गया!
इस
प्रकार इंदिरा अपने को सिखों से सुरक्षित भी रख सकती थी और उन्हें देश
द्रोही भी करार दे कर हिन्दू समाज तथा भारतीय जनता में अपनी छवि सुधर सकती
थी तथा संपूर्ण भारत की जनता को यह विश्वास दिला सकती थी कि इंदिरा ही केवल
राष्ट्रवादी है और सिख कौम तो देशद्रोही है, इस प्रकार संपूर्ण देश में
सिखों का कत्लेआम शुरू करवाया जा सकता था या उन्हें अलग-थलग करके आर्थिक
रूप से कमजोर भी किया जा सकता था, उन्हें अन्य भारतवासियों की नजरों में
गिराया जा सकता था जिससे सभी उनसे संबंध समाप्त कर लें! इसके लिए एक भयंकर
एवं वीभत्स खूनी खेल की तैयारी कर ली गयी जिसमें पाकिस्तान पर आक्रमण भी
शामिल था और इसे गुरु नानक देव जी के जन्म दिवस या गुरु पर्व पर अंजाम दिया
जाना जो १९८४ के ८ नवंबर को था! इस प्लानिंग को पूर्णत: गुप्त रखा गया था
लेकिन फिर भी इसकी भनक उच्च अधिकारीयों को लग गयी थी जिस से उन्होंने अपने
कई सिख परिवारों को सावधान कर दिया था!
गुरुपर्व
के दिन जब सिख समुदाय गुरुद्वारों में अपने गुरु का जन्म दिन मना रहा होगा
तो उस दिन भारत ने पाकिस्तान पर आक्रमण करना था और रेडियो तथा टी वी से
सिखों के पाकिस्तान का समर्थन तथा सहयोग देने को प्रसारित रन था जिससे
सिखों कि देश में व्यपक रूप से हत्याएं करवाई जा सकें!अक्टूबर १९८४ में
भारतीय सेना की पाकिस्तान सीमा पर युद्ध के लिए तैनाती कर दी गयी थी, युद्ध
अवश्यंभावी था! एक अफवाह भी थी कि केंद्र ने सिखों के विनाश के लिए एक
योजना तैयार की है....इस योजना के तहत पंजाब से लगती संपूर्ण पाकिस्तानी
सीमा पर पाकिस्तानी सेना से झड़पें होंगी और यह प्रचारित किया जायेगा कि
सिखों ने विद्रोह कर दिया है और वे पाकिस्तान से मिल गये हैं, इस तरह
उन्हें देश भर में लूट और मार दिया जायेगा तथा सीमावर्ती जिलों में बंब
वर्षा करके भी उन्हें मारा जायेगा! सिखों
को सारे पंजाब विशेत: सीमावर्ती जिलों गुरदासपुर, अमृतसर, फिरोजपुर,
कपूरथला एवं जालन्धर में न केवल बंब वर्षा अपितु सेना तथा अर्ध सैनिक बलों
द्वारा उनका न्र संहार किया जायेगा और देश के अन्य प्रान्तों में यूथ
कांग्रेस के कार्य कर्ताओं तथा असामाजिक तत्वों द्वारा उनकी संपत्ति लूटी
जाएगी और उन्हें खत्म कर दिया जायेगा! यूथ कांग्रेस द्वारा इसकी संपूर्ण
तैयारी भी कर ली गयी थी केवल केंद्र से निर्देश मिलने का इंतजार था!
ऐसा प्रतीत होता है कि बेअंत सिंह को इंदिरा कि इस गुप्त योजना की भनक
लग गई थी, जिससे वह इस योजना को फेल करने के उपाय ढूँढने में लग गया! उसे
और कुछ नहीं सूझा तो उसने एक भयंकर निर्णय ले लिया कि सांप भी मर जाये और
लाठी भी न टूटे! उसने इस वैमनस्य को सदा के लिए समाप्त करने, सिखों पर
लगाये जाने वाले लांछन से उन्हें बचाने तथा निर्दोष सिखों की हत्याएं रोकने
के लिए ही देश हित में तथा अपनी कौम के हित में इंदिरा को समाप्त करने का
कठोर निर्णय ले लिया! इस काम के लिए उसने नए भर्ती हुए सतवंत सिंह को अपने
साथ मिला लिया और इस आपरेशन शांति के शुरू होने से नौ दिन पूर्व ही ३१
अक्टूबर १९८४ इन दोनों बहादुरों ने इंदिरा को सदा के लिए खामोश कर दिया और
आपरेशन शांति को शुरू होने से पहले ही सदा के लिए दफन कर दिया!
आपरेशन शांति कोई कोरी कल्पना ही नहीं
है कि शायद इस देश के हिन्दुओं को या किसी अन्य को यह निरी बकवास ही लगे
लेकिन यह एक कटु सत्य है! पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के भूतपूर्व मुख्य
न्यायाधीश आर एस नरुला ने नानावती कमीशन को लिखे गए पत्र में इसका उल्लेख
किया है, उनके द्वारा पूछे गए ३६ मुख्य प्रश्नों में से नंबर ३५ के
प्रश्न अनुसार.....35. What was “Operation Shanti”? When was it conceived and worked out? भी इस की पुष्टि करता है!
प्रसिद्ध
इतिहासकार रजनी कोठारी ने भी लिखा है कि...मिले सबूतों के अनुसार आपरेशन
ब्लू स्टार के तुरंत बाद तथा फिर सिख आतंकवादियों द्वारा दिए गये जवाब से
बेचैन होकर केंद्र द्वारा इसका समुचित जवाब देने के लिए एक विनाशकारी योजना
तैयार की गयी जिसे प्रत्येक सिख के घर और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और
गुरुद्वारों, सभी के लिए समुचित प्रबंध कर लिया गया था और इसकी तैयारी भी
कर ली गयी थी!
देखें; निम्न चित्र में इसका उल्लेख किया गया है;
इस
योजना को लेकर फौज के उच्च अधिकारीयों से भी विचार विमर्श किया गया था
जिसे उन्होंने अपनी सहमति नही दी थी! उन्होंने इंदिरा को ऐसा न करने की
सलाह दी थी! उनके अनुसार नाजियों ने भी यहूदियों को गैस चैम्बरों में कत्ल
किया था लेकिन उन्हें समाप्त करने में विफल रहे थे, और उसके द्वारा सिखों
को भी एक झटके में खत्म करने की कोशिश उसे हिटलर की कतार में खड़ा कर देगी
लेकिन जिद्दी इंदिरा ने उनकी सलाह को खारिज कर दिया था! वह अपने निर्णय पर
अडिग थी !
इंदिरा किसी की नहीं सुनती थी! उसके सिखों के कत्ल करने की घृणित
योजना को कार्यान्वित करने के लिए वह अचानक ही २७ अक्टूबर १९८४ को कश्मीर
के दौरे पर गई! शायद उसे भी अपनी मृत्यु का पूर्व अहसास था! बिना किसी कारण
ही, उसने वापिस दिल्ली आते ही अगले ही दिन उन्होंने जनरल वैद्य को बुलावा
भेजा, श्री पी सी एलेग्जेंडर अपनी पुस्तक ‘My Years with Indira Gandhi’. में लिखते हैं, उनके अनुसार उन्होंने जनरल वैद्य को बुलाया और पूछा कि
जम्मू एवं कश्मीर में सेना की कैसी तैयारी है यदि अचानक ही कोई युद्ध छिड
जाये तो? जनरल वैद्य ने उन्हें आश्वस्त किया कि ऐसी किसी भी परिस्थिति के
लिए भारतीय सेना पूर्णत: तैयार है और वे पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों से
अंजान नहीं हैं!
जब
जनरल वैद्य रवाना हो गए तो इंदिरा जी ने मुझसे उपराष्ट्रपति वेंकटरमन के
संपर्क में रहने और उन्हें पंजाब तथा काश्मीर के ताजा हालात पर उनकी चिंता
से अवगत करवाने के लिए कहा (विशेष बात यह थी कि सिख राष्ट्रपति को इस
जानकारी से वंचित रखा गया था)! उन्होंने उपराष्ट्रपति महोदय को समुचित
जानकारी उपलब्ध करवाने और उनके विचार जानने के लिए भी कहा, इससे उन्हें
बड़ी मदद मिलने की उम्मीद थी! मैं नहीं जानता कि उन्होंने उस समय मुझे ऐसे निर्देश क्यों दिए....?
इंदिरा
उपराष्ट्रपति वेंकट रमन को प्रारंभ से ही अपनी इस विनाशकारी योजना में
शामिल करना चाहती थीं क्योंकि वे जानती थीं कि वेंकट रमन ही कार्यकारी
राष्ट्रपति बनेंगे यदि आपरेशन शांति शुरू हो जाता है और ज्ञानी जैल सिंह
राष्ट्रपति नहीं रहेंगे तो..... इन सब अफवाहों में कितनी सच्चाई थी, इस पर
कुछ नहीं कहा जा सकता है लेकिन तेज़ी से घटते घटनाक्रम पर नजर डालें तो जो
कुछ आँखों से दिखाई दे रहा था---उससे
कहीं अधिक अदृश्य भी था! यह एक इंसानी नस्ल को शीघ्रता पूर्वक समाप्त करने
का कुत्सित प्रयास था! इसे भी नजर अंदाज़ नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तानी
राष्ट्रपति जिया उल हक ने इंदिरा की अंत्येष्टि पर कहा था कि... यह बड़ा
कठिन समय था और वे बड़ी कठिनाई से हिंदुस्तान से एक जंग को टालने में
कामयाब हुए हैं!
उसके (जिया उल हक)
नंबर दो, गुलाम इशाक खान ने जुलाई १९९३ में राष्ट्रपति आफिस से विदा लेते
हुए कहा था कि इंदिरा ने पाकिस्तान पर आक्रमण की योजना तैयार की थी लेकिन
वह युद्ध प्रारंभ कर पाती, कयामत से पूर्व ही १० दिन पहले ही उसे गोली मार
दी गई थी!
शहीद बेअंत सिंह तथा सतवंत सिंह
इंदिरा
गाँधी की इस विनाशकारी योजना को, जो गुरु पर्व के दिन जब सिख लोग अपना
त्यौहार मना रहे होते हैं और लगभग सभी गुरुद्वारों में सपरिवार दर्शनों के
लिए पहुंचते हैं, इंदिरा ने अपनी घृणित योजना को कार्यान्वित करने के लिए
फिर से गुरु पर्व का दिन ही सुनिश्चित किया था जैसा कि उसने फौज के जनरलों
को गुरु अर्जन देव जी (panchven सिख
गुरु) के शहीदी पर्व पर अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में आपरेशन ब्लू स्टार की
फौजी कार्रवाई निर्दोष श्रद्धालु सिखों की नृशंस हत्या करवाने में किया
था! यह स्पष्ट: उसकी सिखों को समाप्त करने का आसान तरीका खोजा था और इसमें
कोई संदेह नहीं कि वह एक शैतान स्त्री थी और सिखों से दुश्मनी रखती थी तथा
हर हालत में सिखों के विनाश की कुटिल योजना बनाने में ही उसका ध्यान
केन्द्रित रहता था!
उसकी
बहू सोनिया गाँधी ने वीर सांघवी (एडिटर हिंदुस्तान टाइम्स) को दिए गए एक
इंटरव्यू में यह स्वीकार किया था कि वे (इंदिरा) राजीव को अपनी आकस्मिक
मृत्यु या हत्या होने पर क्या और कैसे करना है-- इस विषय पर राजीव गाँधी को
निर्देश देती रहती थीं! और दिल्ली तथा भारत के अन्य शहरों में नवंबर १९८४
के सिख कत्ले आम के बाद यह अंदाज़ा लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है कि दोनों
बार सिखों के कत्लों के लिए एक विशेष दिन ही क्यों चुना गया था? यह तो भला
हो उन दोनों शूर वीरों का जिन्होंने अपनी जान की बाज़ी लगा कर भी सिख कौम
को बेदाग बचा लिया और हजारों सिखों की निर्मम हत्या होने से रोक दिया, भले
ही इसके लिए एक दमनकारी प्रधान मंत्री को ही उन्हें खत्म क्यों न करना पड़ा
परन्तु देश हित में तथा सिख कौम को देश द्रोही का दाग लगने से साफ़ बचा
लिया! इसके लिए सिख कौम इन शूर वीरों की सदा आभारी रहेगी!
अब थोडा बहुत परिचय
हम उन महान हस्तियों का भी देते हैं जो कि इंदिरा गाँधी के हत्या के बाद
भीड़ को भड़काते रहे, उन्हें मिट्टी का तेल देते रहे या सिखों को मारने के
लिए हर संभव प्रयास करते रहे, वैसे तो १९८४ में सारी कांग्रेस ही इस सब
कत्ले आम में शामिल थी लेकिन कुछ नाम स्पष्ट रूप से सामने आये हैं, जिनमें
से प्रमुख नेताओं तथा अन्य कार्यकर्ताओं के नाम तथा उनका परिचय इस प्रकार
है;
राजीव गाँधी
सर्व प्रथम भारत के
नव नियुक्त प्रधान मंत्री राजीव गाँधी जो पेशे से पायलट थे लेकिन उनकी
माता इंदिरा गाँधी (पूर्व प्रधान मंत्री) की हत्या के बाद वंशवाद को बदावा
देने, तथा सहानुभूति
वश उन्हें कांग्रेसी नेताओं व् इंदिरा के चहेते चाटुकारों द्वारा प्रधान
मंत्री पद दे दिया गया था! उनके नाम की घोषणा ३१ अक्टूबर की शाम को ही कर
दी गई थी!
राजीव गाँधी भारत के छठे प्रधान मंत्री नियुक्त हुए थे! प्रधान मंत्री बनते ही उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह को लोक सभा भंग करने और फिर से चुनावों करवाने के लिए कहा, लोकसभा अपना कार्यकाल पूरा कर चुकी थी! दिसंबर
१९८४ में उन्होंने अपनी माता की हत्या की सहानुभूति को कैश करवाने के लिए
चुनाव करवा दिए जिसमें भारतीय जनता ने उन्हें अपना भरपूर समर्थन दिया और
उन्होंने ५४२ में से ४११ सीटें जीत कर एक ऐतिहासिक विजय दर्ज़ की लेकिन
भाग्य की विडंबना ही थी कि जितनी महान विजय उन्होंने १९८४ में प्राप्त की
थी, उतनी ही बुरी हार केवल पांच वर्षों के पश्चात् १९८९ में उन्हें देखनी
पड़ी जब उनकेही एक वित्त मंत्री वी पी सिंह ने बोफोर्स तोप के सौदे में
कमिशन लिए जाने का आरोप उन पर लगाया! इस घोटाले में उनका नाम आ जाने से देश
की जनता ने उन्हें चारों खाने चित्त भी कर दिया!
१९८९ के बाद भले ही वे भारत के प्रधान मंत्री न रहे हों लेकिन कांग्रेस के महासचिव वे १९९१ तक बने रहे! उन्होंने श्री लंका के तमिल ईलम LTTE को पहले तो भारत में ट्रेनिंग दी, फिर श्री लंका सरकार की मदद के लिए इन तमिल टाइगर्स को कंट्रोल करने और शांति स्थापना के लिए अपनी फौज ही श्री लंका भेज दी, जिस का अंत तमिल टाइगर्स से सीधे टकराव के बाद ही हुआ! २१ मई १९९१ को वे तमिलनाडु के श्री पेरुम्बुदुर में वहां के कांग्रेस प्रत्याशी के पक्ष में चुनाव प्रचार करने गए थे जहाँ एक आत्मघाती बम विस्फोट में इनकी मृत्यु हो गई! याद रखने वाली बात है कि सिखों के कत्ले आम पर अपने एक बयान में उन्होंने कहा था कि, 'जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है और कीड़े मकौड़े मरते ही हैं!' लेकिन आश्चर्य तो यह है कि उसकी स्वयं की हत्या पर तमिलनाडु में कोई धरती न तो हिली थी और न ही कोई कीड़ा मकौड़ा मरा था अपितु वहां के लोगों ने इसे तमिलों का दुश्मन माना हुआ था और उनकी सहानुभूति तो तमिल टाइगर्स के साथ थी!
राजीव
गाँधी और अन्य उच्च पदासीन कांग्रेसी नेताओं के इशारों पर ही निर्दोष
सिखों की हत्याएं हुईं थिस क्योंकि इस की तयारियां तो पहले से ही चल रही
थीं और इसके लिए एक विनाशकारी योजना भी तैयार कर ली गई थी, जिसका संपूर्ण
विवरण हम पीछे लिख चुके हैं! फिर भी राजीव गाँधी की बात करते हुए हमें कुछ
बातें फिर से लिखनी होंगी! राजीव गाँधी की पत्नी सोनिया गाँधी मूल रूप से
इटली की रहने वाली हैं! इंदिरा की मृत्यु पर राजीव गाँधी के पारिवारिक
मित्र अमिताभ बच्चन ने भारत सरकार के स्वामित्व वाले सरकारी टी वी चैनल पर
आकर एक लाइव शो दिया था जिसमें उन्होंने भारत की हिन्दू जनता से सिखों का
खून माँगा था! उन्होंने अपने प्रसारण में 'खून का बदला खून' के नारे लगा कर
हिन्दुओं की भावनाओं को भडकाने में अपना पूर्ण सहयोग प्रदान किया था! जिस
की विस्तार से चर्चा हम अमिताभ बच्चन की निर्दोष सिखों के कत्ल में शर्मनाक
भागीदारी पर आगे करेंगे!
भारत
वर्ष के इतिहास पर दृष्टि डालें तो हम पाएंगे कि यहाँ भागते दुश्मन पर भी
कभी वार नही किया गया! पृथ्वी राज चौहान ने मुहम्मद गौरी को सत्रह बार माफ़
किया था लेकिन जब पृथ्वी राज चौहान की हार हुई तो मुहम्मद गौरी ने उसे
गिरफ्तार करके उसकी आँखें निकल ली थीं, ऐसी बर्बरता तो केवल विदेशी ही करते
हैं लेकिन भारतवासी तो सहिष्णु होते हैं फिर इस भारत भूमि पर खून का बदला
खून से मांगने की परंपरा कहाँ से आई?
इटली
में कबीलाई लोगों में यद्ध होते रहते हैं और वहां के कबीले खून के दाग को
खून से साफ़ करने की बात करते हैं अर्थात जब तक किसी के खून के बदले किसी
की जान नहीं ली जाती तब तक उस खून का दाग नहीं धुलता! यह तो केवल सोनिया
गाँधी ही जानती थी! इटली की भाषा में इसे Lu sangu lava lu sangu" कहते
हैं! तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं कि यदि इस कथन को सोनिया ने राजीव
को बताया हो और राजीव गाँधी ने प्रधान मंत्री पद पर होते हुए दूर दर्शन को
निर्देश दिया और एक टी वी कैमरा और टीम उसके निर्देशों का पालन करने के लिए
तीन मूर्ती भवन में अमिताभ बच्चन का इंतजार करने लगी जिसे अमिताभ ने अपनी
क्रोधित मुद्रा में देश के लोगों को इस नई परंपरा से अवगत करवाया और सिखों
का खून माँगा! परिणाम स्वरुप समस्त भारत में सिखों के खिलाफ हिंसा हुई
लेकिन राजीव की नजर में तो सिख केवल कीड़े मकौड़े ही थे!
१४ दिसंबर २००९ को संसद में एक सिख सांसद सरदार त्रिलोचन सिंह
ने अपने भाषण में सिखों के कत्लेआम के लिए सीधे-सीधे ही स्पष्ट रूप से
राजीव गाँधी और अमिताभ बच्चन का नाम लिया, किसी कांग्रेसी सदस्य ने
इसका विरोध नही किया जबकि विपक्षी सदस्यों ने मेजें थप-थपा कर
इसका अनुमोदन किया! सरदार त्रिलोचन सिंह जी १९८४ में भारत के राष्ट्रपति
ज्ञानी जेल सिंह जी के निजी सचिव रह चुके हैं अत:वे सभी सरकरी गुप्त भेदों से पूर्णत: परिचित हैं!
कृपया पुष्टि के लिए यह लिंक अवश्य देखें; http://timesofindia.indiatimes.com/India/VS-links-Rajiv-to-Sikh-riots-Anderson-escape/articleshow/6128474.cms
पांच जुलाई २०१० को केरल के कांग्रेसी मुख्य मंत्री श्री वी एस अच्युतानन्दन ने भूतपूर्व प्रधान मंत्री राजीव गाँधी पर १९८४ में सिखों को सामूहिक रूप से कत्ल करवाने का आरोप लगाया! भारत के किसी भी प्रान्त से स्वयं कांग्रेस के ही किसी मुख्य मंत्री की यह स्वीकारोक्ति इस सत्य की पुष्टि करती है कि इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिखों को उसके बेटे एवं नव नियुक्त प्रधान मंत्री राजीव गाँधी ने ही कत्ल करवाया था, इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता है! किसी राष्ट्र के लिए इस से बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है कि उसका प्रधान मंत्री स्वयं ही सामूहिक हत्या कांड का दोषी हो? और अपने ही निर्दोष नागरिकों का कातिल?
भारत के तत्कालीन गृह मंत्री नर सिम्हा राव
सिख
कत्ले आम १९८४ की बात करें तो राजीव गाँधी के बाद जिस शख्स का नाम सबसे
पहले उभर कर सामने आये तो वह केवल नर सिम्हा राव का ही होगा ! ये १९८४ में
केंद्रीय सरकार में गृह मंत्री थे और देश तथा देश वासियों की सुरक्षा
इन्हीं के जिम्मे थे परन्तु इनके लिए इतने लिखना ही काफी होगा---कि ये
आस्तीन के सांप साबित हुए और अपने ही देशवासियों के एक वर्ग के नर संहार को
मौन बैठे देखते रहे, उस कत्ले आम को इनकी पूर्ण सहमति थी और अपरोक्ष रूप
से मौन रहते हुए भी सिखों के अधिक से अधिक कत्लों को करवाने में इनकी
महत्वपूर्ण भूमिका रही है! न तो इन्होने दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को इस
संहार को रोकने के लिए कहा, न ही उनकी विफलता पर कोई कार्रवाई की, इन्होने
तीन दिनों तक फौज भी नही बुलाई और जब बुलाई भी तो पुलिस की तरफ से कोई
सहयोग फौज की जवानों को नही था, उन्हें सिखों की रक्षा करने के लिए नहीं
अपितु सिर्फ मार्च पास्ट के लिए ही बुलाया गया था, यदि फौज कहीं पहुंची भी
तो घटना हो चुकने के पश्चात!जब कुछ प्रतिष्ठित नागरिकों और विपक्ष के
सदस्यों द्वारा अधिक दबाव बनाने पर फौज को बुलाया भी, और यह जानकारी मिलने
पर कि उस फौज की टुकड़ियों में सिख सैनिक भी हैं तो उसे गाजियाबाद से पहले
ही रोक दिया गया जिससे वे कहीं सिखों के कातिलों को ही न मार दें? दिल्ली
में जितना भी सिखों का जानी या आर्थिक नुकसान हुआ - उस सबका श्रेय सिर्फ
इन्हें ही जाता है! इनके बारे में तो इस पुस्तक में पहले ही बहुत कुछ लिखा
जा चुका है! कांग्रेस ने इन्हें पुरस्कृत करके १९९१ में भारत का प्रधान
मंत्री बनाया था !
तत्कालीन केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री हरी किशन लाल भगत
इनसे मिलिए---ये हैं स्वनाम धन्य श्री हरी किशन लाल भगत! जितना सुंदर इनका नाम है उतने ही दुष्ट आत्मा थे ये, जो अब परलोक सिधार चुके हैं, मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इनके लिए नर्क के दरवाजे भी नहीं खुले होंगे और यदि कहीं कुम्भी पाक नर्क वास्तव में है तो ये वहीँ सड़ रहे होंगे! १९८४ के सिख कत्लेआम के मुख्य योजनाकारों में से ये भी एक थे!
शूरवीर सिंह त्यागी जो कल्याणपुरी थाने के एस एच ओ थे और जिन्हें अपनी ड्यूटी में लापरवाही बरतने और सिखों को न बचाने के इल्जाम में गिरफ्तार और बर्खास्त कर दिया गया था, बताते हैं कि उन्हें तो केवल मोहरा बनाया गया था! सच्चाई तो यह है (उनके शब्दों में) कि ३१ अक्टूबर की शाम को एक मीटिंग हरी किशन लाल भगत (तत्कालीन केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री) के घर शाहदरा (पूर्वी दिल्ली) में हुई थी जिसमें दिल्ली पुलिस के सभी उच्चाधिकारी उपस्थित थे! और उस मीटिंग के निर्णय के अनुसार ऊपर से नीचे तक के पुलिस अधिकारीयों को निर्देश दिए गए थे कि कत्ल होते हैं, होने दो, सबूत मिटा दो अत: बाकी सभी स्थानों से सबूत मिटा दिए गए थे लेकिन त्रिलोकपुरी में मृतकों की संख्या अधिक थी और सिखों के जले हुए शव चारों और बिखरे पड़े थे जिन्हें जल्दी से हटाना संभव नहीं था और न ही पत्रकारों की दृष्टि से बचा पाना! अत; ये कत्ल जग जाहिर हो गए!
एक पीडिता अजय कौर ने अपनी गवाही में कहा था कि उसने मंत्री हरी किशन लाल भगत को उसके पडोस में भीड़ को संबोधित करते हुए यह कहते सुना था कि पुलिस तिन दिनों तक कोई दखलंदाज़ी नहीं करेगी, इसलिए वे लोग प्रत्येक सिख को कत्ल करने के लिए स्वतंत्र हैं, जाओ और भारत माता की सेवा करो!
http://www.docstoc.com/docs/7558768/1984--Sikhs’-Kristallnacht से साभार
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री एच एस नरुला ने भी नानावती कमीशन को भेजी गई अपनी प्रश्नावली में छठे और सातवें प्रश्न में यही बात पूछी है, कृपया वे प्रश्न देखें;
6. Some police officers – above DSP level were called by wireless messages to attend a meeting at a Minister’s (H.K.L. Bhagat’s) house late on Oct. 31. Who ordered the meeting, how much time was spent in the meeting, who addressed the meeting, and for what purpose?
7. Who accompanied Rajiv Gandhi on the night between 31.10.1984 and 1.11.1984 when he – admittedly – went around East Delhi with HKL Bhagat, and others, for a short time?
अर्थात ....
६. कुछ पुलिस अधिकारी---डी एस पी स्तर से उपर के अधिकारीयों को वायरलेस संदेश द्वारा ३१ अक्टूबर की शाम को मंत्री (एच के एल भगत) के घर एक मीटिंग के लिए पहुँचने को कहा गया था! इस मीटिंग का आदेश किसने दिया था?इस मीटिंग में कुल कितना समय लगा? इस मीटिंग की अध्यक्षता किसने की और किस कारण से?
७. राजीव गाँधी ३१ अक्टूबर और १ नवंबर की मध्य रात्रि में थोड़े समय के लिए मंत्री एच के एल भगत के घर और अन्यों से मिलने पूर्वी दिल्ली गए थे (ऐसा उन्होंने स्वीकार किया था) तो उनके साथ और कौन कौन गया था?
प्राप्त एफिडेविट्स से एकत्रित जानकारी के अनुसार मंत्री हरी किशन लाल भगत ने भीड़ के स्थानीय इकाइयों के नेताओं को पैसे बांटे थे और कई केसों में तो उसने स्वयं भी भीड़ को निर्देशित किया और सिखों के घरों पर हमला करने और उन्हें जान से मारने के लिए उकसाया था! उस पर यह भी आरोप है कि उसने कत्लों के आरोप में गिरफ्तार लोगों को अपने प्रभाव से शाहदरा जेल से छुड़वाया था, इस पापी की मृत्यु २००५ में हुई थी!
कमल नाथ
कमल नाथ आजकल केंद्रीय मंत्री परिषद में सडक एवं परिवहन मंत्री हैं! उन्हें नानावती कमिशन ने १९८४ के सिख कत्ले आम में भाग लेने का दोषी पाया था! आँखों देखे गवाहों ने नाथ को उस भीड़ को अगुवाई करते देखा था जिसने दिल्ली के गुरुद्वारा रकाब गंज पर हमला किया था और दो सिखों को जिन्दा जला डाला था! लेकिन पुख्ता सबूत न मिलने के कारण और उनकी गवाही भी २० साल के बाद दर्ज़ की जाने पर संदेह का लाभ देते हुए जस्टिस नानावती ने कमल नाथ के खिलाफ किसी कार्रवाई की सिफारिश न की थी!
इंडियन एक्सप्रेस के एक फोटोग्राफर मनीष संजय ने भी उन्हें गुरुद्वारा रकाबगंज के बाहर भीड़ को उकसाते देखा था लेकिन नानावती कमिशन को दिए अपने बयान में उन्होंने इसे कमल नाथ द्वारा भीड़ को वहां से चले जाने को कहते हुए सुना बताया था! किस कारण उन्होंने अपनी गवाही बदली, ये वे ही जानते होंगे!
लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि कमल नाथ पर आज तक कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई, न ही उन्हें गिरफ्तार किया गया और न ही उनको इस अपराध का दोषी पाया गया अपितु उन्हें प्रोन्नति देकर केबिनेट मिनिस्टर (केन्द्रीय मंत्री) बना दिया गया है!
One obvious place to check for trouble was the gurdwaras. I made my way to Rakab Ganj gurdwara, where I saw the still smouldering bodies of two Sikhs who had been burnt alive by a mob outside. And this was while a very large police contingent stood by, all wearing riot gear - to protect themselves. And still I had no idea what scale of killing was being prepared for that night, or even taken place the past night. It was only after the next day after seeing how much killing had taken place, and at how many places, that I reported that these were not murders, these were massacres.
http://ibnlive.in.com/blogs/sanjaysuri/259/53922/1984-riots-the-lives-of-others.html
चूँकि इन सिखों के कातिलों के खिलाफ भारत में कोई सुनवाई नही होती, कोई कानूनी कार्रवाई नही होती, न्यायिक व्यवस्था पंगु बनी हुई है तो ऐसे में सिख समाज को भारत में किसी न्याय की कोई आशा अब नहीं रह गई है! इसे देखते हुए अमेरिका के एक गैर सरकारी संगठन सिख्स फॉर जस्टिस ने दो आँखों देखे गवाहों जसबीर सिंह एवं महिंद्र सिंह की प्रार्थना पर न्यूयार्क, अमेरिका की एक अदालत में एक मुकदमा कमल नाथ के खिलाफ दायर किया है और अदालत ने जो सम्मन कमल नाथ को हाज़िर होने के लिए जारी किया, कृपया उसकी फोटो प्रतिलिपि देखें! इससे बड़ी शर्मनाक बात और क्या होगी कि इस देश के निवासी न्याय के लिए दूसरे देशों की और देखें?
सैंकड़ो सिखों ने बेल्जियम के शहर ल्युवेन में केंद्रीय लाइब्रेरी के समक्ष १३ अक्टूबर २०११ को प्रदर्शन किया जहाँ कि १९८४ के सिख कत्ले आम के मुखय प्रायोजकों में से एक कमल नाथ (केंदीय शहरी विकास मंत्री) वीरवार को होने वाली पांचवीं यूरो इंडिया सम्मिट में भाग लेने पहुंचे थे! प्रदर्शनकारी कमल नाथ को बेल्जियम के कानून के तहत १९८४ में दिल्ली में उसके द्वारा सिखों के कत्ल किए जाने के आरोप में मुकदमा चलाने की बात कर रहे थे! यह प्रदर्शन यूरोप के सिख संगठनों, बेल्जियम की सिख काउन्सिल तथा यूरोप के गुरुद्वारों की प्रबंध समितियों द्वारा संयक्त रूप से किया गया था!
लन्दन के बकिंघम गेट पर क्राउन प्लाज़ा के सामने मंगलवार २८ सितंबर २०१० को कमल नाथ जो कि वहां केंद्रीय लन्दन में हाइवे इन्फ्रास्ट्रक्चर पर गोलमेज कांफ्रेंस करने जा रहे थे, को सिखों के प्रदर्शन का सामना करना पड़ा, ये सिख बोले सो निहाल---सत श्री अकाल, नेवर फोरगेट ८४ तथा बलात्कारी आदि नारे लगा रहे थे! कमल नाथ कमरे के पर्दे के पीछे छुप कर सब देखता रहा और पुलिस से सुरक्षा की भीख मांगता रहा था!
न्याय का ढोंग करने वाली भारत सरकार तो आज तक अन्याय ही करती आई है, इंसाफ तो जैसे इसके पास है ही नही! पीड़ितों की आवाज़ तो इसे कभी पिछले २८ सालों से सुनाई ही नही दी लेकिन अमेरिका की एक अदालत ने इस पर मुकद्दमा चलाने की इजाजत दे दी है!
२३ मार्च २०१० को कनाडा के टोरोंटो शहर में Canada-India Business Council द्वारा कमल नाथ, केंद्रीय मंत्री सडक एवं परिवहन के सम्मान में एक भोज ली मेरिडियन किंग एडवर्ड होटल (Le-Meridian King Edward Hotel) में दिया जाना था जिसकी सूचना अख़बारों और टी वी द्वारा जनता को भी दी गई थी, सिख संगठनों को जब इसका पता लगा तो उन्होंने समूह सिख समाज से कनाडा सरकार द्वारा १९८४ के सिखों के नरसंहार के एक प्रायोजक और दिल्ली के गुरुद्वारा रकाबगंज को आग लगाने, भीड़ को भडकाने और दो सिखों को जिन्दा जलाने के आरोपी कमल नाथ के सम्मानित किए जाने पर होटल के बाहर प्रदर्शन किया और कनाडा सरकार की भर्त्सना की, वहां की संसद के अधिकांश सदस्यों द्वारा सिखों का समर्थन किया गया और कमल नाथ की कनाडा यात्रा का विरोध किया, बहुत बेईज्जत हो कर ये भारत वापिस आए !
इसके
पश्चात जब इनका दौरा अमेरिका का बना तो वहां भी सिख समुदाय ने इनका कड़ा
विरोध किया और सिख्स फॉर जस्टिस नामी गैर सरकारी संगठन ने इनके खिलाफ
न्यूयोर्क की एक अदालत में मुकदमा दर्ज़ किया जो अभी विचाराधीन है!
जैक लेटन को मैंने एक इमेल भेजी थी और उनसे कमल नाथ के सम्मान में दिए जाने वाले भोज का बहिष्कार करने की प्रार्थना की थी, जिसके जवाब में उन्होंने यह पत्र मुझे भेजा था जिसकी प्रतिलिपि अपने पाठकों की जानकारी के लिए मैंने इस पुस्तक में भी लगा दी है!
जैक लेटन उस समय कनाडा की विपक्षी पार्टी न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता थे, बाद में कनाडा में २ मई २०११ में हुए चुनाव में उनकी पार्टी NDP को आधिकारिक रूप से विपक्षी पार्टी का दर्जा मिला, उन्होंने ऐतिहासिक जीत दर्ज़ की थी!
परन्तु भगवान को कुछ और ही मंजूर था, थोड़े ही समय में कैंसर (Prostate cancer) के कारण उनकी मृत्यु हो गई!
ऐसे मानवता प्रेमी और सहिष्णु नेता को हम अपनी श्रद्धांजली पेश करते हैं!
स्विट्जरलैंड (जनवरी 18, 2013): कमल नाथ के स्विट्जरलैंड दौरे पर (जो कि 23-27 जनवरी का है) आने से पहले ही “Sikhs For Justice” (SFJ) एवं स्विस NGO “Movement Against Atrocities & Repression” (MAR) की तरफ से एक शिकायत पत्र वहन के अटार्नी जनरल को दिया गया है जिसमें कमल नाथ पर 1984 द्वारा सिख कत्लेआम में लोगों की भीड़ को भड़काने, भीड़ की अगवाई करने सिखों को जिन्दा जलाने और सिखों के गुरुद्वारा साहिब को आग लगाने तथा मानव अधिकारों के उल्लंघन करने के गंभीर आरोप में इसे गिरफ्तार करने और इस पर इन आरोपों में मुकद्दमा चलाने की मांग की गई है! इसके लिए इन संगठनों द्वारा 11 प्रशठों (पन्नों) का एक हलफनामा (Affidavit) स्विट्जरलैंड की सरकार को सौंपा है जिसकी फोटो प्रतिलिपि आप नीचे देख सकते हैं,
इसके साथ ही दूसरी प्रतिलिपि में वहां के अटार्नी जनरल द्वारा इसे स्वीकार भी किया गया है, देखा जा सकता है!
कातिल अमिताभ बच्चन
अमिताभ बच्चन, भारतीय सिने जगत का एक चमकता सितारा और एक कातिल ? जी हाँ परन्तु कातिल तो वह कहला सकता है जिस ने एक, दो, तीन या अधिक क़त्ल किये हों? यह तो एक नर पिशाच है--- इसने १९८४ में सिखों का कत्लेआम करने के लिए भारतीय सरकार द्वारा संचालित एकमात्र टी वी चैनल दूर दर्शन का सहारा लिया ! अपने सीधे प्रसारण में इसने हिन्दुओं को सिखों का खून करने के लिए कहा! यह मात्र एक अफवाह नहीं--कड़वा सत्य है ! इसने दूर दर्शन पर आकर सिखों के विरुद्ध नारे लगाए कि," खून का बदला खून" और यह नारों का प्रसारण रुक रुक कर ३ दिन तक इस चैनल द्वारा प्रसारित किया गया !
अमिताभ
बच्चन एक 'एंग्री यंग मैन' के रूप में भारतीय जन मानस में अत्यधिक
लोकप्रिय था, इसके चाहने वालों में सभी वर्गों व धर्मों के लोग थे. इसका
सम्बन्ध भारत के शासक परिवार व तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी से था
और इसी लिए इसकी फिल्मों को सेंसर बोर्ड से शीघ्र अनुमति मिल जाती थी और इस
कारण यह अति शीघ्र लोकप्रियता की बुलंदियों पर जा बैठा, इसका किसी फिल्म
में होना ही सफलता की गारंटी बन गया था !
इंदिरा
गाँधी के कत्ल के पश्चात उनका बेटा राजीव गांधी प्रधान मंत्री नियुक्त
हुआ, उसने अपनी माँ का बदला लेने के लिए भारतीय सेना व पुलिस का दुरुपयोग
किया ! तीन दिनों तक कत्लों का सिलसिला जारी रहा !
कांग्रेस के कई मंत्रियों ने खुल कर इस ख़ूनी खेल में अपना सहयोग दिया जिसमें से कुछ नाम हैं---हरि किशन लाल भगत, जगदीश टाईटलर, सज्जन कुमार, कमल नाथ, ललित माकन, धर्म दास शास्त्री और अमिताभ बच्चन !
बाकी सब तो अपने अपने इलाके के कुत्ते थे जिन्होंने अपने- अपने इलाकों में कत्लेआम करवाया परन्तु अमिताभ - जो कि सिने जगत का एक जाना पहचाना नाम था, इसने सर्व प्रथम टी वी पर आकर जो संदेश दिया (घ्रणित), उस से सम्पूर्ण भारत में अनेक शहरों में, रेल गाड़ियों में, बसों में सिखों पर जानलेवा हमले हुए ! पूरे देश में लग भग २०,००० से ज्यादा सिखों को कत्ल किया गया! इस प्रकार इस नर पिशाच की खून की प्यास बुझी (बुझी कि नहीं - यह भी उसे ही पता होगा) ! अनगिनत सिख महिलाओं के साथ दुष्कर्म किया गया, उनके बच्चों को भी नहीं छोड़ा गया, उन्हें भी जलाया गया (जिस का प्रमाण तस्वीरों में स्पष्ट है), उनकी चल व अचल सम्पत्ति को आग लगा दी गयी या लूट लिया गया !
अमिताभ बच्चन भारतीय सिने जगत के एक चमकता सितारा ---जो कि इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद ३१ अक्टूबर की शाम को दिल्ली पहुंचा था! हमारी अपुष्ट जानकारी में (फेस बुक पर एक मित्र द्वारा यह जानकारी दी गई थी) तो यह भी आया है कि दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर उतरते ही इस का सामना एक सिख सिक्युरिटी पर्सनल से हुआ, उसने इसका अभिवादन किया परन्तु इस ने पलट कर उसके एक थप्पड़ जमा दिया और कहा कि तुम सिखों ने हमारी माँ को मारा है, तुम्हें भी जिन्दा रहने का कोई अधिकार नहीं! हम इसकी पुष्टि तो नही करते लेकिन जानकारी अवश्य दे रहे हैं!
एक सिख बच्ची, जिसे हिन्दुओं द्वारा आग में ज़िंदा जलाने की कोशिश की गई
एक सिख बच्ची, जिसे १९८४ में हिन्दुओं द्वारा जीवित ही आग के हवाले कर दिया गया था
इंदिरा गाँधी के पोते राहुल और पोती प्रियंका को अमिताभ बच्चन की माता तेजी बच्चन की सुरक्षा में दे दिया गया था क्योंकि यह परिवार इंदिरा का नजदीकी और विश्वास पात्र था! तेजी बच्चन भी सिख परिवार से संबंध रखती थीं लेकिन एक विधर्मी कायस्थ हरिवंश राय बच्चन से शादी करके सिख धर्म छोड़ चुकी थी! अमिताभ को फिल्म संसार में लाने का श्रेय भी इंदिरा को ही जाता है जिसने अमिताभ को ख्वाजा अहमद अब्बास के पास फिल्म में भूमिका देने के लिए एक सिफारिशी पत्र के साथ बंबई भेजा था जिस कारण अमिताभ को 'सात हिन्दुस्तानी' नामक फिल्म में एक दूसरे दर्जे के किरदार का रोल मिला था! जब " मार-धाड से भरपूर फिल्म 'जंजीर' रिलीज़ हुई थी तो इंदिरा के प्रभाव के कारण ही सेंसर बोर्ड ने इसे पास भी कर दिया था, अन्य किसी स्टार को यह सुविधा प्राप्त नहीं थी! इस कारण अमिताभ इंडिया के 'एंग्री यंग स्टार' बन गए! अब समय था कि उस कर्ज़ को उतारा जाए?
भारत का अकेला लेकिन सरकारी टी वी चैनल दूर दर्शन दिल्ली के तीन मूर्ति भवन (जवाहरलाल नेहरु का सरकारी आवास) में इंदिरा गाँधी के शव और उन्हें आखिरी श्रद्धांजली देने आ रहे विशिष्ट एवं अन्य जन साधारण को कैमरे में कैद कर रहा था! राजीव गाँधी और अमिताभ बच्चन भी हमें वहां के कारीडोर (गलियारे) में आपस में बात करते दिखाई दिए! अचानक ही राजीव गाँधी ने अमिताभ बच्चन के कानों में कुछ कहा और अमिताभ वहीं गलियारे में टी वी कैमरे की ओर बढ़ गए और फिर वह हुआ जिसकी मैंने कभी कल्पना भी न की थी, मैं सिर्फ स्तब्ध रह गया जब मैंने अमिताभ बच्चन को टी वी पर हिन्दुओं से सिखों का खून मांगते देखा?
और तब अमिताभ गलियारे में १० - १५ कदम चलते दिखाई दिए जो अपना हाथ की मुट्ठी बंद करके हवा में लहराते हुए अपने क्रोधित अंदाज़ में नारे लगा रहे थे....'खून का बदला खून! खून का बदला खून!' इन खून मांगते नारों के साथ वे १० - १५ कदम की दूरी तक आते और जाते दिखाए गए! इस विडियो क्लिप को बार-बार तीन दिनों तक इस सरकारी चैनल द्वारा तक लगातार दिखाया गया ! इस वीडयो ने आग में घी का काम किया, सारे देश में अमिताभ ने सिखों के कत्ल करवा डाले! इन निर्दोष सिखों की अबला स्त्रियों से बलात्कार किए गए, उन्हें बेईज्जत किया गया! हिन्दुओं की घृणित मानसिकता---पाशविकता देखने को तब मिली जब इन्होने मासूम स्त्रियों के साथ बलात्कार उनके निरीह बच्चों और उनके मृत पतियों तथा भाइयों और आदि की लाशों के सामने किया!
मैं स्तब्ध था, काटो तो खून नही था! मैं सोच रहा था कि क्या इसके प्रशंसक सिर्फ हिन्दू थे?क्या यह वही अमिताभ बच्चन था जो कल तक एक फेल सितारा था, जिसकी हर फिल्म बॉक्स आफिस पर पिट जाती थी! फिर भी हम इसकी फ़िल्में देखते थे क्योंकि कुछ फिल्मों में इसने प्रशंसनीय काम भी किया था जैसे आनंद! तो क्या हम किसी गिनती में नहीं थे और यह एक कट्टर हिन्दू हो कर सिर्फ हिन्दुओं का ही फ़िल्मी सितारा था? तब मुझे घृणा हो गई इससे!
स्पष्ट था कि यह एक कट्टर हिन्दू था और सिखों को अपनी घृणा का शिकार बना रहा था!वह सारे देश में सिखों का कत्ल किए जाने के लिए हिन्दुओं को उकसा रहा था और हम निरीह प्राणियों की तरह हाथ पर हाथ रखे बैठे थे? कुछ कर न सकने की लाचारी ने हमें रुला अवश्य दिया था, हमें अपने भारतीय होने पर भी शर्म आ रही थी! यह सिख तो थे जिन्होंने अपने खून देकर भारत को आज़ादी दिलवाई, इससे पहले सिखों के कारण ही हिन्दू धर्म भी बचा था नही तो यह भी संसार का एक बड़ा मुस्लिम देश होता और हिन्दू नाम की चीज़ यहाँ दिखाई न देती फिर भी इतना बड़ा विश्वासघात इन हिन्दुओं ने सिखों के साथ किया? विश्वास नही हो पा रहा था लेकिन सत्य तो आँखों के सामने था!
अहसान फरामोश हिन्दू गुरुद्वारा सीसगंज पर आक्रमण कर आग लगाने के बाद ... ये भूल गए कि यहाँ सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपने अनुयाइयों के साथ अपना बलिदान दिया था!
सिख भाइयों की लाशें जो बेचारे अमिताभ की घृणित पुकार खून का बदला खून का शिकार बने
अमिताभ की इस घृणित अपील के कारण सारे देश में लगभग २०,००० निर्दोष सिखों की हत्याएं हुईं! सिखों की चल व अचल संपत्ति को लूट लिया गया या आग के हवाले किया गया! उनके व्यवसायिक प्रतिष्ठानों को भी आग के हवाले किया गया! उनके घरों को भी लूटा गया इस तरह १९४७ के बाद दूसरी बार वे पैसे पैसे को मोहताज़ कर दिए गए! केवल दिल्ली में ही तीन दिनों तक हत्या का तांडव चलता रहा जिनकी सरकारी गिनती केवल २७३३ बताई जाती है लेकिन अपुष्ट समाचारों के अनुसार यह गिनती १०,००० के आस-पास हो सकती है! इस शख्स अमिताभ बच्चन के खिलाफ दो वर्गों में वैमनस्य स्थापित करने, जनता की संपत्ति को नुकसान पहुँचाने और देश को पुन: बंटवारे की स्थिति में लाने पर भी कोई मुकद्दमा दर्ज़ नहीं हुआ क्योंकि इसके कई कारण थे परन्तु आज भी यह सरकारी सुरक्षा में सारा संसार घूमता है, इसके खिलाफ भारतवर्ष में कोई मुकद्दमा चलाना लगभग असंभव ही है!
रेलगाड़ियों में निर्दोष सिख यात्रियों की हत्याएं करते हुए हिन्दू
रेल की बोगियों में पड़ीं सिख भाइयों की लाशें ---गवाह हैं 1984 के सिखों के सरकारी नर संहार की
काश हमारा भी कोई अपना देश होता जो इस समय हमारी मदद करता, हमारे लिए आवाज़ उठाता तो भारत सरकार की यह सिखों के सामूहिक कत्ल करने की हिम्मत न होती, तब से इस देश को हमने अपना नही कहा, नही माना!
काश हमारा भी कोई अपना देश होता जो इस समय हमारी मदद करता, हमारे लिए आवाज़ उठाता तो भारत सरकार की यह सिखों के सामूहिक कत्ल करने की हिम्मत न होती, तब से इस देश को हमने अपना नही कहा, नही माना!
जब लोग मुझसे प्रमाण मांगते हैं कि कोई वीडियो दिखाओ जिसमें अमिताभ को हिन्दुओं को भड़का कर सिखों का खून मांगते दिखाया गया हो तो मैं उन के चेहरे ही देखता हूँ कि क्या वे मूर्ख है या अधिक चतुर? अरे! उस समय हमारी अपनी सरकार ही हमारी जान की दुश्मन बनी हुई थी! हमारा नर संहार करने वाले कोई और नहीं, हमारे अपने ही बन्धु-बांधव थे जिनसे सदियों को प्रेम था! केवल राजनीति के दुष्चक्र ने इन्हें गुमराह किया और ये हिन्दू ही हमारी पीठ में छुरा भोंक गए? फायर ब्रिगेड को हुक्म दिया गया था कि सिखों के घर पर आग लगी होने की खबर आने पर उसे स्वीकार न किया जाए, किसी कारण वश यदि जाना भी पड़े तो पानी पड़ोस के हिन्दू घरों पर डाला जाए जिससे आग न फैल सके लेकिन सिखों के जलते हुए घरों पर पानी न डाला जाए! अगले पल का पता नही था, हम अपनी और अपने परिवार की रक्षा में व्यस्त थे, किसके पास फुर्सत थी कि अमिताभ की आवाज़ रिकार्ड करता? वीडियो रिकार्डिंग की बात तो आप भूल ही जाइये क्योंकि वीडियो कैमरे हर घर में न थे, मोबाईल फोन का अविष्कार न हुआ था तो इसकी रिकार्डिंग कोई कैसे करता? सिखों से तो यह संभव न था, यदि किसी और के पास हो तो मैं कह नही सकता लेकिन दूर दर्शन के पास यह वीडियो क्लिप मौजूद है जिसे केवल उच्चतम न्यायालय के आदेश पर ही देखा जा सकता है!
ऐसा भी नहीं है कि किसी ने अमिताभ बच्चन को टी वी पर नारे लगाते न सुना हो? हजारों ने देखा विशेषत: उन में से अधिकांश ने जो दिल्ली के बाहर अन्य शहरों में रहते थे, ने देखा था परन्तु यदि वे बताएं भी तो किसे, कोई कार्रवाई तो होनी नहीं थी, कोई सुनवाई नहीं थी! मुझे २५ वर्ष लगे परन्तु कहीं कोई सुनवाई नही हुई! तब मुझे ख्याल आया कि मंगल पांडे को १८५७ की क्रांति का श्रेय जाता है---आखिर उस अकेले ने ही अंग्रेजों को जवाब देने की हिम्मत की थी---क्रांति की शुरुआत के लिए तो केवल एक चिंगारी ही काफी होती है तो जब मैंने स्वयं ने अमिताभ बच्चन को टी वी पर हिन्दुओं को भड़काते देखा है तो मैं स्वयं ही अदालत में इसके खिलाफ कोई केस क्यों न करूं? केस करने के लिए वकीलों की फीस बहुत थी जो मैं अदा नहीं कर सकता था तो मैंने फिर कुछ दोस्तों की सलाह पर दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खट खटाया! १९-०९-२००९ को मैंने एक पब्लिक इंटेरेस्ट लिटिगेशन दिल्ली उच्च न्यायालय में दाखिल की!
२४-१०-२००९ को ही माननीय जज साहब (मन मोहन कुमार) ने इसे देरी से केस करने पर सुनवाई नही हो सकती, की लिखित टिप्पणी के साथ सुनवाई से इंकार कर दिया, अब दुबारा रिवीजन फ़ाइल करने के लिए पैसा चाहिए था, किसी वकील ने मेरा केस मुफ्त में नही लड़ा, शायद वे अंदर से भयभीत थे!
मैंने दूर दर्शन से १ नवंबर १९८४ की वीडियो क्लिप की सी डी की कापी मांगी लेकिन उन्होंने देने से इंकार किया तब मैंने इंटरनेट पर जाने का निश्चय किया! जब मैंने देखा कि अदालत में केस लड़ पाना मेरे लिए असंभव ही है तो मैंने इंटरनेट सीखा और फिर अमिताभ से संबंधित सारी सामग्री डाल दी, लोग आश्चर्य चकित थे, उन्हें ऐसी कोई जानकारी न थी! मुझसे पहले करनैल सिंह पीर मोहम्मद नाम के एक आल इंडिया सिख स्टुडेंट्स फेडरेशन के प्रधान ने यह अवश्य बोला था परन्तु उनके पास भी कोई पुख्ता गवाह नही था! मेरे सच बोलने से उनके आन्दोलन में एक नई जान आ गई! पिछले केवल तीन वर्षों में ही हमने सारे संसार को इस अमिताभ का काला चेहरा दिखा दिया है, अब यह संसार के जिस देश में भी जाता है, इसके खिलाफ वहां प्रदर्शन होते हैं, इस का विरोध किया जाता है, इसे हत्यारा कह कर पुकारा जाता है. जो सफलता मुझे शायद अदालत में न मिलती, उससे कहीं अधिक सफलता मुझे नेट पर मिल गई है! यह टोरोंटो, कनाडा इसी विरोध के डर से नही गया और इसने आई आई ऍफ़ ए की प्रधानगी छोड़ दी, सिख्स फॉर जस्टिस नामक गैर सरकारी संगठन ने अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा से मुलाकात करके उन्हें एक ज्ञापन सौंपा जिसमें भारत में १९८४ में सिख कत्लेआम करवाने वाले कांग्रेसी नेताओं के नाम लिखे थे! इस लिस्ट में अमिताभ बच्चन का भी नाम था!
फिर यह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी इंग्लैण्ड गया, और बी बी सी, टी वी वन पर अपनी फिल्म 'पा' के प्रोमोशन के लिए गया, इसे सिखों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा, फिर यह क्वींस लैंड यूनिवर्सिटी, आस्ट्रेलिया गया जहाँ इस पर भारत में १९८४ में सिखों के कत्ल किये जाने में इसका हाथ होने के अभियोग में एक मुकद्दमा दर्ज़ किया गया, फिर इसी वर्ष २०१२ में यह इंग्लैण्ड गया था, ओलिम्पिक की मशाल लेकर दौड़ने, लेकिन वहां भी सिखों ने सडकों पर इसका विरोध किया और ‘मर्डरर - मर्डरर’ के नारे लगा कर इसका विरोध किया! इसने एक एप्लीकेशन सिखों के सर्वोच्च तख्त श्री अकाल तख्त पर भेजी और १९८४ के सिख कत्ले आम में अपना हाथ होने से इंकार किया लेकिन सबूत तो हम सामने हैं, इसके झूठ बोलने से क्या होता है, सच तो सौ पर्दे फाड़ कर भी बाहर आ जाता है!
यदि दिल्ली तथा देश के अन्य भागों में शैतान हिन्दू जो किसी धार्मिक प्रेरणा से नहीं अपितु कांग्रेस की शातिर धार्मिक विद्वेष की भावना के शिकार हो कर निर्दोष सिखों का कत्ल कर रहे थे और सिख गुरुओं के उपकार भूल कर समस्त हिन्दू धर्म को कलंकित कर रहे थे तो वहीं सहिष्णु, धार्मिक पृवृत्ति वाले एवं मानवता के पुजारी ऐसे हिन्दू भाइयों तथा बहनों की भी कमी नहीं थी जिन्होंने अनगिनत सिख परिवारों को इन दरिंदो से बचाया और अपने घरों में पनाह दी, उन की सेवा की, उन्हें खिलाया-पिलाया तथा दरिंदों से जान का खतरा होते हुए भी अपने सिख पड़ोसियों या अनजाने सिखों की जिन्दगी बचाई, उन सब के हम आभारी अवश्य हैं और नतमस्तक हैं उन सभी जाने अनजाने हिन्दू परिवारों के!
श्री बजरंग सिंह
परन्तु फिर भी उन दो परिवारों का उल्लेख मैं अवश्य करना चाहूँगा, (जिनकी मुझे जानकारी मिली) एक थे श्री वेद प्रकाश जायसवाल जी पूर्वी दिल्ली शाहदरा से और दूसरे माननीय श्री बजरंग सिंह जी, जो कि एक धनाढ्य परिवार से संबंध रखते थे और मध्य दिल्ली के निवासी थे, उनकी उस समय दिल्ली में १९ बसें चलती थीं ! उन्होंने जब निर्दोष सिखों का कत्लेआम होते देखा और छोटे छोटे बच्चों और सिख स्त्रियों को सडकों पर रोते बिलखते देखा तो मानवता के इस पुजारी और देव पुरुष ने उन्हें अपने घर में शरण दी, रोटी पानी के साथ भरपूर सेवा की, जख्मियों की सेवा सुश्रूषा भी स्वयं ही की, दवाइयां आदि भी अपने खर्चे पर उपलब्ध करवाईं ! कांग्रेस सरकार जिसने इस कत्लेआम को अंजाम दिया था, भला यह कैसे बर्दाश्त कर सकती थी, उसने अपने जुल्मों का घेरा इस मानवता के पुजारी देव पुरुष पर कसना शुरू कर दिया !
पहले तो इसके जाट ड्राइवर इसे छोड़ कर चले गए, फिर इसके दामाद आगे आए और उन्होंने स्वयं बसें चलाकर जहाँ भी कोई सिख परिवार दिखाई दिया, उसे अपने घर ले कर आए और उसकी देखभाल की! सरकार ने बजरंग सिंह की बसों का बैंको का कर्ज़ उतारने के लिए केवल एक महीने का समय दिया, इतने कम समय में इतनी बसों का कर्ज़ उतरना संभव नहीं था, अत: सरकार द्वारा इन बसों को जब्त कर लिया गया! भूखे रह कर भी इस देव पुरुष ने अपने फर्ज़ को निभाया, अपनी पत्नी के गहने बेच कर भी सिख परिवारों की सेवा सुश्रुषा करता रहा! धन्य है वह माता जिसने ऐसे देव पुरुष को जन्म दिया!
आज श्री बजरंग सिंह जी तो इस दुनिया में नहीं हैं परन्तु उनका परिवार अत्यंत गरीबी में रहकर भी अपने पिता पर गर्व महसूस करता है, कभी भी वे पश्चाताप नहीं करते ! हम सबको श्री बजरंग सिंह के जीवन से और उनके परिवार से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए ! हमें सिख गुरुओं द्वारा प्रदत्त यह शिक्षा कभी भी नहीं भूलनी चाहिए कि "मानस की जात सभै एकै पहिचानबो !' हम परमपिता परमात्मा से यह प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु। अपनी कृपा करो, श्री बजरंग सिंह जी की दिवंगत आत्मा को अपने श्री चरणों में निवास बख्शो और उनके परिवार को सभी खुशियाँ दो, हमें भी इस पुनीत मार्ग पर चलने की सामर्थ्य दो जिससे हम भी मानवता की सेवा किसी भेदभाव के बिना कर सकें!
श्री वेद प्रकाश जायसवाल
श्री वेद प्रकाश जायसवाल जी की भी यही कहानी है, उनके सुपुत्र श्री राजीव जायसवाल एक चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं और आज भी सिख परिवारों से उनके गहरे दोस्ताना एवं पारिवारिक संबंध हैं! हमारा जायसवाल परिवार को शत शत प्रणाम!
सज्जन कुमार
कांग्रेस के बाहरी दिल्ली से संसद सदस्य सज्जन कुमार परन्तु जिनकी दुष्टता दुर्जनों को भी मात दे दें — अपने कार्यकर्ताओं को सिखों की हत्या के लिए हथियार बाँटते हुए
इनके कार्य कलापों की तो विस्तृत जानकारी पत्रकारों तथा मीडिया को मिल चुकी है, इन्होने एक सिख के कत्ल करने वाले को शराब की बोतल और १०० रूपये इनाम में बांटे थे! (दोषी कौन" and in English "Who is guilty")[http://guiltyof1984.blogspot.com/]) मुगलों के समय भी सिखों के सिरों पर इनाम थे (और आज स्वतंत्र भारत में भी सिखों के सिर पर इनाम देने की परिपाटी चल रही है, मुगलों के वंशज इंदिरा गाँधी का परिवार जो दिल्ली के तख्त पर प्रजातन्त्र की आड़ में शासन कर रहा है! इस दुष्ट पर आज भी २८ साल बाद भी मुकद्दमा चल रहा है! मालूम है कि इसे सज़ा नही होगी और न्याय का केवल ढोंग किया जा रहा है!
मंगोलपुरी, सुल्तानपुरी आदि बाहरी दिल्ली में सिखों की नृशंस हत्याएं करवाने, उनकी विधवाओं से बलात्कार करवाने और उनके घरों, चल व अचल संपत्ति को लूटने या आग लगवाने में इसी दुष्ट का हाथ था! इस ने कातिलों के दस्तों की स्वयं अगुआई भी की थी! दिल्ली की सबसे सुरक्षित समझी जाने वाली दिल्ली कैंट में भी इसने भीड़ की अगुआई की थी जिसे जगदीश कौर नामक महिला ने अपनी गवाही में इस पर आरोप लगाये हैं! भारत की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने भी इस पर आरोप तय कर दिए हैं फिर भी यह कांग्रेस का एक नामी मोहरा है---इसे सज़ा मिलनी लगभग नामुमकिन ही है!
जगदीश टाईटलर
यदि कमलनाथ अपनी गिरफ्तारी के भय से अमेरिका नही जा सकता तो यही हाल जगदीश टाईटलर का भी है! दिल्ली में हुए कामनवेल्द खेलों का प्रभारी होने पर भी यह इंग्लैण्ड नही गया था क्योंकि इसे वहाँ गिरफ्तारी का भय था! देखें इस का सबूत:
नानावती कमीशन ने जगदीश टाईटलर को १९८४ के सिख कत्लेआम में इस पर लगाये गए अभियोगों को विश्वसनीय करार दिया था और टिप्पणी की थी कि इस (जगदीश टाईटलर) का इन कत्लों के करवाने में हाथ होने की संभावना बहुत अधिक है! लेकिन किन्हीं कारणवश भारत सरकार ने ठोस सबूतों के अभाव में इस पर कोई भी मुकद्दमा चलाने या कार्रवाई करने से इंकार कर दिया था!
नानावती की अंतिम रिपोर्ट १८५ पन्नों की थी! इस कमीशन ने अपनी अंतिम रिपोर्ट २००४ में भारत सरकार को सौंपी थी! इस रिपोर्ट में दिल्ली के सीनियर कांग्रेसी नेताओं जिनमें जगदीश टाईटलर जो बाद में केन्द्रीय मंत्री भी बनाया गया, संसद सदस्य सज्जन कुमार और हरी किशन लाल भगत (जो काल कवलित हो चुका है), पर प्रस्तुत सबूतों के आधार पर आरोप तय किए गए! इन पर भीड़ को इंदिरा गाँधी की हत्या का बदला लेने के लिए हिन्दुओं को भड़काने, सिखों को अपने चुनाव क्षेत्रों में कत्ल करवाने के गंभीर आरोप लगाये गये थे! इन आरोपों के चलते १० अगस्त २००५ को केंद्रीय मंत्री परिषद द्वारा जगदीश टाईटलर को मंत्री पद से अपदस्थ करने पर मजबूर होना पड़ा था!
जगदीश टाईटलर दिल्ली के सदर क्षेत्र से संसद का प्रतिनिधित्व करते हैं! ६ नवंबर १९८४ को दिल्ली के पुलिस कमिश्नर सुभाष टंडन की प्रेस कांफ्रेस में ये अनाधकृत रूप से हाज़िर हुए! उपस्थित एक पत्रकार की रिपोर्ट के मुताबिक इन्होने पुलिस कमिश्नर को लगभग डांटते हुए कहा कि वे उनके व्यक्तियों को गिरफ्तार करके दंगा पीड़ितों को मदद पहुंचाने के कार्य में रुकावट डाल रहे हैं! (“दोषी कौन" तथा अंग्रेजी में"Who is guilty")[http://guiltyof1984.blogspot.com/]
आश्चर्य तो तब हुआ जब भारत के केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने इन्हें सभी आरोपों से मुक्त करते हुए कलीन चिट दे दी! जबकि प्रमुख गवाह ज्ञानी सुरिन्दर सिंह ने जीवित रहते हुए इनके खिलाफ अमेरिका से बयान दिया था, भारत में इन्होने अपनी जान का खतरा बताया था और यही हुआ भी! भारत में एक गंभीर बीमारी के चलते उनकी मृत्यु हो गई थी! अब फिर से इनके खिलाफ मुकद्दमा विचाराधीन है परन्तु भारत सरकार के इस चेहेते मंत्री को कांग्रेस पार्टी ने उड़ीसा कांग्रेस का प्रभार दिया है!
ज्ञानी
सुरिन्दर सिंह जो कि उस गुरुद्वारा के मुख्य ग्रंथी भी हैं, जिस पर टाईटलर
के गुंडों ने हमला भी किया था! कमीशन का मानना है कि; उसने कहा है कि श्री
जगदीश टाईटलर ने भीड़ को सिखों को कत्ल करने तथा गुरूद्वारे को आग लगाने
के लिए भड़काया था! उसकी गवाही के अनुसार इसके बाद भीड़ ने गुरूद्वारे में
आग लगा दी थी और सिखों को कत्ल भी किया था! एक बादल सिंह नामक सिख व्यक्ति
को जीवित ही जला दिया गया था! उसने अपने बयान में यह भी कहा है कि जगदीश
टाईटलर ने उससे १०-११-८४ को संपर्क किया था और उसे दो कागजों पर हस्ताक्षर
करने के लिए कहा था (जैसे कि उसने एक अन्य शपथ पत्र (एफिडेविट) में उस दिन
टाईटलर को वहां न देखे जाने की बात कही थी!
इन्डियन एक्सप्रेस के कालम लेखक श्री डी के सिंह लिखते हैं कि; टाईटलर का केस कई प्रश्न उत्पन्न करता है! क्या कांग्रेस पार्टी इस एक व्यक्ति के बिना पंगु है जिसका अपना कोई महत्वपूर्ण इतिहास नही है? ऐसा कुछ विशेष भी उसके ऊपर लिखने के लिए नहीं जिस पर वह कांगेस पार्टी की प्रशासनिक या संगठन इकाई को कोई मजबूत आधार दे सके! उसका तो अपना ही कोई जनाधार नही है! यदि यह नेहरु परिवार के प्रति विश्वसनीयता ही है तो सवाल यह पैदा होता है कि उसने यह विश्वसनीयता किस आधार पर स्थापित की?
इससे बड़ा धक्का किसी को क्या लगेगा जब वह जानेगा की भारत की सर्व श्रेष्ठ जांच एजेंसी केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो भी २५ साल बाद भी इस हत्यारे के खिलाफ सबूत ढूंढ नहीं पाई हैं और फिर यही एजेंसी न्यायपालिका का कार्य अपने हाथ में लेती हुई इसे सभी आरोपों से मुक्त कर देती है! क्या इसे जांच एजेंसी की विफलता कहा जाए या हास्यास्पद कहा जाए! आप ही निर्णय कीजिए!
हमारे भारतवर्ष के सिख प्रधान मंत्री की १९८४ के सिख कत्ले आम के योजनाकारों में से एक प्रमुख और निर्दोष सिखों की हत्याओं के आरोपी इस हत्यारे जगदीश टाईटलर पर दी गई राय देखिए?
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो द्वारा सं २००७ में जगदीश टाईटलर के खिलाफ अपनी सभी जांच समाप्त कर दी थीं, कारण भी बड़ा ही हास्यस्पद ही था किउन्हें ३१ अक्टूबर १९८४ को इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिखों के कत्ले आम में इसके शामिल होने, इसके द्वारा भीड़ को भडकाने, नेतृत्व करने या सिखों की हत्याएं करवाने के तमाम आरोपों में इस के खिलाफ़ कोई सीधे सबूत नही मिले हैं इस लिए इसे सभी आरोपों से मुक्त किया जाता है जबकि इसी शख्स ने अपने क्षेत्र में सिखों के कम गिनती में मारे जाने पर क्षोभ व्यक्त किया था और अपने समर्थकों से यह भी कहा था कि इससे भारतीय राष्ट्रिय कांगेस में उसकी साख गिर गई है (इज्जत कम हुई है) यानि कि जिसने ज्यादा सिखों के कत्ल किए या करवाए वही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का हीरो (नायक) था! फिर भी इसे सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया?
भजन लाल
भजन लाल हरियाणा प्रान्त के मुख्य मंत्री थे! वे दो बार मुख्य मंत्री रहे, पहले २८ जून १९७९ से ५ जुलाई १९८५ तक, और दूसरी बार २३ जुलाई १९९१ से ११ मई १९९६ तक!
वे राजनीती में तीसरे दर्जे के राजनीतिज्ञ थे और अपनी 'आया राम गया राम' वाली छवि के कारण प्रसिद्ध थे! वे जाटों के खिलाफ थे और हरियाणा प्रान्त के भी सगे नहीं थे, उन्हें सिर्फ अपनी कुर्सी से प्यार था और इसके लिए वे किसी भी हद तक गिर सकते थे! हरियाणा प्रान्त में रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार इन्हीं की कृपा से फला फूला! इनके एक पुत्र ने इस्लाम धर्म ग्रहण किया और नाम रखा - चाँद मुहम्मद, और चंदीगढ़ की एक वकील महिला को भी मुस्लिम बना कर (फिजा) शादी कर के कुछ ही समय बाद मन भर जाने पर उसे तलाक भी दे दिया था, हाल ही में इस महिला की मृत्यु हुई है, जांच जारी है कि कत्ल हुआ या प्राकृतिक मृत्यु? इनके दूसरे पुत्र को उनकी अपनी ही पार्टी के विधान सभा सदस्यों द्वारा साथ नही दिया गया और वे सिर्फ हरियाणा के एक विधान सभा सदस्य ही बन कर रह गए!
भजन लाल एक अवसरवादी नेता था! हिंदुस्तान का वह अकेला ऐसा भ्रष्ट नेता था जिसने अपनी सारी जनता पार्टी के विधायकों के साथ, इंदिरा गाँधी की १९८० में सत्ता में वापसी करते ही रातों-रात दल बदल कर कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गया था! भूत्पोर्र्व केंद्रीय मंत्री बूटा सिंह ने इस पर आरोप लगाया था कि यह न केवल होंद-चिल्लड़ (रिवाड़ी के समीप) में ३२ सिखों के कत्ल करवाने में इसका हाथ था अपितु उस मामले को रफा-दफा भी इसी ने करवाया था! इसके साथ ही पटौदी में भी निर्दोष सिखों का कत्ल हुआ था और सिख युवतियों से बलात्कार के समाचार भी मिले थे लेकिन हरियाणा के मुख्य मंत्री होते हुए भी इन्होने कोई कार्रवाई नहीं की थी! सरदार बूटा सिंह जी ने यह भी आरोप भजन लाल पर लगाया था कि इसने हरियाणा के मुख्य मंत्री रहते हुए केंद्रीय सरकार और सिखों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा दिया जैसा कि दिल्ली में १९८२ में हुए एसिआद खेलों में इसने हरियाणा पुलिस के मदद से, पंजाब से दिल्ली खेल देखने आ रहे सिख युवकों को करनाल के समीप मुख्य हाई वे पर बेवजह कत्ल करवा दिया था!
भजन लाल ने हरियाणा के मुख्य मंत्री रहते हुए वहां सिखों पर बेतहाशा जुल्म किए और मानवाधिकारों का हनन किया! नवंबर १९८२ के एशियाई खेल जिन्हें दिल्ली में प्रायोजित किया जा रहा था, भजन लाल ने घोषणा की कि उन खेलों को देखने जाने वाले सिखों की दिल्ली में प्रवेश से पूर्व जामा तलाशी की जाए और जांच की जाए कि वे आतंकवादी हैं या नहीं? सिखों से बहुत निंदनीय व्यवहार किया गया, उन्हें जगह जगह तलाशी के बहाने परेशान किया गया, हरियाणा पुलिस द्वारा उनको बेईज्जत किया गया! यहाँ तक कि भूतपूर्व विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह, सेवा निवृत एयर चीफ मार्शल अर्जुन सिंह, सेवा निवृत लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा को भी भी इन्हीं परिस्थितियों से गुजरना पड़ा! ऐसी बेईज्जती, गैर जरूरी पूछताछ और मानसिक परेशानी के बावजूद किसी राजकीय या केंद्रीय सरकार ने इसकी भर्त्सना नहीं की, बुद्धिजीवी वर्ग ने या पत्रकारों ने कोई आवाज़ इस जुल्म के विरोध में नहीं उठाई! कांग्रेस के किसी सिख नेता ने इसके विरोध में अपना इस्तीफा नहीं दिया! यदि इस सब बेईज्जती और निर्दोषों के कत्ल पर कुल जमा निष्कर्ष जो निकला वह केवल यही था कि सिख इस देश में गुलाम हैं और उनकी कोई आवाज़ नहीं सुनी जाएगी!
इन सब जुल्मों के अतिरिक्त इसके स्वयं के हाथ भी सिखों के खून से रंगे हुए थे क्योंकि इसने अनेकों निर्दोष सिख युवकों को नकली मुठभेड़ों में कत्ल करवा दिया था! अपने राज्य हरियाणा में सिखों को बेईज्जत करने के लिए इस ने पुलिस अधिकारीयों को निर्देश दे रखे थे कि वे सिख युवकों को पकड़ कर उनकी दाढ़ियाँ एक तरफ से मूंड दें, इस दुष्ट द्वारा अनेकों गुरुद्वारों पर हमला करवाने के आरोप भी हैं!
ललित माकन......
कांग्रेस का एक युवा नेता था, इस पर आरोप हैं कि इसने भी १०० रुपये प्रत्येक सिख की हत्या के बदले में बांटे थे और एक-एक शराब की बोतल भी उन हत्यारों को दी थी! दो बहादुर सिख युवकों हरजिंदर सिंह जिन्दा और भाई सुखदेव सिंह सुक्खा ने इसे इसके घर राजौरी गार्डन दिल्ली में मौत के घाट उतार दिया था और १९८४ के निर्दोष कत्ल हुए सिखों की तडपती आत्मा को किसी हद तक संतुष्टि प्रदान की थी! इसकी घरवाली गीतांजली ने इसे बचाने की कोशिश की जिसमें उसे भी गोलियां लगी और वह भी इस नराधम के साथ मृत्यु को प्राप्त हुई !
इसे इसकी सफेद रंग की अम्बेसेडर कार में आजादपुर में देखा गया था जहाँ यह भीड़ को निर्देशित कर रहा था, और सिखों की दुकानों को आग लगाने को भी कह रहा था!
"दोषी कौन" and in English " Who is guilty") [http://guiltyof1984.blogspot.com/] से साभार
धर्म दास शास्त्री
...........भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का एक उच्च स्तरीय नेता था! १९८४ में यह दिल्ली के करोल बाग इलाके से लोक सभा का सदस्य था! १९८४ के सिख कत्लेआम में इसके हाथ में सिखों के घरों की पहचान करने के लिए वोटर लिस्ट थीं और इसके साथ प्रकाश नगर के मेट्रोपोलिटन सदस्य महेंद्र कुमार तथा वार्ड नंबर ३२ के म्युनिसिपल सदस्य मंगत राम भी थे! अगस्त १९९३ में जैन अग्रवाल जांच कमेटी द्वारा धर्म दास शास्त्री के खिलाफ भीड़ को नेतृत्व देने और भडकाने के आरोप में मुकद्दमा दर्ज़ करने की सिफारिश भी की गई थी!
नोट: हमने बहुत कोशिश की लेकिन हमें इस दुष्ट धर्म दास शास्त्री की कोई तस्वीर नहीं मिल सकी, यदि मिली तो अगले एडीशन में अवश्य छाप देंगे!
५ नवबर को समाचार पत्रों में छपी खबरों के अनुसार धर्म दास अन्य कांग्रेसी नेताओं के साथ करोल बाग पुलिस थाने के SHO पर यह दबाव दल रहे थे कि लूट पाट के आरोप में पकड़े व्यक्तियों को छोड़ दिया जाए क्योंकि वे उनके आदमी थे! परन्तु एक पत्रकार संजय सूरी http://ibnlive.in.com/blogs/sanjaysuri/259/53922/1984-riots-the-lives-of-others.html ने लिखा है कि उसने धर्म दास शास्त्री को डिप्टी पुलिस कमिश्नर आमोद कंठ से उलझते देखा था और इसका साथ भी हुकम चंद जाटव जो कि आमोद कंठ के उच्चाधिकारी थे, वे दे रहे थे! उसने यह भी लिखा कि थाने के SHO भी बीच में बाहर आए थे और उसने इन्हें यह कहते सुना था कि जब भी पुलिस कुछ करना चाहती है तो ये नेता ही कुछ नही करने देते! यह उनकी विवशता थी!
इस पर वे हुक्म चंद जाटव से भी उलझे थे और थाने में उनकी बातचीत के बारे पुछा था परन्तु जाटव अपनी बात से मुकर गए थे जबकि उन्होंने स्वयं सुना था परन्तु अफसरशाही ने इंकार कर दिया था! सरकारी सूत्रों के मुताबिक मरने वालों की संख्या ३००० से अधिक थी!
सरदार सुरजीत सिंह पुत्र सरदार संतोख सिंह उम्र ४६ वर्ष, निवासी १६-बी/५ देश बन्धु गुप्ता रोड, करोल बाग, नै दिल्ली-११०००५ द्वारा मिश्रा कमिशन को दिया गया एफिडेविट
५ नवंबर १९८४ को वह अपने भाई प्रीतपाल सिंह और जसवंत सिंह जो कि ८, भामरी मेंशन, के साथ करोल बाग पुलिस थाने गया था ! वहां हमने धर्म दास शास्त्री सदस्य लोक सभा को देखा था जो कि एस एच ओ को गाली दे रहा था और उस पर दबाव डाल रहा था कि वह उसके कार्यकर्ताओं को रिहा करे जिन्हें उसने थाने में रोका (DETAINED) हुआ था !वह (धर्म दस शास्त्री एस एच ओ पर चिल्लाया कि उसे पता होना चाहिए कि वह धर्म दास शास्त्री है! जब एस एच ओ ने उनको रिहा करने में अपनी असमर्थता बताई तो शास्त्री ने उसे गले से पकड़ लिया और गाली गलौज करने लगा! मैंने वहां पर बहुत से व्यक्तियों को देखा था जिन्हें पुलिस ने थाने में बिठा रखा था!
हमें सरदार सुरजीत सिंह जी पर अधिक विश्वास है क्योंकि वे १९८४ के एक पीड़ित हैं और उन्होंने जो स्वयं अपनी आँखों से करोल बाग थाने में देखा, वही मिश्रा कमिशन को अपने दिए गए बयान में भी दोहराया है! और इसी से मिलती खबरें ही उस दिन अख़बारों में छपी थीं! संजय सूरी राजीव गाँधी के मित्र थे, उनकी रिपोर्ट्स विश्वास के योग्य नहीं हैं!
इंदिरा गाँधी
`विश्वासघाती कौन....?
लोग
कहते हैं कि बेअंत सिंह और सतवंत सिंह, इंदिरा की सुरक्षा में तैनात थे और
उन्होंने इंदिरा पर गोली चला कर विश्वासघात किया है? क्या आश्चर्य है —
अरे विश्वासघात तो हिन्दू कौम ने सिखों के साथ किया है —-विश्वासघात किया
सदियों पुराने गठ-बंधन का, रिश्तों का, एक - दूसरे पर
जान देने वाले विश्वास का? हम जानते हैं कि मुसलमान व् सिख कौम की दुश्मनी
है, सदियों से यह वैर चला आ रहा है, इस्लाम के भारत में प्रसार को सिखों ने
रोका था! मुसलमानों ने हजारों - लाखों सिखों का कत्लेंआम किया है,
अनेकों युद्ध भी हुए हैं जिनमें सिख ही विजित रहे! फिर भी मुसलमानों की
हकूमत रही है अत: इनके द्वारा सिख कौम पर किए गये जुल्मों की दास्तान भी
बहुत लम्बी है परन्तु आप हिन्दू तो हमारे सिख कौम के अहसानमन्द थे, हम को
तो यह फख्र हासिल था कि हम सिख लोग हिन्दू कौम के रक्षक हैं, रखवाले हैं —
हम ही तो थे आपके बाडीगार्ड? आप के हिन्दू धर्म को नौवें सिख
गुरु तेग बहादुर जी ने स्वयं अपना बलिदान देकर बचाया था ! हिन्दू कौम तो
सिखों की सदा ऋणी रहनी चाहिए !
राजीव गाँधी
दूसरा
विश्वासघात इस देश की सरकार और प्रधान मंत्री राजीव गाँधी ने किया---उसकी
सांविधानिक जिम्मेवारी थी कि प्रजा की रक्षा करे लेकिन यहाँ तो बाड़ ही खेत
को खा गई? क्या आश्चर्य है कि जिसके कंधों पर देश के राष्ट्रपति यह
जिम्मेदारी सौंपते हैं कि वह प्रत्येक नागरिक की बिना भेद भाव के रक्षा
करेगा--वह अपनी ही सेना, पुलिस व् अर्ध-सैनिक बलों के प्रयोग से ---
अपने ही देश के निहत्थे नागरिकों का विनाश करने चल पड़ता है---इस से बढ़ कर और विश्वासघात क्या होगा?
क्या हमें अपने इस महान देश के कर्णधारों पर भरोसा करना चाहिए? शायद भविष्य में तो नहीं!
आप स्वयं देखिए कि किस
तरह से राजीव गाँधी, जनरल ए एस वैद्य, पी सी एलेग्जेंडर तथा राजीव के
सलाहकारों और भारत सरकार के गृह मंत्री नरसिम्हा राव तथा उनका
मंत्रालय---यानि कि न केवल भारत सरकार (कांग्रेस) ही सिखों के कत्लों के
लिए दोषी थी, भारत सरकार का सारा प्रशासन भी निकम्मा था और राजीव तथा अन्य
कांग्रेसी नेताओं के समक्ष घुटने टेक चुका था, प्रशासन द्वारा जान बूझ कर
समय नष्ट किया गया और स्थिति को बिगड़ने दिया गया, उसे संभालने की कोई
कोशिश न की गयी! सिखों को निर्दयी कातिलों के दस्तों के हवाले किया गया! वे
चुन चुन कर निहत्थे सिखों का खून करते रहे और भारतीय सरकार के प्रशासनिक
अधिकारी घोड़े बेचकर गहरी नींद में सोते रहे! नीरो बंसी बजा रहा था जबकि
रोम जल रहा था लेकिन यहाँ दिल्ली केवल जल ही नही रही थी अपितु तैमुर लंग के
पश्चात सदियाँ बीत जाने पर भी खून के आंसू पी रही थी, उसे तैमुर लंग या
राजीव गाँधी में कोई अंतर नजर न आ रहा था! बस चारों और खून ही खून फैलता जा
रहा था, निर्दोषों की हत्याएं हो रही थीं और राजीव सिर्फ अपनी माता का शोक
मना रहा था, उसे किसी अन्य परिवार के दुःख से कोई मतलब न था! किसी भी
परिवार पर क्या बीत रही थी, या कौन सा परिवार मातम मना रहा था, उसे क्या
?---वह तो सिर्फ अपनी दुनिया में मस्त था,,,, माता तो गई परन्तु विरासत में
उसे राज्य तो मिला? शोक तो केवल बहाना था!
फिर
एक अकेली इंदिरा भारत की प्रधान मंत्री होते हुए सिखों की दुश्मन बनी रही —
खेद का विषय तो यह है कि उसके पुत्र राजीव गाँधी ने अपनी माँ का
बदला लेने के लिए सिखों का जो कत्लेंआम करवाया और सत्ता के शीर्ष पर
बैठे होकर भी सत्ता, सेना और संपूर्ण सरकारी तन्त्र का दुरूपयोग किया, क्या
इतिहास भुला पाएगा? क्या उसका नाम भी नृशंस हत्यारों की सूची में नहीं
होगा? अवश्य लिखा जा चुका होगा — कम से कम सिख इतिहास में तो उसे एक नीच, घृणास्प्द व्यक्ति और निर्दोषों के हत्यारे तैमूर लंग की भांति ही याद किया जायगा!
यदि एक
तरफ सदियों पुराने विश्वास का खून हो रहा था, राजीव गाँधी अपने
पूरे प्रयत्नों से निर्दोष सिखों का खून करवा रहा था और तोड़ रहा था
उस भ्रम को कि, 'हिन्दू और सिख भाई भाई हैं', उनमें रोटी - बेटी की
सांझ है, एक दूसरे के परिवारों में किये गए रिश्तों को समाज में
अपनाया जाता है, मान्यता दी जाती है! ऐसी महान परंपरा को मिटाने का दोषी है
वह परन्तु दूसरी तरफ एक और महान व्यक्ति भी सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर
आसीन था जिसने सदियों से चली आ रही दुश्मनी को मित्रता में बदलने की
भरपूर कोशिश की! वह व्यक्ति था जिया -उल -हक, पाकिस्तान का राष्ट्रपति
जिसने सिखों और मुसलमानों में चली आ रही सदियों पुरानी दुश्मनी को मित्रता
में बदलने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी? सफल दोनों ही हुए परन्तु राजीव
गाँधी की सफलता अधिक है
क्योंकि आज भी सिख कौम — हिन्दुओं पर पूर्ण विश्वास नहीं करती! उन्हें
मालूम है कि हिन्दू सामने से वार नहीं करता — पीठ में छुरा भोंकता है,
विश्वास का खून करता है, न जाने कब धोखा दे जाए परन्तु मुसलमान एक बहादुर
कौम है ! वह सामने आकर ही लड़ता है, इस तरह धोखे से पीठ पीछे वार नहीं
करता! जैसा हिन्दू कौम ने १९८४ में सिखों के साथ किया!
तो पाठकगण स्वयं ही देख लें कि विश्वासघात किसने किसके साथ किया? बेअंत सिंह, सतवंत सिंह ने या इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी ने?
आशा है कि आपको यह पुस्तक अवश्य पसंद आई होगी, अधिक से अधिक भारतीय इस पुस्तक को पढ़ कर सत्य से अवगत हो सकें, इसके लिए ही इस पुस्तक को बाज़ार में न बेचकर यहाँ नेट पर डाल दी गई है! हमारा उद्देश्य पैसा कमाना ही नहीं, पाठकों को सुचेत करना भी है कि वे कांग्रेस को और गाँधी परिवार को इस देश के निर्माता न समझें, सच तो यह है कि 1947 में देश के बंटवारे के लिए नेहरु और कांग्रेस जिम्मेदार थी और ऐसा ही प्रयत्न अपनी स्वार्थी नीतियों के कारण अब फिर से किये जा रहे हैं ! फर्क सिर्फ इतना है कि 1947 में मुस्लिम थे तो अब निशाने पर सिख हैं ! और यदि सिखों के साथ ऐसा ही भेदभाव और निरंकुशता जारी रही तो इस देश को एक और विखंडन के लिए तैयार रहना चाहिए!
आशा है कि आपको यह पुस्तक अवश्य पसंद आई होगी, अधिक से अधिक भारतीय इस पुस्तक को पढ़ कर सत्य से अवगत हो सकें, इसके लिए ही इस पुस्तक को बाज़ार में न बेचकर यहाँ नेट पर डाल दी गई है! हमारा उद्देश्य पैसा कमाना ही नहीं, पाठकों को सुचेत करना भी है कि वे कांग्रेस को और गाँधी परिवार को इस देश के निर्माता न समझें, सच तो यह है कि 1947 में देश के बंटवारे के लिए नेहरु और कांग्रेस जिम्मेदार थी और ऐसा ही प्रयत्न अपनी स्वार्थी नीतियों के कारण अब फिर से किये जा रहे हैं ! फर्क सिर्फ इतना है कि 1947 में मुस्लिम थे तो अब निशाने पर सिख हैं ! और यदि सिखों के साथ ऐसा ही भेदभाव और निरंकुशता जारी रही तो इस देश को एक और विखंडन के लिए तैयार रहना चाहिए!
लेखक:
अजमेर सिंह रंधावा
9811857449, 9818610698
अजमेर सिंह रंधावा
9811857449, 9818610698




























































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